नई दिल्ली। देश में चीनी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। पिछले दो महीनों में खुदरा कीमतों में करीब 40 फीसदी तक उछाल आया है। 18 अगस्त 2026 को चीनी का औसत खुदरा भाव बढ़कर 52.30 रुपये प्रति किलो हो गया, जबकि एक साल पहले यह 46.34 रुपये था। कई शहरों में कीमत 65 रुपये किलो तक पहुंच गई है। इसके बावजूद गन्ना किसानों को इस तेजी का सीधा फायदा नहीं मिल रहा है। देशभर में किसानों का चीनी मिलों पर 16,087 करोड़ रुपये से अधिक बकाया है।
चीनी महंगी होने की 5 बड़ी वजहें
- E20 इथेनॉल नीति: पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य के चलते गन्ने का एक हिस्सा चीनी उत्पादन से हटाकर इथेनॉल निर्माण में जा रहा है। इससे चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई है।
- कम बारिश: इस साल मानसून सामान्य से करीब 13 फीसदी कम रहा। शुरुआती दौर में बारिश की कमी 40 फीसदी से अधिक थी, जिससे गन्ने के उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है।
- घटता चीनी भंडार: 2026-27 सीजन की शुरुआत में चीनी का स्टॉक 40-42 लाख टन रहने का अनुमान है। कुछ आकलनों में यह 32-35 लाख टन तक रहने की बात कही गई है, जबकि देश की सालाना जरूरत करीब 50 लाख टन है।
- त्योहारी मांग: अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के कारण चीनी की खपत बढ़ जाती है। मिठाई, बिस्कुट, कन्फेक्शनरी और पेय उद्योग की मांग भी इस दौरान बढ़ती है।
- निर्यात रोक के बावजूद तेजी: सरकार ने 30 सितंबर तक चीनी निर्यात पर रोक लगा रखी है, लेकिन इसके बावजूद कीमतों में गिरावट नहीं आई। जुलाई में डीलरों के लिए स्टॉक सीमा भी तय की गई थी।
कीमतों पर काबू पाने के लिए सरकार के बड़े कदम
- सरकार ने 20 अगस्त को 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। आयात 31 अक्टूबर 2026 तक शुल्क-मुक्त रहेगा।
- मिठाई, पेय और फूड प्रोसेसिंग जैसे बल्क उपभोक्ताओं के लिए 15 दिन से अधिक का स्टॉक रखने पर रोक लगाई गई है।
- चीनी के निर्यात पर रोक जारी है और सरकार बिक्री व लेन-देन की निगरानी बढ़ा रही है।
- 2026-27 सीजन में इथेनॉल के लिए गन्ने के डायवर्जन को कम करने पर भी विचार किया जा रहा है, ताकि चीनी उत्पादन बढ़ाया जा सके।
चीनी महंगी, लेकिन किसान को पैसा क्यों नहीं?
चीनी की खुदरा कीमत बढ़ने के बावजूद गन्ना किसान भुगतान संकट से जूझ रहे हैं। 16 फरवरी 2026 तक देशभर में 16,087 करोड़ रुपये का गन्ना बकाया था।
- महाराष्ट्र में करीब 4,898 करोड़ रुपये बकाया बताए गए हैं।
- उत्तर प्रदेश में 4,000 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान अटका है।
- कर्नाटक के बेलगावी में मिलों पर 1,500 करोड़ रुपये से ज्यादा बकाया है।
- सहारनपुर की मिलों पर किसानों का करीब 211.58 करोड़ रुपये बकाया है।
- पंजाब में निजी मिलों पर करीब 250 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित बताया गया है।
कानून के मुताबिक किसानों को गन्ना आपूर्ति के 14 दिनों के भीतर भुगतान मिलना चाहिए, लेकिन कई जगह इसका पालन नहीं हो रहा है।
मिलों की कमाई बढ़ी, किसानों का बकाया नहीं घटा
चीनी की एक्स-मिल कीमत करीब 25.60 से 26.22 रुपये प्रति किलो के बीच बताई जा रही है। बाजार में खुदरा कीमत बढ़ने से मिलों के कैश फ्लो पर कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन उसका फायदा किसानों तक नहीं पहुंच रहा है। इथेनॉल नीति को लेकर भी आरोप लग रहे हैं कि इससे मिलों को फायदा हुआ, जबकि किसानों का पुराना भुगतान संकट बना हुआ है।
क्या आयात से चीनी सस्ती होगी?
कुछ राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन तुरंत बड़ी गिरावट की संभावना कम है।
- 10 लाख टन शुल्क-मुक्त आयात से बाजार में अतिरिक्त चीनी आएगी।
- इससे कीमतों में कुछ रुपये प्रति किलो तक नरमी आ सकती है।
- आयातित चीनी को बाजार तक पहुंचने में समय लगेगा।
- त्योहारी सीजन में मांग अधिक रहने से कीमतों पर दबाव बना रहेगा।
- 31 अक्टूबर के बाद आयात व्यवस्था खत्म होने पर आपूर्ति की समस्या फिर उभर सकती है।
जानकारों के मुताबिक आने वाले समय में कीमतों में कुछ नरमी आ सकती है और त्योहारी खरीद के दौरान भाव 50-55 रुपये प्रति किलो के आसपास आ सकते हैं। हालांकि 45-46 रुपये किलो जैसे पुराने भाव जल्द लौटने की संभावना कम है।
असली चुनौती किसानों का भुगतान
चीनी की महंगाई का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि उपभोक्ता ज्यादा कीमत चुका रहा है, लेकिन किसान को उसका बकाया नहीं मिल रहा। जब तक चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति मजबूत नहीं होती और गन्ना भुगतान व्यवस्था में सुधार नहीं किया जाता, तब तक बाजार में चीनी के बढ़े दाम किसानों की आय में वास्तविक बढ़ोतरी नहीं कर पाएंगे।
सरकार के लिए भी चुनौती यह है कि उसे E20 इथेनॉल नीति, चीनी की उपलब्धता, उपभोक्ता कीमत और किसानों के हित के बीच संतुलन बनाना होगा। आने वाले महीनों में इथेनॉल के लिए गन्ने के डायवर्जन में बदलाव और शुल्क-मुक्त आयात का असर चीनी की कीमतों पर निर्णायक हो सकता है।

