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    Home»विशेष»ग्रामीण विकास का नुस्खा
    विशेष

    ग्रामीण विकास का नुस्खा

    आजाद सिपाहीBy आजाद सिपाहीOctober 20, 2017No Comments5 Mins Read
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    जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख की जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नतीजों पर आधारित विकास की वकालत करते हुए कहा कि ग्रामीण क्षेत्र तीन समस्याओं यानी गरीबी, बीमारी एवं जातिवाद से ग्रस्त है। इनका समाधान होने से ही ग्राम विकास हो पाएगा। इन कमियों को गिनाने एवं समाधान बताने का अवसर भी उचित था, क्योंकि जयंती समारोह के अगले दिन यानी 12 अक्तूबर को डॉ. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि भी थी, जिन्होंने इन समस्याओं का न सिर्फ  अध्ययन किया, बल्कि इनका समाधान भी सुझाया है। डॉ लोहिया ने ‘जाति व्यवस्था’ विषय पर किताब भी लिखी है, जो 1964 में प्रकाशित हुई थी। अगर पुस्तक को देश के राजनेताओं ने पढ़ा होता, और उस पर अमल किया होता, तो आजादी के सात दशक के बाद शायद जातिवाद की बात न होती, क्योंकि दूसरी दो समस्याएं यानी गरीबी एवं बीमारी मुख्यतः जातिवाद का ही उत्पाद हैं। ग्रामीण समाज में जातिवाद गंभीर समस्या है और उसका कारण गांवों की विभिन्न जातियों की सत्ता में प्रभावी भागीदारी न होना है। यानी यह समस्या सत्ता में भागीदारी से जुड़ी है। राजनेताओं के लिए यह कोई नई बात नहीं है, वे इसे भली प्रकार जानते हैं, भले अमल न करें, वह दूसरी बात है।
    डॉ. राम मनोहर लोहिया ने 1946 में गोवा आंदोलन के दौरान इस बीमारी को नजदीक से देखा था। उस समय गोवा आंदोलन मरने के कगार पर था। लगभग 500 लोगों को जेल में भेज दिया गया था, लेकिन अन्य लोग जेल जाने के लिए आंदोलन में भाग नहीं ले रहे थे। इसका मुख्य कारण प्रशासनिक समिति की नीति था। समिति के सदस्य स्वयं जेल नहीं जाना चाहते थे, लेकिन गैर समिति सदस्यों को जेल भेजते थे। यह नीति काम नहीं आई, क्योंकि गोवा के गैर-ब्राह्मणों ने डॉ. लोहिया को बताया कि प्रशासनिक समिति में गैर ब्राह्मणों को भी हिस्सेदारी देकर प्रशासनिक समिति को सभी जातियों की प्रतिनिधि समिति बनाने की जरूरत है, तभी आंदोलन सफल होगा। लोहिया ने प्रशासनिक समिति के सदस्यों को ऐसा करने के लिए कहा। लेकिन आश्चर्य की बात है कि जब नई समिति का गठन हुआ, उसमें भी 11 सदस्यों में से नौ ब्राह्मण थे। इसलिए वंचित समूहों को विशेष अवसर देकर उनकी भागीदारी को प्रभावी बनाना जरूरी है। सत्ता में भागीदारी के साथ-साथ इन जातियों को सांस्कृतिक रूप से भी विकसित करने की जरूरत है। लोहिया ने यह तथ्य सात दशक पहले लिखा था, जिसे आज भी झुठलाया नहीं जा सकता।

