विशेष
वैकल्पिक राजनीति का पर्याय मानी जाने वाली आजसू का अस्तित्व खतरे में
अति-आत्मविश्वास और लगातार रणनीतिक चूक से भी सबक नहीं लिया पार्टी ने
सामूहिक निर्णय पर विश्वास नहीं करती पार्टी, चुकाना पड़ा बड़ा खामियाजा
नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
झारखंड की सियासी गाड़ी में इन दिनों विधानसभा चुनाव के परिणाम की समीक्षा का जोर है। खासकर एनडीए खेमा, जिसमें भाजपा और आजसू प्रमुख हैं, चुनावी हार की समीक्षा में जुटे हैं। इस चुनाव ने आजसू पार्टी को सियासी नक्शे से लगभग गायब कर दिया है और कभी झारखंड में वैकल्पिक राजनीति का पर्याय मानी गयी इस पार्टी के सभी बड़े सूरमा चुनावी रणनीति में खेत रहे। उसे केवल एक सीट ही मिली। यह उसका अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है। खास बात यह है कि आजसू पार्टी के सुप्रीमो सुदेश महतो को भी बुरी तरह चुनाव में पराजित होना पड़ा है। इस चुनाव में सुदेश महतो को महज 39 हजार के आसपास वोट आये। इतनी कम संख्या में मतदाताओं का सुदेश महतो के प्रति विश्वास जताना अति चिंता का विषय है। सुदेश महतो ही क्यों, सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी से लेकर डॉ लंबोदर महतो सहित आजसू पार्टी के तमाम नेताओं को यह समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर पार्टी को इतनी बुरी तरह हार का सामना क्यों करना पड़ा। सुदेश महतो को अलग और गंभीर किस्म का राजनीतिज्ञ माना जाता है, लेकिन इस चुनाव परिणाम ने साबित कर दिया है कि खुद सुदेश ने और आजसू पार्टी ने जमीन से कटने की कीमत चुकायी है।
यह भी सच है कि हाल के दिनों में सुदेश महतो उन सभी लोगों से एक तरह से कट गये हैं, जिन्होंने कभी सुदेश महतो के राजनीतिक उत्थान में किसी न किसी रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। उसकी फेहरिश्त काफी लंबी है। जिस सिल्ली को कभी सुदेश महतो का अभेद्य किला कहा जाता था और यहां से खड़े होनेवाले प्रत्याशियों को दूसरे-तीसरे स्थान के लिए संघर्ष करने की बात कही जाती थी, आज वह किला साल दर साल खोखला होता जा रहा है। जिस सिल्ली को सुदेश महतो ने अपने समय का 80 फीसदी समय दिया हो, वहां से उनकी राजनीतिक जमीन का इस तरह कबड़ना यह साबित करता है कि सिल्ली के लोगों में सुदेश महतो के अंदर अब वह बात नहीं दिखती, जो कुछ साल पहले तक दिखती थी। वहां से सुदेश महतो की हार ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि या तो सुदेश महतो वहां की जनता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं या जनता उनसे ऊबती जा रही है। चुनाव परिणाम की समीक्षा के दौरान आजसू पार्टी के कई नेताओं ने रणनीतिक चूक और सामूहिक निर्णय के अभाव की बात को कहा भी। ऐसे पार्टी नेतृत्व के खिलाफ पहली आवाज पश्चिमी सिहभूम के जिला अध्यक्ष प्रवीण कुमार ने 1 नवंबर को ही फेसबुक कर एक पोस्ट डाल कर उठायी थी। पार्टी नेताओं का मानना है कि दरअसल आजसू पार्टी की कमजोरी पार्टी को ऐसे लोगों का निर्देश देना है, जिनका राजनीति से कोई लेना-देना ही नहीं था। पार्टी ने झारखंड के ढाई दशक के इतिहास में कामयाबी की कई कहानियां लिखी तो हैं, लेकिन अपना एक ठोस जनाधार अब तक नहीं बनाया है। दरअसल, पार्टी अब व्यक्ति केंद्रित हो गयी है और सुदेश महतो ही इसके लिए सब कुछ हैं। वहां दूसरे की आवाज या सुझाव का कोई मायने-मतलब नहीं है। ऐसे में किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्ति का महत्वपूर्ण होना न केवल खतरनाक, बल्कि कितना आत्मघाती हो सकता है, यह आजसू पार्टी की वर्तमान स्थिति से समझना आसान है। जिस समय तमाड़ के विधायक विकास सिंह मुंडा आजसू पार्टी को छोड़ रहे थे, तो उन्होंने आजाद सिपाही से बात करते हुए कहा था कि पार्टी में किसी एक व्यक्ति का ही सुना जाता है।
