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    Home»विशेष»झारखंड के निकाय चुनाव में कांग्रेस-झामुमो के बीच खुद को बेहतर बताने की लगी रेस
    विशेष

    झारखंड के निकाय चुनाव में कांग्रेस-झामुमो के बीच खुद को बेहतर बताने की लगी रेस

    shivam kumarBy shivam kumarFebruary 9, 2026Updated:February 10, 2026No Comments7 Mins Read
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    विशेष
    झामुमो और कांग्रेस के बीच कई शहरों में हो रहा मुकाबला, प्रत्याशी एक दूसरे को पटखनी देने को बेचैन
    गैर-दलीय चुनाव होने के बावजूद दोनों दलों में चल रही तीखी बयानबाजी
    चुनावी नतीजे आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि शहरों में असल ताकत किसकी है

    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    झारखंड में शहरी निकाय चुनाव के मुकाबले की तस्वीर पूरी तरह साफ हो गयी है। नौ नगर निगम, 20 नगर परिषद और 19 नगर पंचायतों में महापौर/अध्यक्ष और वार्ड पार्षदों के बीच चुनाव चिन्ह का आवंटन हो चुका है। अब इन प्रत्याशियों द्वारा चुनाव प्रचार अभियान शुरू किया जायेगा, ताकि शहर की सरकार में भागीदारी मिल सके। चुनाव 23 फरवरी को होंगे। गैर-दलीय आधार पर हो रहे इस चुनाव का रोमांच कितना है, इसका उदाहरण राजनीतिक दलों के भीतर चल रही गतिविधियों से साफ हो जाता है। खास कर राज्य में सत्ताधारी इंडी गठबंधन के घटक दलों के बीच पैदा हुई खाई एक अलग ही कहानी बयां कर रही है। निकाय चुनाव में कई शहरों में झामुमो और कांग्रेस के बीच मुकाबले की जमीन तैयार हो गयी है, क्योंकि दोनों दलों ने अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों को मैदान में उतार दिया है। इसके अलावा कई जगहों पर दोनों दलों के बागी उम्मीदवार भी चुनाव मैदान में डट गये हैं, जिससे मुकाबला तो रोचक हो ही गया है, दोनों दलों के बीच तल्खी भी बढ़ गयी है। झामुमो और कांग्रेस के बीच पैदा हुई यह तल्खी राज्य के राजनीतिक भविष्य को भी जरूर प्रभावित करेगी, क्योंकि दोनों दल राज्य की सत्ता में लगभग बराबरी के साझीदार हैं। निकाय चुनाव के दौरान दोनों दलों के बीच पैदा हुई दूरी का आलम यह है कि दोनों ही दल एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी भी कर रहे हैं और दोनों दलों द्वारा समर्थित उम्मीदवार चुनावी मुकाबले में ताल भी ठोंक रहे हैं। झारखंड की राजनीति में इंडी गठबंधन के घटक दलों के बीच पैदा हुई यह खाई क्या गुल खिलायेगी, यह तो समय बतायेगा, लेकिन इतना तय है कि यह खाई राज्य की राजनीति को बहुत गहराई तक प्रभावित करेगा। सत्ताधारी इंडी गठबंधन के बीच क्या है दूरी और क्या हो सकता है इसका असर, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।

    झारखंड में निकाय चुनाव 2026 कुछ अलग ढंग से होने जा रहा है। एक तरफ पार्टियों का ह्यअनुशासन का डंडाह्ण काम नहीं आ रहा, तो दूसरी तरफ सत्ताधारी महागठबंधन में भी दरार साफ दिखने लगी है। पार्टी की दुहाई देने वाले इस बार पार्टी को ही आंखें दिखाने लगे हैं। नतीजा हुआ कि पार्टियों की टेंशन बढ़ गयी है। पार्टी चाहे भाजपा हो, कांग्रेस हो अथवा झामुमो हो, सभी दल के नेताओं में टेंशन है। बागियों से अधिक टेंशन इंडी अलायंस के दो प्रमुख घटक दलों, यानी झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस में है, क्योंकि निकाय चुनाव को लेकर झारखंड में इंडी गठबंधन की एकता भी तार -तार हो गयी है। कई जगहों पर दोनों पार्टियों के लोग मैदान में उतर गये हैं। झारखंड में नौ नगर निगम, 20 नगर परिषद और 19 नगर पंचायत के चुनाव होने जा रहे हैं। इस निकाय चुनाव में झामुमो, कांग्रेस और राजद में भी कोई एक फामूर्ला तय नहीं हो पाया।