    लेकिन सारा दोष अगड़ी जातियों का ही नहीं है, क्योंकि दोषी इसमें पिछड़े भी हैं। अगर सत्ता पर पिछड़ी जातियां काबिज हो जाती हैं, तो वे भी ऐसे ही व्यवहार करती हैं, जैसे समृद्ध जातियां करती आई हैं। गांव में जातिवाद का दृश्य और भी भयानक होता है। प्रतिकार या बदले की भावना ग्रामीण समाज को आगे बढ़ने नहीं देती। गांव के अंदर अनेक मामले दलितों उत्पीड़न कानून के तहत दर्ज होते हैं, जो जातिगत बदले की भावना से भी होते हैं। गांवों में देखा गया है कि अंबेडकर के नाम पर होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों में उनके विचारों पर मंथन करने के बजाय उन्हें देवता बनाने की कोशिश ज्यादा होती है। शोषित समाज जमीनी स्तर पर जाति प्रथा को समाप्त करने की कोशिश नहीं करते। बेहतर होगा कि वे अंबेडकर के विचारों को अमल में लाएं। शोषित समाज की बेहतरी के लिए जरूरी है कि पिछड़ों और दलितों की बस्तियों को पक्की सड़क से जोड़ा जाए, मनरेगा के तहत गरीब परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराया जाए, शिक्षा एवं चिकित्सा संबंधी कार्यक्रमों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाए। स्थानीय स्तर पर इन वर्गों से आने वाले नेताओं और नौकरशाहों को इन वर्गों के प्रति उत्तरदायी बनाना चाहिए। भागीदारी को उत्तरदायित्व से जोड़ना जरूरी है और यह तभी होगा, जब दलित एवं पिछड़े समाजों के परंपरागत विचारों में बदलाए आए। इसके लिए पिछड़ों एवं दलितों का सांस्कृतिक विकास करना जरूरी है।

    अप्रभावी ढंग से लागू पंचायती राज के कारण इनमें आम लोगों की भागीदारी नहीं है। अप्रभावी पंचायती राज के कारण गांवों में जातिवाद की समस्या बढ़ी है। पंचायतों में हर पांच वर्ष के बाद चुनाव होते हैं। इन चुनावों में जातिगत भावना उभार पर होती हैं और पुराने घाव हरे हो जाते हैं। इसलिए पंचायत चुनावों में कई मौतें होती हैं। देश में लाखों ग्राम पंयायतों के पास कार्यालय भवन नहीं है। ऐसी स्थिति में पंचायती राज या तो सरपंच/प्रधान की अलमारी में होता या ग्राम सचिव के बस्ते में। ऐसी कमियां जातिवाद, गरीबी एवं बीमारी को तो बढ़ाएगी ही। क्या केंद्र सरकार या राज्य सरकार या ग्रामीण विकास मत्रांलय या पंचायती राज मंत्रालय को इन तथ्यों का पता नही है?

    गांवों में पंचायतों की बैठकों में प्रधान या सरपंच एवं उनके कुछ खास सदस्य ही भाग लेते हैं, ताकि ग्राम पचायंत का कोरम पूरा हो जाए। उनके अलावा अन्य की भागेदारी नहीं होती है।  ग्राम पंचायत सदस्यों, खासतौर जो अति पिछड़े एवं दलित समाज से होते हैं, उन्हें बैठकों में बुलाया ही नहीं जाता। सभी सदस्यों को बैठक का नोटिस जाना चाहिए, लेकिन नहीं जाता। बैठक की कार्यवाही की एक प्रति ब्लॉक में भी जानी चाहिए, लेकिन नहीं जाती। इसलिए केंद्र व राज्य सरकार को जिले एवं नीचे के अधिकारियों को विकेंद्रीकरण की व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने के लिए सख्त निर्देश देना चाहिए, नहीं तो जातिवाद का जहर असंतोष को बढ़ाएगा। नाना जी देशमुख ने चित्रकुट में दीनदयाल ग्रामीण संस्थान के माध्यम से गांवों में एक योजना चलाई, जिसका नाम समाज शिल्पी दंपति योजना है। इस योजना के तहत जवान दंपति गांव में रहते और गांव के विकास का कार्य करते हैं। इनका मुख्य काम विभिन्न समाजों को एक-दूसरे के साथ जोड़ना है। ऐसे प्रयास नीतिगत स्तर पर चलाए जाने की जरूरत है, ताकि ग्रामीण समाजों में सौहार्द के लिए ये परिवार एक एजेंसी की भूमिका निभाएं।

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