विभिन्न सामाजिक संगठनों के साथ आम लोगों ने बढ़-चढ़ कर लिया हिस्सा
-उपर बादल और नीचे मांदर की थाप पर जमकर झूमे लोग
रांची। राजधानी सहित समूचे झारखंड में प्रकृति के महापर्व ‘सरहुल’ का उल्लास चरम पर है। चारों ओर मांदर की थाप और पारंपरिक गीतों के बीच आदिवासी समुदाय अपनी जड़ों और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट कर रहा है। राजधानी के मुख्य सरना स्थल पर उत्सव का मुख्य केंद्र रहा, जहां मुख्य पाहन जगलाल पाहन ने प्राचीन विधि-विधान के साथ प्रकृति, पूर्वजों और देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना की। वहीं शहर की ह्रदयस्थ्ली कहे जाने वाले अल्बर्ट एक्का चौर पर आदिवासी समुदाय के लोग एकतृत हुए। इस दौरान विभिन्न सरना समितियों द्वारा भव्य झाकियां निकानी गईं। अपराहन 4 बजे से लोगों की भीड़ यहां जुटने लगी थी, थोड़ी ही देर में अल्बर्ट एक्का चौर पर हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ इस महोत्सव में शामिल हुई। सभी एक-दूसरे को सरहुल महोत्सव की बधाई दे रहे थे। शोभायात्रा में पारंपरिक वेशभूषा में सजे महिला-पुरुष ढोल, नगाड़ा, मांदर और झांझ की थाप पर सरहुल गीतों के साथ नृत्य करते हुए सिरमटोली सरना स्थल की ओर बढ़ते दिखे। वहीं विभिन्न सामाजिक, आदिवासी और राजनीतिक संगठनों द्वारा भव्य स्वागत मंच बनाए गए थे, जहां शोभायात्रा में शामिल लोगों का स्वागत किया गया। मंच पर शोभायात्रा में शामिल प्रतिनिधियों को सरना अंगवस्त्र प्रदान किया गया।
बताते चलें कि सरहुल सरना फूल समिति सबसे पहले अल्बर्ट एक्का चौक पहुंची, जिसके बाद धीरे-धीरे अन्य सरना समितियों की शोभायात्रा भी यहां पहुंचती रहीं। इस दौरान आसमान में घने बादल छाए रहे और बीच-बीच में बूंदा-बांदी भी होती रही। लेकिन बावजूद इसके लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ। वहीं इसके साथ ही शोभायात्रा में शामिल श्रद्धालुओं के बीच विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा चना, गुड़ और शरबत का वितरण किया गया, जो सेवा और सहभागिता की भावना को प्रदर्शित कर रहा था।

