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    Home»विशेष»झारखंड की तीन सीटों पर इंडी अलायंस में फंसा पेंच
    विशेष

    झारखंड की तीन सीटों पर इंडी अलायंस में फंसा पेंच

    shivam kumarBy shivam kumarOctober 31, 2024Updated:November 1, 2024No Comments7 Mins Read
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    विशेष
    विश्रामपुर और छतरपुर में कांग्रेस और राजद ने उतार दिये प्रत्याशी
    धनवार में भाकपा माले और झामुमो के बीच नहीं बन सकी बात

    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने का काम पूरा हो गया है। इसके साथ ही दो चरणों में होने वाले झारखंड विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरे योद्धाओं की स्थिति भी लगभग साफ हो गयी है। झारखंड का यह चुनाव मुख्य रूप से झामुमो के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ इंडी गठबंधन और भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के बीच है। सत्तारूढ़ गठबंधन में झामुमो के अलावा कांग्रेस, राजद और भाकपा माले हैं, तो एनडीए में भाजपा के साथ आजसू, जदयू और लोजपा-आर है। अब चुनाव की जो स्थिति बन रही है, उसमें साफ हो गया है कि इंडी गठबंधन में सीट शेयरिंग का मसला नहीं सुलझ सका है, जबकि एनडीए में यह मसला बिना किसी विवाद के पूरी तरह सुलझ गया है। इंडी अलायंस के चारों घटक दलों के बीच तीन सीटों को लेकर पेंच फंसा हुआ है और इन पर अब फ्रेंडली फाइट या दोस्ताना संघर्ष होना तय हो गया है, यानी इन सीटों पर इंडी गठबंधन के प्रत्याशी भाजपा के अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ अपने मित्र दलों के प्रत्याशियों का भी मुकाबला करेंगे। ये सीटें हैं, विश्रामपुर, छतरपुर और धनवार। विश्रामपुर और छतरपुर में जहां कांग्रेस और राजद ने अपने-अपने प्रत्याशी उतार दिये हैं, वहीं धनवार में झामुमो और माले आमने-सामने हैं। इस तरह ये तीन सीटें झारखंड के चुनावी रोमांच को बढ़ा रही हैं।
    इन सीटों पर होनेवाला यह दोस्ताना मुकाबला कैसे और कैसा होगा, इसका स्वरूप अभी तय होना बाकी है, लेकिन इतना तय है कि इंडी अलायंस के घटक दलों के बीच हुए विवाद का लाभ भाजपा को होगा। क्या है इन तीन सीटों का समीकरण और क्या हो सकता है इसका असर, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

    झारखंड की 81 विधानसभा सीटों के लिए 13 और 20 नवंबर को होनेवाले चुनाव के लिए नामांकन की प्रक्रिया खत्म हो गयी है। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने सीटों का बंटवारा आसानी से कर लिया, लेकिन झामुमो के नेतृत्व वाले इंडी ब्लॉक में अंतिम समय तक सीटों का मामला नहीं सुलझा है। तीन सीटों विश्रामपुर, छतरपुर और धनवार में इस गठबंधन के घटक दल आपस में ही मुकाबला करते दिख रहे हैं। इंडी ब्लॉक में झामुमो 43, कांग्रेस 30, लालू यादव की राजद ने छह सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। तीन सीटों, बगोदर, सिंदरी और निरसा में भाकपा माले के प्रत्याशी हैं। एनडीए में भाजपा 68, सुदेश महतो की आजसू 10, नीतीश कुमार की जदयू दो और चिराग पासवान की लोजपा-आर एक सीट पर चुनाव लड़ रही है। इस गठबंधन ने सीटों का बंटवारा आसानी से कर लिया।

    14 सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला, दो पर चार में जंग
    नामांकन प्रक्रिया खत्म होने के बाद जो मुकाबले की जो तस्वीर उभरी है, उसके अनुसार राज्य की 14 सीटें ऐसी हैं, जहां त्रिकोणीय मुकाबला होगा, तो दो सीटों पर चतुष्कोणीय संघर्ष की स्थिति बन गयी है। शेष 65 सीटों पर दोनों गठबंधन आमने-सामने हैं।
    जिन तीन सीटों पर इंडी ब्लॉक के घटक दलों में दोस्ताना मुकाबले की स्थिति है, उनमें विश्रामपुर और छतरपुर में कांग्रेस और राजद आमने-सामने हैं, जबकि धनवार सीट पर झामुमो और माले ने प्रत्याशी देकर मुकाबले को रोचक बना दिया है।