दूसरे की बात कोई मायने नहीं रखती। कहा था कि अगर कोई पार्टी हित में कुछ कहना भी चाहे, तो उसे न सिर्फ नजरअंदाज बल्कि उस व्यक्ति को ही खारिज कर दिया जाता है। ऐसे में इस पार्टी को छोड़ना ही बेहतर विकल्प है। आज की तारीख में विकास सिंह मुंडा की बात सही साबित हो रही है। उन्होंने जब से पार्टी छोड़ी और झामुमो का दामन थामा, तब से उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ रहा है। आजसू पार्टी के लिए इससे दुखद और आश्चर्यजनक भला और क्या हो सकता है, जब रोशनलाल चौधरी जैसे नेता आजसू को छोड़ देते हैं और भाजपा का दामन थाम लेते हैं। भाजपा में शामिल होते ही वह तीन बार की हार से बाहर आ जाते हैं और विधानसभा पहुंच जाते हैं। उमाकांत रजक और योगेंद्र प्रसाद भी उदाहरण हें। खुद सुदेश महतो अपने गढ़ में तीसरी बार पराजित होकर अब क्या रणनीति अपनायेंगे, यह अब तक साफ नहीं है, लेकिन इस चुनाव ने उनके राजनीतिक अवसान की कहानी का प्लॉट जरूर तैयार कर दिया है। अगर सुदेश महतो अब भी नहीं चेते और समय के साथ-साथ लोगों की सही पहचान नहीं की, तो राजनीति की डगर काफी मुश्किल होती जायेगी। क्या है सुदेश महतो की हार का कारण और क्या हो सकता है भविष्य में पार्टी का हश्र बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।
झारखंड में संपन्न विधानसभा चुनाव के बाद पसरे सियासी सन्नाटे के बीच अब एक बड़ा सवाल रह-रह कर गूंज रहा है। यह सवाल है कि अब आजसू पार्टी और खास कर उसके सुप्रीमो सुदेश महतो की रणनीति क्या होगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि आजसू पार्टी ने झारखंड की राजनीति को अलग पहचान दी है और यह पार्टी सामाजिक बदलावों के जरिये राजनीति की नयी लकीर खींचने की बात करती है, लेकिन चुनाव दर चुनाव इसके प्रदर्शन ने इसकी रणनीति पर सवालिया निशान लगा दिया है।
इस बार एक तरह से आजसू का सूपड़ा साफ हो गया
इस विधानसभा चुनाव में एक तरह से आजसू का सूपड़ा साफ हो गया है। अपने ढाई दशक के इतिहास में यह उसका सबसे खराब प्रदर्शन है। पार्टी केवल एक सीट जीत सकी और वह भी महज 231 वोट के मामूली अंतर से। पार्टी सुप्रीमो सुदेश महतो तक अपनी सीट नहीं बचा सके। किसी तरह सिल्ली में वह तीसरे स्थान पर खिसकते-खिसकते बच गये। इस चुनाव परिणाम से यह बात साबित हो गयी कि आजसू पार्टी को न केवल अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने की जरूरत है, बल्कि सुदेश महतो को भी अब सियासत में बने रहने के लिए पार्टी में सामूहिक निर्णय पर अमल करना होगा। इसके साथ-साथ उसे नहीं राह भी तलाशनी होगी। उसे उन तमाम कटे हुए सिपहसालारों और शुभचिंतकों को अपनी तरफ मोड़ने के लिए हठधर्मिता को त्यागना होगा।
सात चुनावों में सुदेश महतो का प्रदर्शन
