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    Home»Top Story»राजनीति में हिम्मत नहीं हारने का दूसरा नाम है बाबूलाल
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    राजनीति में हिम्मत नहीं हारने का दूसरा नाम है बाबूलाल

    azad sipahi deskBy azad sipahi deskSeptember 26, 2019No Comments9 Mins Read
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    कवि हृदय स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्तियां हैं, छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता और टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता। इन पंक्तियों को अपने जीवन में उतारने और आचरण में आत्मसात कर दिखाने का साहस यदि झारखंड का कोई राजनेता कर पाया है, तो वह निश्चित रूप से बाबूलाल मरांडी ही हैं। धुर्वा के जिस प्रभात तारा मैदान में 12 सितंबर को झारखंड को कई योजनाओं की सौगात देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डबल इंजन की सरकार फिर बनाने का आह्वान किया, उसी ऐतिहासिक प्रभात तारा मैदान में झमाझम बारिश के बावजूद 40 हजार से अधिक लोगों की भीड़ जुटाकर बाबूलाल मरांडी ने यह साबित कर दिया कि उन्हें चूका हुआ मानने की भूल यदि राजनीति के पंडित कर रहे हैं, तो अपनी वह भूल वह सुधार लें। जन समागम में बाबूलाल मरांडी ने कहा कि नया झारखंड बनाना उनका सपना है और अगर जनता ने साथ दिया तो हर खेत में वह सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करायेंगे। इस अवसर पर उन्होंने झाविमो की वेबसाइट का भी उद्घाटन किया। इस जन समागम को सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाकर बाबूलाल ने यह साबित किया कि भले ही उनके पास कोई सांसद न हो और विधायक भी इक्का-दुक्का हों। पर अपनी नेतृत्व क्षमता के बूते झारखंड की राजनीति में निर्णायक बदलाव लाने की क्षमता उनमें कल भी थी और आज तो अपने संघर्ष के अनुभवों को संचित करने के कारण कहीं ज्यादा ही है। झारखंड में बाबूलाल मरांडी की राजनीति को रेखांकित करती दयानंद राय की रिपोर्ट।

    विधायक आठ रहे हों या दो और परिस्थितियां पक्ष में रही हों या विपरीत झारखंड की राजनीति में हिम्मत न हारने का अगर कोई पर्याय है, तो वह झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ही हैं। झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बनने से लेकर वर्ष 2014 में अपने छह विधायकों की निर्णायक टूट के बाद भी भाजपा जैसी जंबो जेट नेताओं से भरी राष्टÑीय पार्टी से अपने विधायकों को तोड़ने के बाद भिड़ने का साहस करने का नाम बाबूलाल मरांडी है। ऐसे समय में जब झाविमो के पास एक भी सांसद नहीं हैं और विधायकों के नाम पर भी केवल दो विधायक हैंै। इन तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों में धुर्वा के प्रभात तारा मैदान में चालीस हजार से अधिक की भीड़ जुटाने का काम बाबूलाल मरांडी जैसी शख्सियत ही कर सकती है। झारखंड का पहला मुख्यमंत्री बनने के बाद बाबूलाल मरांडी ने अपने राजनीतिक जीवन में जितने उतार-चढ़ाव देखे हैं उसमें कोई दूसरा राजनीतिज्ञ होता तो या तो समझौता कर लेता या फिर टूट कर बिखर जाता। वर्ष 2019 में कोडरमा से अन्नपूर्णा देवी के हाथों लोकसभा चुनाव हारने के बाद तो विपक्षी दलों ने लगभग यह घोषणा ही कर दी थी कि बाबूलाल मरांडी को झारखंड की जनता ने खारिज कर दिया है। पर बाबूलाल नहीं टूटे। इससे पहले वर्ष 2014 में जब झाविमो के आठ विधायक जीत कर झारखंड विधानसभा पहुंचे, तो उन्हें तोड़ने के लिए भाजपा ने अपनी पूरी ताकत लगा दी और अमर बाउरी, नवीन जयसवाल जैसे छह विधायकों को तोड़ कर खुद में मिला लिया। बाबूलाल