विशेष
सभी को मिल कर बचानी होगी लोकतंत्र के मंदिर की गरिमा
परंपरा के खत्म होने का स्पष्ट प्रतीक है प्रधानमंत्री को बोलने से रोकना
संसद में विपक्ष ने जो कुछ किया, उससे तो कमजोर हुई लोकतंत्र की नींव
हाल ही में लोकसभा में हुए अभूतपूर्व हंगामे ने संसदीय मयार्दाओं को तार-तार कर दिया है, जहां प्रधानमंत्री को भी सदन को संबोधित करने से रोका गया, जो नेहरू-वाजपेयी द्वारा स्थापित संवाद की परंपरा के क्षरण और लोकतंत्र के लिए एक निराशाजनक संकेत है। भारत को दुनिया का सबसे लोकतंत्र होने का सम्मान हासिल है और यहां की संसद में यदि विपक्ष की तरफ से प्रधानमंत्री को बोलने से रोका जाता है और उन पर हमले की साजिश रची जाती है, तो फिर इससे शर्मनाक क्या हो सकता है। प्रधानमंत्री आम तौर पर सदन के नेता होते हैं और उनका सम्मान पूरे देश का सम्मान होता है। यदि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर उन्हें बोलने से रोक दिया जाये, तो इसे संसदीय परंपरा का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। संसदीय लोकतंत्र में संसद को स्वस्थ वाद-विवाद और विचार विनिमय का केंद्र माना जाता है, लेकिन पिछले दो दिनों में विपक्ष ने जो कुछ किया, उससे तो यही लगता है कि उसे न तो स्वस्थ वाद-विवाद से कोई मतलब है और न ही संसदीय मयार्दाओं-परंपराओं की कोई परवाह है। संसद के सदस्यों को समझना होगा कि वे सदन के भीतर जो कुछ करते हैं, उसे पूरी दुनिया देखती है। इसमें वे लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने उन्हें चुन कर संसद में भेजा है। ऐसे में इस तरह का आचरण कर वे न केवल परंपराओं-मयार्दाओं को तोड़ रहे हैं, बल्कि अपने मतदाताओं का भी अपमान कर रहे हैं। संसद के बजट सत्र के दौरान विपक्ष द्वारा किये गये आचरण का क्या होगा असर और क्यों संसद की मयार्दा को बचाना जरूरी है, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत, यानी देश की संसद हमारे लोकतांत्रिक आचरण, संसदीय मयार्दाओं और संवाद की शुचिता का केंद्र होनी चाहिए, जहां संवाद से संकटों के हल खोजे जायें। लेकिन पिछले दो दिनों में लोकसभा में जो हुआ,वह बहुत निराशाजनक है। सदन के नेता प्रधानमंत्री ही अगर अपने सदन को संबोधित न कर सकें, इससे ज्यादा निराश करने वाली बात क्या हो सकती है। लेकिन इस बार ये हुआ और सबने देखा। यह संसदीय मयार्दाओं के तार-तार होने का भी समय है। जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को यह अपील करनी पड़ी कि प्रधानमंत्री लोकसभा में न आयें और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा का जवाब न दें। लोकसभा अध्यक्ष ने किस तरह की आशंकाओं के कारण ऐसा कहा होगा, इसे समझा जा सकता है।
प्रधानमंत्री के साथ दुर्व्यवहार की साजिश
इसके पहले सदन में हुए हंगामे, कागज फाड़कर आसंन पर फेंकने जैसे दृश्य तो संसद ने अनेक बार देखे हैं। बावजूद इसके, एक अभूतपूर्व दृश्य भी लोकसभा ने देखा, जब लगभग सात महिला सांसद प्रधानमंत्री के आसन तक जा पहुंचीं। क्या हो सकता था, इसका अनुमान लगाना ठीक नहीं। लेकिन बाद में लोकसभा अध्यक्ष ने जो कुछ कहा, वह बताता है कि संसदीय मयार्दाओं की सीमाएं लांघते हुए हमारे विपक्षी सांसद दिखे। परंपरा रही है कि धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब आम तौर पर प्रधानमंत्री देते हैं। इसकी न सिर्फ अपेक्षा रहती है, बल्कि प्रतीक्षा भी कि आखिर सरकार के मुखिया क्या कहते हैं। स्थापित मान्यता यहां टूटती दिखी। प्रधानमंत्री लोकसभा को संबोधित नहीं कर सके। राज्यसभा में भी उनका भाषण विपक्ष की गैर-मौजूदगी में हुआ।