    महागठबंधन में शामिल दलों में भी नहीं बना कोई फामूर्ला
    परिणाम यह हुआ कि कई नगर निगम में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार भी हैं, तो झामुमो समर्थित उम्मीदवार भी मैदान में ताल ठोक रहे हैं। कई जगहों पर तो स्थिति उम्मीद से अलग है। झारखंड में फिलहाल हेमंत सोरेन के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार चल रही है। उम्मीद की जा रही थी कि गठबंधन के सहयोगी दल आपस में मिल-बैठकर कोई एक फामूर्ला तय करेंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। यह अलग बात है कि इस बार निकाय चुनाव में पार्टियों ने भी अति आत्मविश्वास में कुछ जल्दवाजी कर दी। पहले से ही हवा बनायी गयी थी कि पार्टी समर्थित उम्मीदवार ही चुनाव में खड़ा हो सकता है। ऐसे में जब चुनाव दलीय आधार पर नहीं हो रहा है तो कार्यकतार्ओं में भी चुनाव लड़ने की इच्छा जागृत हुई और वह इच्छा पार्टी के अनुशासन पर भारी पड़ गई। नतीजा हुआ कि हर जगह बागियों के साथ महागठबंधन के घटक दलों के प्रत्याशी भी आपस में टकरा रहे हैं।

    गठबंधन में शामिल दलों के उम्मीदवार भी आमने-सामने
    गठबंधन में शामिल दलों के उम्मीदवार तो आमने-सामने हैं ही, कई जगहों पर तो बागी उम्मीदवारों ने पार्टियों की परेशानी बढ़ा दी है। एक तरफ झामुमो गांव और शहर की दूरी को पाटने में लगा हुआ है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस भी निकाय चुनाव के जरिये अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश में है। कुल मिलाकर लड़ाई दिलचस्प दौर में पहुंच गयी है।

    दोनों दलों के बीच तीखी बयानबाजी
    निकाय चुनाव को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस के बीच तीखी बयानबाजी बढ़ती दिख रही है, जबकि दोनों दल महागठबंधन का हिस्सा हैं।

    कांग्रेस नेता कर रहे हैं जीत का दावा
    झारखंड प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष शहजादा अनवर ने दावा किया है कि राज्य के अधिकांश शहरी निकायों में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों की जीत तय है। उन्होंने रांची के पिछले चुनाव का हवाला देते हुए कहा, शहरों में हम कितने मजबूत हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले निकाय चुनाव में हमारा प्रदर्शन कैसा रहा था। कांग्रेस समर्थित मेयर उम्मीदवार रमा खलखो पहले मेयर रह चुकी हैं और दूसरी बार साजिश रचकर उन्हें हराया गया था। शहजादा अनवर ने आगे कहा, हमारे डिप्टी मेयर उम्मीदवार डॉ राजेश गुप्ता छोटू ने 60 हजार से अधिक वोट हासिल किये थे। मानगो में पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता की पत्नी सुधा गुप्ता चुनाव लड़ रही हैं, जहां पिछले विधानसभा चुनाव में बन्ना को हार के बावजूद एक लाख से अधिक वोट मिले थे। इसी तरह मेदिनीनगर में पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी की बेटी, बोकारो में विधायक श्वेता सिंह की जेठानी और धनबाद में पूर्व विधायक पूर्णिमा नीरज सिंह की सास इंदू सिंह मैदान में हैं। इन शहरों में कांग्रेस के मजबूत नेता कांग्रेस को फायदा पहुंचायेंगे। हजारीबाग में पूर्व विधायक सौरभ नारायण सिंह का जनाधार भी हमारे प्रत्याशियों को मजबूती देगा।

    झामुमो का पलटवार, आंकड़े गिनाने वाले भूल गये अपना प्रदर्शन
    कांग्रेस नेता के इन दावों पर झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडेय ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि कौन मजबूत है और कौन कमजोर, इसका फैसला शहरी निकाय की जनता करेगी। यह सही है कि मेयर-अध्यक्ष जैसे एकल पदों पर गठबंधन हो सकता था, लेकिन सहयोगी दल ने इसकी कोशिश नहीं की। इसके बजाय एकतरफा तरीके से सभी जगह कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार खड़े कर दिये गये। मनोज पांडेय ने कांग्रेस के आंकड़ों का जवाब देते हुए कहा कि जो लोग आंकड़े गिना रहे हैं, वे भूल गये कि रांची में झामुमो की मेयर उम्मीदवार वर्षा गाड़ी को साजिश रचकर कैसे हराया गया था। डिप्टी मेयर के लिए अशरफ चुन्नू को भी लगभग 60 हजार वोट मिले थे। यह पार्टी का अपना वोट था। उन्होंने कहा कि हमारा जनाधार पहले से ज्यादा बढ़ा है। हेमंत सरकार के छह वर्षों में शहरी जनता ने देखा है कि सुविधाएं कैसे बढ़ी हैं। शहरी विकास मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में शहरों की सूरत बदल रही है। फ्लाइओवर का जाल बिछ रहा है। अब ज्यादा समय नहीं बचा है। सबको पता चल जायेगा कि शहरों में किसकी कितनी ताकत है।
    राज्य में सत्ताधारी गठबंधन के घटक दलों के बीच पैदा हुई इस दूरी का राज्य की भावी राजनीति पर असर पड़ना स्वाभाविक है। जानकार बताते हैं कि झामुमो, कांग्रेस और राजद, ये तीनों दल कितने दिन तक एकजुट रह सकेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा। राज्य के शहरी इलाकों में इस बार गठबंधन के बावजूद आपसी तनाव साफ नजर आ रहा है। चुनावी नतीजे आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि शहरों में असल ताकत किसकी है।

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    shivam kumar

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