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    Home»देश»कैथोलिक ईसाई धर्मगुरु पोप फ्रांसिस का 88 वर्ष की आयु में निधन
    देश

    कैथोलिक ईसाई धर्मगुरु पोप फ्रांसिस का 88 वर्ष की आयु में निधन

    shivam kumarBy shivam kumarApril 21, 2025Updated:April 21, 2025No Comments7 Mins Read
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    नई दिल्ली। कैथोलिक ईसाई धर्मगुरु पोप फ्रांसिस का ईस्टर सोमवार को 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने वेटिकन के कासा सांता मार्टा स्थित अपने आधिकारिक निवास पर आखिरी सांस ली। अपोस्टोलिक चैंबर के कैमरलेंगो कार्डिनल केविन फैरेल ने कासा सांता मार्टा से सुबह 9:45 बजे पोप फ्रांसिस के निधन की घोषणा की।

    वेटिकन न्यूज के अनुसार, अपोस्टोलिक चैंबर के कैमरलेंगो कार्डिनल केविन फैरेल ने कहा, प्रिय भाइयों और बहनों! मैं दुख के साथ पवित्र पिता फ्रांसिस की मृत्यु की घोषणा कर रहा हूं। बिशप फ्रांसिस ने आज सुबह 7:35 बजे अंतिम सांस ली। उनका पूरा जीवन प्रभु और चर्च की सेवा के लिए समर्पित रहा। उन्होंने हमें निष्ठा, साहस और सार्वभौमिक प्रेम के साथ नैतिक मूल्यों के साथ जीना सिखाया। उन्हें प्रभु यीशु के सच्चे शिष्य के रूप में अपार कृतज्ञता के साथ सदैव याद किया जाएगा। पोप फ्रांसिस की आत्मा को त्रिदेव ईश्वर के असीम दयालु प्रेम के लिए समर्पित किया जाता है।

    उल्लेखनीय है कि ब्रोंकाइटिस पीड़ित पोप फ्रांसिस को इसी साल 14 फरवरी को रोम के एगोस्टिनो गेमेली अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों ने 18 फरवरी को उनके डबल निमोनिया का इलाज किया। इस अस्पताल में 38 दिन रहने के बाद पोप कासा सांता मार्टा लौट आए थे।

    वेटिकन न्यूज की खबर में कहा गया है कि पिछले साल अप्रैल में पोप फ्रांसिस ने अपने अंतिम संस्कार की रस्मों के लिए लिटर्जिकल बुक के एक अद्यतन संस्करण को मंजूरी दी थी। अपोस्टोलिक समारोहों के मास्टर आर्कबिशप डिएगो रवेली के अनुसार, पोप फ्रांसिस ने अनुरोध किया था कि अंतिम संस्कार की रस्मों को सरल बनाया जाए। आर्कबिशप रवेली ने कहा, ”नए सिरे से किए गए अनुष्ठान का उद्देश्य इस बात पर और भी अधिक जोर देना है कि रोमन पोप का अंतिम संस्कार मसीह के एक पादरी और शिष्य का अंतिम संस्कार है, न कि इस दुनिया के किसी शक्तिशाली व्यक्ति का।”

    एनबीसी न्यूज के अनुसार, पोप फ्रांसिस रविवार को ईस्टर सेवाओं के उत्सव के दौरान सेंट पीटर बेसिलिका की बालकनी पर नजर आए। उन्हें देखने के लिए हजारों लोग वेटिकन के सेंट पीटर स्क्वायर पर एकत्र थे। पोप व्हीलचेयर पर थे। वो बालकनी से डैफोडिल और ट्यूलिप से भरे एक चौराहे की ओर देख रहे थे। उन्होंने हाथ हिलाते हुए सभी को आशीर्वाद दिया और कहा, ”प्रिय भाइयों और बहनों आपको ईस्टर की शुभकामनाएं।” रविवार सुबह ही पोप फ्रांसिस की अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से मुलाकात हुई थी। वेटिकन सिटी के प्रवक्ता के अनुसार, इस दौरान दोनों ने ईस्टर की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान किया। पिछले सप्ताह फ्रांसिस ने आव्रजन मामले पर ट्रंप प्रशासन की सार्वजनिक रूप से निंदा की थी।