मरांडी ने इसके लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी पर मामला उनके पक्ष में नहीं आया। पार्टी के प्रमुख सिपहसलार प्रदीप यादव का नाम रेप के आरोपों में उछलने के बाद बाबूलाल मरांडी ने उन्हें इस्तीफा देने को कहा। ऐसे समय में जब तमाम परिस्थितियां विपरीत हों यह सिर्फ बाबूलाल मरांडी ही कर सकते थे और उन्होंने किया भी। प्रदीप यादव के पार्टी से विलग होने के बाद उन्हें मजबूत सहारा बंधु तिर्की के रुप में मिला। बंधु तिर्की ने झाविमो को फिर से खड़ा करने के बाबूलाल मरांडी के अभियान में उनका भरपूर साथ दिया। संघ की पृष्ठभूमि और प्राइमरी स्कूल शिक्षक की विरासत लिए राजनीति में आये बाबूलाल मरांडी की झाविमो ने विपरीत परिस्थितियों में सदस्यता अभियान चलाकर इसी साल पांच लाख नये सदस्य बनाये। सदस्यता अभियान के सफल बनाने में बाबूलाल मरांडी ने न सिर्फ खुद को झोंक दिया बल्कि कार्यकर्ताओं को भी प्रोत्साहित किया। इसके बाद उनकी अगली चुनौती संसाधनों की कमी के बावजूद धुर्वा के प्रभात तारा मैदान में आयोजित जन समागम को सफल बनाने की थी। संगम गार्डेन में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं में नयी ऊर्जा का संचार किया। बाबूलाल ने पार्टी कार्यकर्ताओं को स्वावलंबन का पाठ पढ़ाते हुए कहा कि भाजपा के अखाड़े में खेलने से बचें और अपना अखाड़ा तैयार करें। कार्यकर्ता बड़े घरानों के चंदा लेने से बचें क्योंकि उनसे वे कुछ लेंगे तो बदले में देना भी होगा। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि इसके बदले झाविमो एक वोट, एक नोट अभियान चलाये और जनता से जुड़े। उन्होंने कहा कि जो झाविमो को एक वोट दे सकता है वह एक नोट भी दे सकता है। अपने इस भाषण से बाबूलाल मरांडी ने झाविमो के कार्यकर्ताओं में एक नयी जान फूंक दी। और बारिश के बावजूद धुर्वा के प्रभात तारा मैदान में आयोजित कार्यक्रम में जुटी चालीस हजार से ज्यादा की भीड़ ने यह बता दिया कि बाबूलाल की धार झारखंड की राजनीति में कभी कमजोर नहीं पड़ सकती। राजनीति में हार-जीत अलग चीज है, पर राजनीतिक जीवन में बाबूलाल मरांडी नाम तो कभी हार न मानने का संकल्प लेकर चलनेवाले राजनेता का नाम है।
    बाबूलाल की ताकत उनका कभी हार न मानने का जज्बा है
    कांग्रेस के पास स्वतंत्रता आंदोलन की मजबूत विरासत है, भाजपा के पास संघ और समर्पित कैडर है। वहीं, झामुमो की ताकत उसकी झारखंड आंदोलन की विरासत है। आजसू के पास भी बिनोद बिहारी महतो के बिचारों की शक्ति और झारखंड आंदोलन की ताकत है। तो बाबूलाल के पास क्या है। इस सवाल का जवाब यह है कि बाबूलाल मरांडी के पास कभी हार न मानने का जज्बा है। भाजपा के थिंक टैंक माने जानेवाले गोविंदाचार्य की तरह उनमें कार्यकर्ताओं को एकजुट करने की ताकत और दृढ संकल्प है। अपनी संगठन शक्ति का भरोसा है और यह भी भरोसा है कि वे हर हाल में जीत की बिसात बिछा सकते हैं। अगर चक्रव्यूह रचते हुए कार्यकर्ता और नेता उनसे दूर कर दिये जायें तो नये कार्यकर्ताओं और नये नेताओं की फौज पैदा कर सकते हैं। और विधानसभा चुनावों में झारखंड की राजनीति में निर्णायक बने रहने के लिए जरुरी विधायक भी जीता सकते हैं। नये प्रयोग कर सकते हैं और पांव धरने की जमीन मिलने के बाद उसपर मजबूत राजनीतिक जमीन बना सकते हैं। असल में बाबूलाल मरांडी की असली ताकत उनकी कभी हार न मानने की जिद है। वर्ष 2000 में जब झारखंड अलग राज्य का गठन हुआ तो बाबूलाल मरांडी इसके पहले मुख्यमंत्री बने। बतौर मुख्यमंत्री अपने कार्यों से उन्होंने झारखंड की राजनीति में मील का पत्थर स्थापित किया। उनके मुख्यमंत्रित्व काल को लोग आज भी याद करते हैं। बिहार से अलग होने के बाद जो