जहां तक सुदेश महतो के प्रदर्शन का सवाल है, तो इस बार उन्होंने सबसे खराब प्रदर्शन किया। इस बार वह महज 49 हजार 302 वोट ही ला सके। सुदेश महतो पहली बार वर्ष 2000 में चुनाव मैदान में उतरे थे। उस चुनाव में उन्हें कुल 40 हजार 322 वोट (44.69 फीसदी) मिले थे। उन्होंने कांग्रेस के कद्दावर नेता केशव महतो कमलेश को हराया था। उस चुनाव में सिल्ली विधानसभा क्षेत्र में कुल एक लाख 46 हजार 24 वोटर थे, जिनमें से 90 हजार 218 ने वोट डाले थे। इसके बाद 2005 में झारखंड में पहली बार विधानसभा चुनाव हुआ। उस चुनाव में सिल्ली में दो लाख 25 हजार एक सौ वोटरों में से एक लाख 41 हजार 779 ने वोट डाले थे और सुदेश महतो को 39 हजार 281 वोट (27.71 फीसदी) मिले थे। वह लगातार दूसरी बार चुनाव जीते थे। वर्ष 2009 के चुनाव में सिल्ली के कुल एक लाख 67 हजार 840 वोटरों में से एक लाख 17 हजार 147 ने वोट डाले थे। इनमें से 45 हजार 673 (38.99 फीसदी) ने सुदेश महतो को वोट देकर विधानसभा भेजा था। इसके बाद 2014 में पहली बार सुदेश महतो को पराजय का मुंह देखना पड़ा। उस चुनाव में कुल एक लाख 84 हजार 393 वोटरों में से एक लाख 43 हजार 205 ने वोट डाले, लेकिन सुदेश महतो को केवल 50 हजार सात वोट (34.92 फीसदी) मिले और वह हार गये। फिर 2018 में उप चुनाव हुआ और उसमें सिल्ली में एक लाख 94 हजार 497 वोटरों में से एक लाख 47 हजार 517 ने वोट डाले। इनमें से सुदेश महतो को 63 हजार 619 वोट (43.13 फीसदी) वोट मिले और फिर वह अमित महतो की पत्नी सीमा देवी से हार गये। फिर 2019 में सिल्ली के दो लाख पांच हजार 955 वोटरों में से एक लाख 58 हजार 708 ने वोट डाले और सुदेश महतो को 83 हजार सात सौ वोट (52.74 फीसदी) वोट पड़े। वह विधायक चुने गये। लेकिन 2024 में सिल्ली के दो लाख 37 हजार 557 वोटरों में से एक लाख 94 हजार 211 ने वोट डाले। इनमें से सुदेश महतो को केवल 49 हजार 302 वोट (28.74 फीसदी) मिले। वोटरों की संख्या को देखते हुए यह उनके द्वारा हासिल किया गया सबसे कम वोट है।
2014 के लोकसभा चुनाव में रामटहल चौधरी के खिलाफ चुनाव लड़ना बड़ा झटका
2014 के लोकसभा चुनाव में आजसू पार्टी ने अकेले चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया और जमशेदपुर, लोहरदगा और पलामू को छोड़ कर राज्य की बाकी 11 सीटों पर प्रत्याशी उतार दिये। पार्टी प्रमुख सुदेश महतो खुद रांची से उस कद्दावर नेता रामटहल चौधरी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर गये, जिन्हें कुर्मी मतदाताओं के बीच बड़ा चेहरा माना जाता था। उस समय एक नारा भी प्रचलित हो गया था रामटहल चौधरी दिल्ली, सुदेश महतो सिल्ली। उस बार इन 11 सीटों पर आजसू पार्टी को कुल चार लाख 81 हजार 646 वोट मिले थे। पार्टी को कहीं भी सफलता नहीं मिली थी। यह सुदेश महतो के लिए पहला बड़ा चुनावी झटका था। इस झटके ने कुर्मियों के एक बड़े वर्ग में सुदेश महतो के खिलाफ एक ऐसा बीजारोपण कर दिया, जो अब धीरे-धीरे बड़ा आकार ले रहा है और उसका खामियाजा सुदेश महतो को दिन पर दिन भुगतना पड़ रहा है।
रणनीतिक कमजोरी या अति-आत्मविश्वास
चुनावी आंकड़ों की पृष्ठभूमि में यह बात सामने आती है कि आजसू पार्टी और खासकर सुदेश महतो ने जब-जब अपनी जड़ों से कटने की कोशिश की, उसे झटका लगा। उदाहरण के लिए 2014 और 2019 के बीच के दौर को लिया जा सकता है। वह आजसू पार्टी के उफान का दौर था। ऐसा कहा जाने लगा था कि सुदेश महतो ही झारखंड के भविष्य हैं और आजसू पार्टी के पास ही झारखंड के विकास का विजन है। पार्टी में शामिल होनेवालों की कतार लग गयी। आजसू पार्टी का नेतृत्व आंख बंद कर लोगों को अपने खेमे में लाता रहा। उस दरम्यान ऐसे-ऐसे अवसरवादी लोग सुदेश महतो के साथ जुड़ने