रहस्य और प्रेम का धाम, जहां भगवान आज भी भक्त के पीछे चल पड़ते हैं
क्या सच में इस धरती पर एक ऐसा धाम है जहां भगवान को सुबह जगाया नहीं जाता, जहां ना शंख बजता है, ना घंटियों की गूंज उठाती है, जहां हर कुछ ही क्षणों में पर्दे को ऐसे गिरा दिया जाता है, जैसे मानो किसी जीवंत उपस्थिति को तेज नजरों से बचाया जा रहा हो और जहां 54 वर्षों तक बंद रहा एक रहस्यमय कक्ष धनतेरस के दिन खुलता है और उसके भीतर जो मिलता है वह पूरे वृंदावन को सन्न कर देता है। कैसा होगा वह स्थान जहां कहा जाता है कि भगवान स्वयं अपने भक्त के पीछे-पीछे चल पड़े थे। जहां दर्शन करते ही आंखों से आंसू अपने आप बहने लगते हैं। जहां वर्ष में केवल एक दिन चरण दर्शन होते हैं। और जहां धरती के नीचे एक गुप्त मार्ग होने की कथा सुनाई जाती है जो कभी जयपुर तक जाता था। क्या यह केवल लोक कथा है या फिर आस्था की दुनिया में छिपी कोई सच्चाई?
एक संत की पुकार और भगवान का प्राकट्य
सदियों पुरानी बात है। जब भी कोई ब्रज की कुंज गलियों से गुजरता है, तो उसे एक ऐसे धाम की कथा सुनाई जाती है जो दुनिया के किसी भी मंदिर से बिल्कुल अलग है। यह कहानी केवल पत्थरों से बनी एक इमारत की नहीं, बल्कि भगवान और भक्त के बीच उस अनकहे प्रेम की है, जिसे शब्दों में नहीं, केवल आंसुओं और धड़कनों में महसूस किया जा सकता है। कहानी की शुरूआत 16वीं शताब्दी में होती है। वृंदावन का निधिवन, जहाँ चारों ओर घना जंगल था और यमुना की कल-कल बहती धारा। वहीं एक महान संत और संगीतज्ञ, स्वामी हरिदास जी अपनी कुटिया में तानपुरा लिए बैठे रहते थे। उनका स्वर इतना मधुर था कि पशु-पक्षी भी सुध-बुध खो बैठते थे। एक दिन उनकी भक्ति और संगीत से प्रसन्न होकर स्वयं श्री राधा और कृष्ण उनके सामने प्रकट हो गए। लेकिन उनके तेज को आम इंसान सह नहीं सकता था। तब स्वामी हरिदास जी के निवेदन पर, दोनों ने मिलकर एक ऐसा मोहक, सांवला और त्रिभंगी (तीन जगह से मुड़ा हुआ) स्वरूप धारण किया, जिसे पूरी दुनिया आज ‘श्री बांके बिहारी’ के नाम से जानती है।
बस एक झलक पाने को तरसते हैं भक्त
उत्तर प्रदेश के वृंदावन में स्थित बांके बिहारी का मंदिर विश्व प्रसिद्ध है। यहां भगवान बांके बिहारी की मात्र एक झलक पाने और अपनी मनोकामनओं की पूर्ति के लिए देश-विदेश से हर दिन हजारों की संख्या में भक्त आते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भी व्यक्ति यहां पर बांके बिहारी के दर्शन और पूजा करता है उसका जीवन सफल हो जाता है। शास्त्रों में वृंदावन की भूमि को देव भूमि भी कहा गया है। यहां के भूमि की मिट्टी को माथे पर लगाने मात्र से भक्तों का जीवन सफल, सुखमय और शांति से गुजरता है। यहां के कण-कण में राधा-कृष्ण के प्रेम की ध्वनि सुनाई देती है। वृंदावन में कई मंदिर हैं। जिनकी अपनी एक कहानी है। वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर इन्हीं में से एक है। जैसे-जैसे समय बीता, बांके बिहारी जी का एक भव्य मंदिर बना। लेकिन इस मंदिर में पूजा के नियम किसी राजदरबार या आम मंदिरों जैसे नहीं थे। यहां भगवान को सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं, बल्कि घर का एक छोटा सा, नटखट बच्चा माना गया।
प्रकट हुए बांके बिहारी
प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास की पंचमी तिथि को बांके बिहारी मंदिर में बांके बिहारी प्रकटोत्सव मनाया जाता है। इस मंदिर में बिहारी जी की काले रंग की प्रतिमा है। मान्यता है कि इस प्रतिमा में साक्षात् श्री कृष्ण और राधा समाए हुए हैं। इसलिए इनके दर्शन मात्र से राधा कृष्ण के दर्शन का फल मिल जाता है। प्रतिमा के प्रकट होने की कथा और लीला बड़ी ही रोचक और अद्भुत है। स्वामी हरिदास जी भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे। इन्होंने अपने संगीत को भगवान को समर्पित कर दिया था। वृंदावन में स्थित श्री कृष्ण की रासस्थली निधिवन में बैठकर भगवान को अपने संगीत से रिझाया