    उल्लेखनीय है कि इस बार पोप फ्रांसिस ने ईस्टर मास का नेतृत्व नहीं किया। सेंट पीटर बेसिलिका के सेवानिवृत्त आर्कप्रीस्ट कार्डिनल एंजेलो कोमास्ट्री ने उनकी जगह ली और उनके प्रवचन को पढ़ा। मास समाप्त होने के बाद पोप फ्रांसिस ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच दुनिया भर में शांति के लिए एक अपील की। उन्होंने विशेष रूप से गाजा का जिक्र किया। युद्धविराम और सभी बंधकों की रिहाई का आह्वान किया। पोप ने यूक्रेन, इजरायल, लेबनान और सीरिया में ईसाई समुदायों के लिए प्रार्थना की और आर्मेनिया, अजरबैजान, सूडान, दक्षिण सूडान, म्यांमार, साहेल और हॉर्न ऑफ अफ़्रीका क्षेत्रों और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में चल रहे संघर्ष और पीड़ा का उल्लेख किया।

    उन्होंने पिछले सप्ताहांत पाम संडे पर सेंट पीटर्स स्क्वायर में भीड़ का अभिवादन किया और पवित्र गुरुवार को उन्होंने एक रोमन जेल का दौरा किया। उन्होंने महीने की शुरुआत में वेटिकन में किंग चार्ल्स और क्वीन कैमिला से निजी तौर पर मुलाकात भी की। मार्च में फ्रांसिस को अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद उनकी मेडिकल टीम के प्रमुख ने कहा था कि उन्हें दो महीने तक और आराम की आवश्यकता होगी। यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि पोप फ्रांसिस इस बार कैथोलिक चर्च के जयंती समारोह में शामिल नहीं हुए।

    जॉर्ज मारियो बर्गोग्लियो से पोप बनने तक का सफर
    पोप फ्रांसिस का जन्म 17 दिसंबर 1936 को अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में हुआ था। जन्म के समय उन्हें नाम मिला- जॉर्ज मारियो बर्गोग्लियो। उनके माता-पिता इटली से आए प्रवासी थे। पिता मारियो रेलवे में अकाउंटेंट और उनकी मां रेजिना सिवोरी गृहिणी थी। उन्होंने केमिकल टेक्नीशियन के रूप में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। फिर विला डेवोटो के डायोसेसन सेमिनरी में प्रवेश करते हुए पुरोहिती (प्रीस्टहुड) का रास्ता चुना। 11 मार्च 1958 को उन्होंने सोसाइटी ऑफ जीसस में प्रवेश किया। इसके बाद उन्होंने चिली में मानविकी यानी ह्यूमैनिटी की पढ़ाई पूरी की। फिर वो 1963 में अर्जेंटीना लौट आए और सैन मिगुएल में कोलेजियो डी सैन जोस से दर्शनशास्त्र में ग्रेजुएशन किया। 1964 से 1965 तक उन्होंने सांता फे के इमैक्युलेट कॉन्सेप्शन कॉलेज में साहित्य और मनोविज्ञान पढ़ाया और 1966 में उन्होंने ब्यूनस आयर्स के कोलेजियो डेल साल्वाटोर में भी यही विषय पढ़ाया। 1967-70 तक उन्होंने धर्मशास्त्र का अध्ययन किया और सैन जोस के कोलेजियो से डिग्री ली।

    1969 में प्रीस्ट नियुक्त
    तीन दिसंबर 1969 को उन्हें आर्कबिशप रेमन जोस कैस्टेलानो ने पुजारी (प्रीस्ट) नियुक्त किया गया। उन्होंने 1970 और 1971 के बीच स्पेन की अल्काला डी हेनारेस युनिवर्सिटी में अपनी ट्रेनिंग जारी रखी। 20 मई 1992 को पोप जॉन पॉल द्वितीय ने उन्हें औका का बिशप और ब्यूनस आयर्स का सहायक नियुक्त किया। तीन जून 1997 को उन्हें ब्यूनस आयर्स के कोएडजुटर आर्कबिशप बनाया गया। कार्डिनल क्वारासिनो की मृत्यु के बाद वह 28 फरवरी 1998 को आर्कबिशप बने।

