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    Home»Top Story»भ्रष्टाचार की गंगा में कोई हम गरीबों को क्यों देखेगा
    Top Story

    भ्रष्टाचार की गंगा में कोई हम गरीबों को क्यों देखेगा

    shivam kumarBy shivam kumarJune 24, 2020Updated:June 24, 2020No Comments3 Mins Read
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    कोरोना वायरस के कहर से बचने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन होने के कारण काम धंधा बंद होने के बाद क्रमवार तरीके से उद्योग-धंधे शुरू हो रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद देश के विभिन्न शहरों में रह रहे बिहारी कामगारों के घर वापसी का सिलसिला थम नहीं रहा है। प्रवासी जहां से आने के लिए ट्रेन की सुविधा है वहां से ट्रेन से आने के अलावा रिजर्व बस और अन्य छोटे वाहनों से भी लगातार घर वापस आ रहे हैं। 
     
    बिहार के मेहनती श्रमिकों की बड़ी संख्या में घर वापसी के बाद तमाम राज्य सरकारें, उद्योगपति प्रवासियों को वहां रोकने का उपाय कर रहे हैं लेकिन लॉकडाउन के दौरान हुई जलालत झेलने वाले बिहार के श्रमिक और कामगार किसी भी हालत में वहां रुकने के लिए तैयार नहीं हैं। हालांकि बिहार में अगर काम नहीं मिला तो कुछ दिनों के बाद वे फिर अपने-अपने प्रवास वाले राज्यों में लौट कर जाएंगे। लेकिन अभी छह महीना- साल भर अधिकतर लोग बाहर जाने के लिए तैयार नहीं हैं। 
     
    सरकार गांव में काम देने के लिए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण रोजगार अभियान समेत अन्य रोजगार परक योजना चला रही है। कुछ योजना को शुरू करने की प्रक्रिया तेज गति से की जा रही है। बिहार के कामगारों को बिहार में ही काम मिले, उन्हें बाहर नहीं जाना पड़े, इसके लिए सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी, जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी के कार्यकर्ता सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों को लोगों तक पहुंचा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी द्वारा सभी शक्ति केंद्र पर प्रवासी मजदूर कोषांग का गठन किया गया है, प्रवासी मजदूर कोषांग प्रभारी का चयन किया जा रहा है। शक्ति केंद्र और बूथ स्तर तक के कार्यकर्ता प्रवासी कामगारों से मिलकर उनके दुख दर्द को जान रहे हैं, सरकार द्वारा प्रवासी श्रमिकों को काम देने के लिए शुरू की गई योजनाओं की जानकारी उन्हें दे रहे हैं। इन सारी कवायद के बावजूद देश के तमाम शहरों से घर आए लोग अब सब दिन के लिए गांव में रुकेंगे, यह कहना बहुत ही मुश्किल है। 
     
    दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, पुणे, सूरत, गुवाहाटी, अगरतला आदि से लौटे प्रवासियों का कहना है कि बिहार में काम नहीं मिलने के कारण वहां जाकर काम कर रहे थे। सस्ते में अपना श्रम बेचकर हमने वहां के मालिकों को आर्थिक रूप से समृद्ध बना दिया। शहर की आर्थिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक संरचना बदल दी। लेकिन जब दुख भरे दिन आए तो सब ने किनारा कर लिया, गांव आए हैं सोच है गांव में रहने की, यही काम करने की। लेकिन काम नहीं मिला तो फिर लौट कर जाएंगे। गुवाहाटी से आए विनोद तांती, राधे तांती, घनश्याम तांती का कहना है कि हम गरीबों को कौन देखने वाला है। सरकार काम देने का प्रयास कर रही है, लेकिन स्थानीय स्तर के जनप्रतिनिधि और अधिकारी वह होने दें तब तो। यहां भ्रष्टाचार की गंगा और गंगोत्री बह रही है, जिसमें कोई क्यों देखेगा हम गरीब को, सबका ध्यान योजना में लूट-खसोट करने में ही लगा रहता है। अगर ऐसा नहीं होता तो अपना बिहार बहुत उन्नत रहता, हम लोग बाहर जाकर बिहारी नहीं कहलाते, जलालत नहीं झेलते, गाली नहीं सुनते। लेकिन यहां तो कुछ नहीं होने वाला है, हम लोग कई दिन तक भूखे रहकर, जलालत झेलने के बाद गांव वापस आए हैं। यहां कुछ दिन रहेंगे, फिर आर्थिक समस्या होगी और हम लोग प्रवासी कहलाने, आ गया बिहारी सुनने को मजबूर हो जाएंगे। 
     
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