विपक्ष ने तोड़ दिया लोकतांत्रिक स्वभाव का आइना
संसदीय लोकतंत्र में विरोध और संवाद साथ -साथ चलते हैं। पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संसद में पहले दिन से बहस और संवाद की संस्कृति को संरक्षित किया। वे यह चाहते थे अच्छे लोग संसद में आयें और संसदीय बहसों का स्तर ऊंचा हो। अपने विरोधी सांसदों की भी वे प्रशंसा करते हुए नजर आते हैं। दिग्गज सांसद राममनोहर लोहिया से लेकर युवा सांसद अटल बिहारी वाजपेयी को भी उन्होंने ध्यान से सुना। यह परंपरा बाद के प्रधानमंत्रियों ने भी बनाये रखी। विपक्ष भी अपने आचरण में मर्यादित रहा। संसद हमारे लोकतांत्रिक स्वभाव का आइना बनी रही। आपातकाल लागू होने के बाद क्षरण जरूर हुआ, लेकिन बाद के दिनों में सब कुछ संभल गया। पीवी नरसिंह राव, चंद्रशेखर, अटल जी स्वयं बड़े संसदविद् थे और सदन गरिमा के साथ चलता रहा। कड़ी आलोचना के साथ, संवाद कायम रहा। पिछले कुछ समय से संवाद बंद है और कटुता बहुत बढ़ गयी है। संसद ह्यशब्द की हिंसाह्ण का केंद्र बन गयी है। अपने सहयोगी सांसद को गद्दार की संज्ञा देना जैसे उदाहरण किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह शुभ नहीं है।
दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है सदन चलाना
यह सही बात है कि सदन को चलाना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन विपक्षी दलों के सहयोग के बिना सदन नहीं चल सकता यह भी सच है। सदन में मिले विशेषाधिकार का लाभ लेकर सांसदों द्वारा हमारे महान दिवंगत नेताओं को कोसना , उनके जीवन के निजी पक्षों को किताबों के संदर्भ देकर उठाना कितना उचित है। इसके साथ ही बिना तथ्यों के किसी अनछपी किताब के उदाहरण से सरकार को घेरने की कोशिश भी बचकानी ही है।
पैदा हो रहे हैं कई अहम सवाल
बजट सत्र संसद का महत्वपूर्ण सत्र होता है। इसमें हम अपने देश के आगामी एक साल के सपनों, आकांक्षाओं और आर्थिक भविष्य का खाका खींचते हैं। ऐसे सत्र का समय नष्ट करके हमें क्या हासिल होगा, समझना मुश्किल है। मुद्दे की बात यह भी है कि क्या हमारे सांसद स्वस्थ बहस चाहते हैं। क्या क्षणिक राजनीतिक सुर्खियों के लिए हम समाज के वृहत्तर प्रश्नों की उपेक्षा नहीं कर रहे हैं। दिवंगत नेताओं की चरित्रावली का वाचन करके हम कौन से मूल्य स्थापित कर रहे हैं। कभी नेता प्रतिपक्ष ने वीर सावरकर पर सवाल खड़े करके जो गलत परंपरा डाली, अब दूसरे सांसद बोरे में किताबें लाकर उनके अंश पढ़ रहे हैं। इससे हमें क्या हासिल होगा। नेहरू जी, इंदिरा गांधी, अटल जी इस देश के महान नेता रहे हैं। उनके देहावसान के बाद ऐसी गलीज बातें राजनीतिक कार्यकतार्ओं को नहीं करनी चाहिए। मृत्यु के बाद हम पुरखों के सद्गुण याद करते हैं। उनके प्रदेय और योगदान पर गर्व करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। लेकिन हम किस रास्ते पर चल पड़े हैं। आजादी के इतने सालों बाद संसदीय बहस और संसदीय मयार्दाओं का स्तर ऊंचा करने के बजाय हम इसे रसातल में ले जा रहे हैं। कितना अच्छा होता कि हमारे सांसद यह समझ पाते कि देश की जनता ने उन्हें किन उम्मीदों से संसद में भेजा है। अगर सांसद ही तय लेंगे कि संसद नहीं चलेगी, तो उसे कौन चला सकता है। सांसद होना साधारण नहीं है, देश के 140 करोड़ लोगों की आकांक्षाओं के प्रतिनिधियों का आचरण प्रश्नचिन्ह की तरह हमारे सामने है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी राजनीतिक दल ऐसे निराशाजनक दृश्यों से संसद को बचाने के लिए सोचेंगे।