    2001 में कार्डिनल बने
    तीन साल बाद 21 फरवरी 2001 में जॉन पॉल द्वितीय ने उन्हें सैन रॉबर्टो बेलार्मिनो की उपाधि देते हुए कार्डिनल बनाया। उन्होंने अपने फॉलोवर्स से कहा कि वे उन्हें कार्डिनल बनाए जाने का जश्न मामने के लिए रोम न आएं बल्कि यात्रा पर जो खर्चा होता, उसे गरीबों को दान कर दें। उल्लेखनीय है कि कार्डिनल दुनिया भर से आने वाले बिशप और वेटिकन के अधिकारी होते हैं, जिन्हें व्यक्तिगत रूप से पोप द्वारा चुना जाता है। यह अपने खास लाल कपड़ों से पहचाने जाते हैं। इन्हीं कार्डिनल्स के समूह को कॉलेज ऑफ कार्डिनल्स कहा जाता है।

    13 मार्च 2013 को चुना गया पोप
    फरवरी 2013 में पोप बेनेडिक्ट (सोलहवें) ने बुढ़ापे और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का हवाला देते हुए पोप के पद से इस्तीफा दे दिया। अगले पोप के चुनाव के लिए उस साल मार्च की शुरुआत में एक सम्मेलन बुलाया गया। कॉलेज ऑफ कार्डिनल्स की वोटिंग में पांचवें चरण की वोटिंग के बाद 13 मार्च को बर्गोग्लियो को पोप के पद के लिए चुना गया। इसके बाद उन्होंने असीसी के सेंट फ्रांसिस के सम्मान में अपना नाम फ्रांसिस चुना। उन्हें रोमन कैथोलिक चर्च का 266वां पोप माना जाता है।

    मुक्त बाजार की आर्थिक नीतियों का किया विरोध
    पोप फ्रांसिस को कुछ लोग उदारवादी के रूप में देखते हैं। उन्होंने कहा था कि चर्च को समलैंगिक लोगों से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने मुक्त बाजार की आर्थिक नीतियों का विरोध किया। इसी समय उनके कई निर्णय रूढ़िवादी करार दिए गए। 2016 में रोमन कैथोलिक से जुड़ी न्यूज वेबसाइट क्रुक्स के एडिटर जॉन एलन जूनियर ने लिखा कि फ्रांसिस भी स्पष्ट रूप से ‘रूढ़िवादी’ हैं। उन्होंने कहा कि पोप ने अभी तक ‘चर्च की शिक्षा के जुड़े उसके आधिकारिक संग्रह ‘कैटेचिज्म’ में एक कॉमा का भी बदलाव नहीं किया है। उन्होंने महिला पुजारियों को ना कहा है, समलैंगिक विवाह को ना कहा है, गर्भपात को अपराधों में से ‘सबसे भयानक’ बताया है और हर-दूसरे विवादित मुद्दे पर खुद को चर्च का वफादार बेटा घोषित किया है। उल्लेखनीय है कि 2013 पर जब उन्होंने पोप का पद ग्रहण किया उस समय चर्च को वेटिलीक्स घोटालों के आरोप का सामना करना पड़ा।

    कहा था- बाल शोषण चर्च की विरासत पर दाग
    ये आरोप वेटिकन में भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले गोपनीय डॉक्यूमेंट के लीक होने के बाद लगे। एक पोप के रूप में उन्होंने चर्च के भीतर सुधार, भ्रष्टाचार और ‘चाइल्ड एब्यूज के दुखद उदाहरण’ को खत्म करने का लक्ष्य रखा। चाइल्ड एब्यूज यानी बच्चों के यौन शोषण को उन्होंने 2024 में चर्च की विरासत पर एक दाग बताया था। पोप का पद रिक्त होने की आधिकारिक घोषणा के साथ उनके उत्तराधिकारी के चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी। इसके लिए वेटिकन सिटी में कार्डिनल की मैराथन बैठकें होंगी।

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    shivam kumar

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