झारखंड में जमीन की राजनीति खूब होती है। यहां उस ‘जमीन’ की बात नहीं होती, जिसे जनता से जुड़ाव के अर्थ में लिया जाता है, बल्कि उस ‘जमीन’ की बात हो रही है, जिस पर अट्टालिकाएं खड़ी होती हैं और उद्योग-धंधे लगते हैं, यानी रीयल इस्टेट की। आज से करीब 20 साल पहले जब झारखंड बना, तो यहां दो चीजें बहुत तेजी से उभरीं और फैलती चली गयीं।