रांची। कांग्रेस विधायक बंधु तिर्की ने मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री डॉ रामेश्वर उरांव को पत्र लिखकर भूमिहीन आदिवासी व अन्य परंपरागत वन निवासियों को वन पट्टा उपलब्ध करा कर उन्हें संरक्षित करने की दिशा में पहल करने को कहा है। बंधु तिर्की ने अपने लिखे पत्र में कहा है विगत 2019 के विधानसभा चुनाव के दौरान मौजूदा सरकार के प्रमुख घटक दल झारखंड मुक्ति मोर्चा एवं कांग्रेस पार्टी ने आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों के साथ न्याय किये जाने की बात कही थी। मुख्यमंत्री द्वारा भी घोषणा किया गयाथा कि सरकार के प्रथम वर्षगांठ में 20 हजार व्यक्तिगत और दो हजार सामुदायिक वन पट्टों की सौगात वन आश्रित समुदायों को दी जायेगी। परंतु अब तक पूरे राज्य में दो हजार व्यक्तिगत पट्टे और लगभग 800 सामुदायिक पट्टे ही दिये गये हैं। जो पट्टे दिये गये हैं उनमें जमीन का रकबा इतना नहीं है कि खेती-बारी कर इससे आजीविका सुनिश्चित की जा सके। कम्युनिटी फॉरेस्ट रिसोर्स लर्निंग एंड एडवोकेसी (सीएफआर- एलए) के अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड की कुल 81 विधानसभा सीटों में 62 विधानसभा सीटों पर वन आश्रित समुदायों का प्रभाव है। इन 62 विधानसभा सीटों के 77% वोटर वन अधिकार कानून के तहत वन पट्टे के हकदार हैं लगभग 46 हजार एकड़ वन भूमि पर वन अधिकार कानून के तहत इनका दावा बनता है। इन गांवों की संख्या लगभग 11 हजार है।
इस कानून के लागू होने के 15 साल बाद भी पट्टा लेने वालों का आंकड़ा एक लाख तक नहीं पहुंच पाया है स्थिति यह है कि लातेहार, पलामू, पश्चिम सिंहभूम, सिमडेगा सहित एक दर्जन से ज्यादा जिलों में पट्टा वापसी के आंदोलन ने जोर पकड़ लिया है।फॉरेस्ट ब्यूरोक्रेसी अब तक हावी है जानकारी के अनुसार कई जिलों में डीएफओ ने वन पट्टे पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। लातेहार और दुमका में दर्जनों अधिकार पत्र तैयार हैं, लेकिन डीएफओ द्वारा वन पट्टे पर हस्ताक्षर करने से इनकार किए जाने की वजह से वांछित लोगों को वन पट्टे नहीं दिए जा सके हैं। ज्ञात हो कि झारखंड का भौगोलिक क्षेत्र 79716 वर्ग किमी है, जिसमें वन क्षेत्र 23611.4 वर्ग किमी है और राज्य के कुल क्षेत्रफल का 29.62 प्रतिशत जंगल अच्छादित है। झारखंड जैसे ट्राईबल स्टेट में जहां ट्राइबल का जीवन जंगलों पर निर्भर है। एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 40% इनकी आजीविका का स्रोत जंगल है, जिनका 12 महीने में लगभग 7 महीना जंगलों के बिना काम नहीं चल सकता है। आदिवासी आज भी अपने उन नैसर्गिक अधिकारों को पाने के लिए संघर्षरत है। वन अधिकार अधिनियम 2006 के पारित होने के बाद ऐसी आशा जगी थी कि सदियों से आदिवासियों के साथ हो रहे।