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    Home»देश»गांधी की पत्रकारिता सिर्फ राजनीतिक नहीं, सामाजिक-सांस्कृतिक और भविष्य की भी हैः रामबहादुर राय
    देश

    गांधी की पत्रकारिता सिर्फ राजनीतिक नहीं, सामाजिक-सांस्कृतिक और भविष्य की भी हैः रामबहादुर राय

    shivam kumarBy shivam kumarFebruary 14, 2026No Comments3 Mins Read
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    भोपाल। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र न्यास के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने कहा कि “समग्र भारतीय पत्रकारिता” किताब के दूसरे खंड को जरूर पढ़ना चाहिए, क्योंकि इसमें 40 साल की पत्रकारिता का जिक्र किया गया है। इस खंड में बताया गया है कि तिलक युग समाप्त हो रहा है और गांधी की पत्रकारिता शुरू हो रही है। गांधी की पत्रकारिता सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भविष्य की भी है।

    वरिष्ठ पत्रकार राय शुक्रवार को नई दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ किताब के लोकार्पण कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र नई दिल्ली के कलानिधि विभाग द्वारा वरिष्ठ पत्रकार-लेखक विजयदत्त श्रीधर की महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ का लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम आयोजित किया गया था। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए अध्यक्ष रामबहादुर राय ने की। विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र रहे।

    कार्यक्रम में वक्ताओं के रूप में वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय, काशी नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ला तथा अन्य विद्वानों ने विचार रखे। स्वागत भाषण कलानिधि विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ ने दिया। संचालन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रो. कृपाशंकर चौबे ने किया।

    कार्यक्रम का शुभारम्भ माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान पर आधारित डॉक्यूमेंट्री से हुआ। वरिष्ठ पत्रकार अंकित शुक्ला ने राज्यसभा उप सभापति हरिवंश का संदेश पढ़ा, जिसमें उन्होंने भारतीय और पश्चिमी पत्रकारिता के अंतर पर प्रकाश डाला।

    अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने पुस्तक के दूसरे खंड (1881-1920) को विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इसमें बाल गंगाधर तिलक से महात्मा गांधी युग के संक्रमण की पत्रकारिता का विस्तृत चित्रण है। उन्होंने श्री अरबिंदो का उद्धरण देते हुए कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समय की सबसे बड़ी चुनौती पहचानना और समाधान के लिए सक्रिय होना है।

    वरिष्ठ पत्रकार व माखनलाल चतुर्वेदी के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि इस किताब के द्वारा उन पहलुओं को छूना है, जिससे बहुत सारे लोग आज भी अनभिज्ञ हैं। पत्रकारिता का एक बड़ा इतिहास रहा है और उन इतिहास को पूरे संदर्भ के साथ रखना इस किताब की विशेषता है। इस किताब में जिन पहलुओं को छुआ गया है,वह सिर्फ पत्रकारिता का विषय ही नहीं है, बल्कि इसमें तत्कालीन समाज, संस्कृति, राजनीति सभी का मिश्रण है. तिलक जैसे लोगों को क्यों और किस कारण से पत्रकारिता करनी पड़ी इस तरह के विषयों की भी जानकारी मिलती है।

    अपने लेखकीय वक्तव्य में विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि यह ग्रंथ व्यक्तिगत प्रयास नहीं, बल्कि पत्रकारिता, नवजागरण और बौद्धिक परंपरा की सामूहिक साधना का परिणाम है। उन्होंने बताया कि 1984 में सीमित संसाधनों से शुरू हुआ सप्रे संग्रहालय आज पाँच करोड़ पृष्ठों की विशाल ज्ञान-संपदा संजोए हुए है।

    वक्ताओं ने पुस्तक को भारतीय पत्रकारिता के इतिहास, भाषा-विकास, समाज-सुधार और राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया का व्यापक दस्तावेज बताते हुए इसे विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और मीडिया कर्मियों के लिए अनिवार्य पठनीय बताया।

    उल्लेखनीय है कि तीन खंडों में प्रकाशित यह ग्रंथ 1780 से 1948 तक की पत्रकारिता यात्रा पहली सदी, तिलक युग और गांधी युग का विस्तृत ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता है तथा स्वतंत्रता के बाद की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं का परिशिष्ट भी समाहित करता है।

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