झारखंड उन्हें पहले मुख्यमंत्री के रुप में विरासत में मिला था उसमें विपन्नता थी और थी बदहाली की छाया। बाबूलाल ने राज्य की तस्वीर बदलने के लिए खुद को झोंक दिया। उनके नेतृत्व में राजधानी समेत पूरे झारखंड में सड़कों की तस्वीर बदलने लगी। पर उनके डोमिसाइल के एक गलत निर्णय ने जनता का प्यार उनके प्रति कुछ कम कर दिया। बाबूलाल मरांडी को अपनी इस भूल का एहसास था। वर्ष 2014 में जब उनकी पार्टी से आठ विधायक जीते तो भाजपा ने उनकी पार्टी का खुद में विलय कराने की पूरी बिसात बिछाई। पर बाबूलाल ने अपनी राजनीतिक स्वायतता खत्म करने से इंकार कर दिया। यहां यह याद रखा जाना चाहिए कि ऐसी ही परिस्थितियों में जयपाल सिंह मुंडा जैसी शख्सियत ने दबाव में आकर कांग्रेस में झारखंड पार्टी का विलय कर दिया था। पर बाबूलाल नहीं झुके। इसके बाद भाजपा ने उन्हें झटका देते हुए उनके छह विधायकों को तोड़ लिया। बाबूलाल मरांडी के लिए यह बड़ी चोट थी। और कोई नेता होता तो इस चोट से टूट कर बिखर गया होता पर बाबूलाल तो जैसे यह तय कर चुके थे कि तुम दस बार बिगाड़ो और मैं हर बार खड़ा हो जाऊंगा। उन्होंने भाजपा के अपने छह विधायकों के तोड़ने के मामले को कोर्ट में ले जाकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। लड़ने का बाबूलाल मरांडी का स्टैंड सही था पर मामले में नतीजा उनके पक्ष में नहीं आया। सुनवाई के दौरान विधानसभाध्यक्ष दिनेश उरांव ने भाजपा के पक्ष में फैसला सुनाया। पर बाबूलाल नहीं टूटे। उन्होंने झाविमो में विपरीत परिस्थितियों में नया खून भरने का जोखिम उठाया और जन समागम को सफल बनाकर यह साबित कर दिया कि वे टूटने और झूकनेवाले नहीं हैं।
    संघर्ष ने रचा कद्दावर व्यक्तित्व
    11 जनवरी 1958 को गिरिडीह के तिसरी प्रखंड में जन्मे बाबूलाल मरांडी को उनके संघर्षों ने माटी का नेता और फौलादी बनाया है। गिरिडीह कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के दौरान ही वह राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आये। एक साल तक उन्होंने गांव के प्राइमरी स्कूल में शिक्षक का भी काम किया। इस बाद वह संघ परिवार से जुड़ गये। विश्व हिंदू परिषद के झारखंड प्रांत के वह आॅर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी रहे। वर्ष 1983 में वह दुमका चले गये और यहां के गांव-गांव और गली-गली की खाक छान मारी। इस दौरान क्षेत्र के लोगों की गरीबी देखकर उनका हृदय झारखंडी भाइयों के लिए कुछ करने की इच्छा से तड़प उठता। उनकी नेतृत्व क्षमता और सांगठनिक ताकत को देखते हुए भाजपा ने वर्ष 1996 में उन्हें दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़वाया, पर वह हार गये।
    1996 में वे शिबू सोरेन से मात्र पांच हजार वोटों से हारे। उनमें जीत की प्रबल जिजिविषा को देखते हुए पार्टी ने उन्हें इस दौरान झारखंड भाजपा का अध्यक्ष बना दिया। वर्ष 2000 में जब झारखंड बिहार से अलग हुआ और एनडीए सत्ता में आयी, तो झारखंड के बाबूलाल मरांडी पहले मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनते ही सबसे पहला काम बाबूलाल मरांडी ने राज्य के रोड नेटवर्क को दुरुस्त करने का किया। शहरों से भीड़ कम करने के लिए ग्रेटर रांची बनाने का आइडिया भी उन्हीं का था। भाजपा में रहते हुए जब उन्हें यह महसूस होने लगा कि उन्हें साइड लाइन किया जा रहा है, तो हजारीबाग में 24 सितंबर 2006 को झाविमो के गठन की घोषणा की। तब से हालात में भले ही उतार-चढ़ाव आता रहा, लेकिन राजनीतिक झंझावातों के बीच वे अडिग शख्सियत बने रहे हैं।

    Babulal is another name for not losing courage in politics
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