लगे, जिन्होंने उनकी राजनीतिक साख में बट्टा लगा दिया। एक समय तो ऐसा भी आया, जब आजसू पार्टी में पूर्व में नक्सली रहे लोगों का जमावड़ा लग गया। कुछ गलत लोग भी पार्टी से जुड़ने लगे। उन लोगों ने सुदेश महतो के राजनीतिक गुब्बारे में ऐसी हवा भर दी कि सुदेश महतो को यह लगने लगा कि अब वह अपनी गांव की सरकार बना ही लेंगे। राजनीतिक गुब्बारे में प्रदूषित हवा का ही यह दुष्परिणाम था कि आजसू अपनी असली जमीन को भूल गयी और एक साथ 53 सीट पर उम्मीदवार उतार दिये। इस दरम्यान पार्टी नेतृत्व यानी सुदेश महतो को इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि उनके पास जो लोग हैं, उनमें आजसू के प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता कितनी है। वे कितनी दूर तक आजसू पार्टी का साथ दे सकते हैं। यह बात तब समझ में आयी, जब अधिकांश ने 2019 के चुनाव के बाद पार्टी छोड़ दी। इसके अलावा बीते पांच सालों में जो लोग आजसू पार्टी में शामिल हो रहे हैं, उनमे राजनीतिज्ञों की संख्या कम और कारोबारियों की संख्या ज्यादा है।
अब क्या है सुदेश महतो की चुनौती
अब बात चुनौैतियों की। सुदेश महतो के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती जयराम महतो की पार्टी जेएलकेएम तो है ही, साथ ही उन्हें अपना खोया आधार हासिल करने की चुनौती भी है। सिल्ली के अपने गढ़ को वह तब तक दोबारा हासिल नहीं कर सकते, जब तक सुदेश अपने चारों तरफ एक ऐसा आभा मंडल कायम रखेंगे, जिनका राजनीति से कुछ भी लेना-देना नहीं। सुदेश महतो को यह भी समझना होगा कि अब वह सिर्फ एक जाति की राजनीति करके मैदान में सफलता नहीं पा सकते। उन्हें अपनी कार्यशैली बदलनी होगी। उन्हें यह पहचान करनी होगी कि कौन आजसू के प्रति प्रतिबद्ध है और कौन लाभ लेने के लिए उनकी चाटुकारिता कर रहा है। एक समय ऐसा भी था, जब हर वर्ग के लोग सुदेश महतो से जुड़े थे। वे सुदेश महतो में झारखंड का हितैषी का चेहरा देखते थे। लेकिन आज उनका यह विश्वास डगमगा गया है। या तो सÞुदेश महतो ने ऐसे लोगों से खुद किनारा कर लिया या फिर अपमानित महसूस करते हुए ऐसे लोगों ने खुद अलग राह नाप ली या खामोश बैठ गये हैं। फिलहाल उनके पास जो आभा मंडल और चाटुकारों की फौज खड़ी है, वही उन्हें अपने लोगों से काट रही है। यह बात उन्हें समझनी होगी। सुदेश महतो को झारखंड की राजनीति का कभी डार्क हॉर्स कहा जाता था। उन्होंने झारखंड बनने के बाद से एक कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में अपनी अलग पहचान स्थापित भी की है। उन्होंने हमेशा मुद्दों की राजनीति की है और गंभीरता से अपनी पार्टी की रणनीति निर्धारित की है। विधानसभा में भी उनकी बात सभी पक्ष के सदस्य गंभीरता से सुनते रहे हैं। अपने एक-एक कार्यकर्ता के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ा रहना सुदेश के विशिष्ट गुणों में कभी शामिल था। उनकी यही कार्यशैली उन्हें दूसरे राजनेताओं से अलग करती थी। पिछले एक दशक में अपनी पार्टी का जिस रफ्तार से विस्तार किया, वह किसी अचंभे से कम नहीं था, लेकिन आज सुदेश महतो का पूरा करियर इस सियासी तूफान में फंसा नजर आ रहा है, जिससे निकलने का रास्ता और हौसला भी केवल सुदेश महतो के पास ही है। ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि सुदेश अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करें और चुनौतियों की पृष्ठभूमि में अपने भविष्य का निर्धारण करें।