करते थे। कान्हा की भक्त में डूबकर स्वामी हरिदास जी जब भी गाने बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते। इनकी भक्ति और गायन से रिझकर भगवान श्री कृष्ण इनके सामने आ जाते। हरिदास जी मंत्रमुग्ध होकर श्री कृष्ण को दुलार करने लगते। एक दिन इनके एक शिष्य ने कहा कि आप अकेले ही श्री कृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें भी सांवरे सलोने का दर्शन करवाएं। इसके बाद हरिदास जी श्री कृष्ण की भक्ति में डूबकर भजन गाने लगे। राधा कृष्ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदलाव आ गया और गाने लगे।
श्री कृष्ण और राधा ने हरिदास के पास रहने की इच्छा प्रकट की। हरिदास जी ने कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं तो संत हूं। आपको लंगोट पहना दूंगा लेकिन माता को नित्य आभूषण कहां से लाकर दूंगा। भक्त की बात सुनकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और राधा कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में प्रकट हुई। हरिदास जी ने इस विग्रह को बांके बिहारी नाम दिया।
मंदिर की अनोखी परंपराएं (जो इसे दुनिया से अलग बनाती हैं)
नहीं होती मंगला आरती: यहां रोज सुबह की आरती नहीं होती (केवल जन्माष्टमी पर होती है)। मान्यता है कि ठाकुर जी रात में निधिवन में रास रचाते हैं और सुबह एक बालक की तरह देर तक सोते हैं, इसलिए उन्हें जगाया नहीं जाता।
मंदिर में नहीं बजती घंटियां: भगवान के विश्राम में कोई बाधा न आए, इसलिए मंदिर परिसर में शंख या घंटियां बजाने की मनाही है। हर 2 मिनट में गिरता पर्दा: जो भी इस मंदिर में जाता है, वह एक अजीब सी बेचैनी और सुकून दोनों एक साथ महसूस करता है। दर्शन के समय हर दो मिनट में भगवान के सामने पर्दा गिरा दिया जाता है। इसके पीछे एक बेहद भावुक कहानी है। कहा जाता है कि करीब 400 साल पहले एक नि:संतान वृद्ध महिला मंदिर आई। वह घंटों बिना पलक झपकाए बांके बिहारी जी को निहारती रही। उसके मन में इतना गहरा वात्सल्य जागा कि उसने बिहारी जी को ही अपना बेटा मान लिया। चमत्कार तब हुआ, जब वह महिला मुड़कर जाने लगी और बांके बिहारी जी की मूर्ति एक बच्चे की तरह उसके पीछे-पीछे चल पड़ी! पुजारियों ने बहुत मिन्नतें करके भगवान को वापस उनके स्थान पर विराजमान किया। उस दिन के बाद से यह नियम बन गया कि कोई भी भक्त भगवान को लगातार नहीं निहार सकेगा, क्योंकि अगर किसी ने उन्हें फिर से उसी सच्चे प्रेम से देख लिया, तो भगवान उसके साथ चल पड़ेंगे।
मौसम के अनुसार सेवा: गर्मियों में शीतलता के लिए सुगंधित ‘फूल बंगला’ सजता है, तो सर्दियों में मखमल के कपड़े और केसरिया दूध का भोग लगाया जाता है।
चरण दर्शन: पूरे वर्ष भगवान के चरण कपड़ों से ढके रहते हैं। केवल अक्षय तृतीया के दिन ही भक्तों को उनके श्री चरणों के दर्शन का सौभाग्य मिलता है। कहा जाता है उस दिन पूरे एक साल में सिर्फ इसी दिन बांके बिहारी के चरणों के दर्शन होते हैं। इस दिन मंदिर में भारी भीड़ जुटती है। इस दिन भगवान के चरणों के दर्शन बहुत शुभ फलदायी होता है।
शरद पूर्णिमा: साल में केवल इसी दिन बांके बिहारी जी को मुकुट और बांसुरी धारण कराई जाती है।
रहस्य और किंवदंतियां
जयपुर तक गुप्त गुफा: मान्यता है कि मुगलों के समय भगवान की सुरक्षा के लिए मंदिर के नीचे से एक गुप्त आध्यात्मिक मार्ग बनाया गया था, जो सीधा जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर तक जाता था। बांके बिहारी दरबार में तर्क नहीं, केवल आस्था चलती है। कहा जाता है कि जो एक बार उनकी आंखों को देख लेता है, वह बस बांके बिहारी का होकर रह जाता है।
भगवान के दर्शन और पूजा करने से व्यक्ति के सभी संकट मिट जाते हैं और उसका मन कृष्ण लीला में रम जाता है। इनकी पूजा में उनका श्रृंगार विधिवत किया जाता है। उन्हें भोग में माखन, मिश्री,केसर, चंदन और गुलाब जल चढ़ाया जाता है। बांके बिहारी के स्वरूप में आधा राधा का स्वरूप और आधा कृष्ण का।