    विश्रामपुर, छतरपुर और धनवार का गणित
    इन तीन सीटों पर इंडी ब्लॉक के घटक दलों के बीच समझौते की गुंजाइश लगभग खत्म हो गयी है। विवाद की शुरूआत कांग्रेस द्वारा विश्रामपुर से सुधीर कुमार कुशवाहा को उम्मीदवार बनने से हुई थी। सीट शेयरिंग समझौते के अनुसार यह सीट राजद के कोटे में गयी थी और उसने सुधीर चंद्रवंशी को अपना प्रत्याशी बनाया था। कांग्रेस द्वारा विश्रामपुर से प्रत्याशी उतारने का बदला राजद ने छतरपुर से लिया। उसने यहां से कांग्रेस के प्रत्याशी राधाकृष्ण किशोर के खिलाफ विजय राम को मैदान में उतार दिया। पलामू प्रमंडल की तीसरी सीट हुसैनाबाद में भी पेंच फंस रहा था, क्योंकि कांग्रेस ने वहां से निर्दलीय नामांकन दाखिल करनेवाले एम तौसीफ को पार्टी का सिंबल दे दिया था। संयोग से उनका नामांकन रद्द हो गया और वहां इंडी ब्लॉक के बीच होनेवाला दोस्ताना मुकाबला टल गया। 2019 में विश्रामपुर और छतरपुर सीट से भाजपा प्रत्याशियों की जीत हुई थी। विश्रामपुर से भाजपा के रामचंद्र चंद्रवंशी जीते थे और छतरपुर से पुष्पा देवी। इस बार भाजपा की तरफ से यही दोनों मैदान में हैं। विश्रामपुर और छतरपुर जैसी स्थिति धनवार सीट पर भी पैदा हुई है। यहां से भाकपा माले ने राजकुमार यादव को टिकट दिया है, जबकि झामुमो ने यहां से निजामुद्दीन अंसारी को प्रत्याशी बनाया है। भाजपा की तरफ से बाबूलाल मरांडी यहां प्रत्याशी हैं, जिन्होंने 2019 में भी जीत हासिल की थी।

    पूर्व के चुनावों में क्या हुआ
    2019 के विधानसभा चुनाव में झामुमो 43 सीट पर लड़ा था, जबकि कांग्रेस 31 और राजद ने सात सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। इसमें झामुमो को 30, कांग्रेस को 16 और राजद को एक सीट पर सफलता मिली थी। उस चुनाव में बाबूलाल मरांडी की तत्कालीन पार्टी झारखंड विकास मोर्चा को भी तीन सीटों पर सफलता मिली थी। बाद में बाबूलाल के भाजपा में शामिल होने पर बचे दो विधायक प्रदीप यादव और बंधु तिर्की कांग्रेस में शामिल हो गये थे। भाकपा माले को एक सीट पर सफलता मिली थी, जिसने हेमंत सरकार को अपना समर्थन दिया था। उस चुनाव में कुल 88 पार्टियों ने अपने उम्मीदवार उतारे थे और निर्दलीय को मिलाकर कुल 1216 प्रत्याशी मैदान में थे। चुनाव में भाजपा को सबसे अधिक 33.37 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। वहीं झामुमो को 18.72 फीसदी, कांग्रेस को 13.88 फीसदी, आजसू पार्टी को 8.1 फीसदी, झाविमो को 5.45 फीसदी और राजद को 2.75 प्रतिशत मत हासिल हुए थे। राजद को सात में से केवल एक चतरा विधानसभा सीट पर सफलता मिली थी, जबकि बाकी छह सीटों, देवघर, गोड्डा, कोडरमा, छतरपुर और हुसैनाबाद में वह दूसरे स्थान पर रही थी। इन सीटों पर हार का अंतर भी डेढ़ हजार से तीन हजार वोटों का रहा था। बरकट्ठा में राजद सातवें स्थान पर था। साल 2014 में झामुमो 19, कांग्रेस छह और राजद शून्य पर था। साल 2009 में झामुमो 18, कांग्रेस 14 और राजद ने पांच सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं साल 2005 में झामुमो को 17, कांग्रेस को नौ और राजद को सात सीटों पर जीत मिली थी।

    इस विवाद का क्या होगा असर
    जहां तक झारखंड में सत्तारूढ़ गठबंधन के आपसी मनमुटाव के खुलकर बाहर आने के असर का सवाल है, तो इन तीन सीटों के अलावा हर सीट पर इसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़ेगा। इस विवाद का पहला मैसेज यही गया है कि इंडी गठबंधन के घटक दलों में अब भी विवाद है। इंडी गठबंधन के सीट शेयरिंग में तय हुआ था कि झामुमो 40 और कांग्रेस 30 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जबकि राजद को सात और भाकपा माले को चार सीटें दी गयीं। अब जबकि विवाद सामने आ गया है, तो राजनीति के जानकारों का मानना है कि यदि तेजी से डैमेज कंट्रोल नहीं किया गया, तो जनता के बीच इसका गलत मैसेज जायेगा। यदि यह विवाद दूर नहीं हुआ, तो हरियाणा जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। वैसे जानकारों का कहना है कि गठबंधन में रहना कांग्रेस, राजद और भाकपा-माले की मजबूरी और जरूरत दोनों है। ये दल जानते हैं कि यदि उन्होंने गठबंधन को नुकसान पहुंचाया, तो इसका सीधा असर उनकी चुनावी संभावनाओं पर पड़ेगा और भाजपा को इसका लाभ मिल जायेगा।

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