13 महीने पहले झारखंड की पांचवीं विधानसभा के लिए हुए चुनाव में करारी शिकस्त झेलने के बाद दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा राज्य में बेहद सक्रिय दिख रही है। अब यह साफ हो चुका है कि विधानसभा चुनाव में सीटिंग मुख्यमंत्री समेत कई दिग्गजों की पराजय के झटके से पार्टी पूरी तरह उबर चुकी है और एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। पार्टी हर छोटे-बड़े मुद्दे पर प्रतिक्रिया दे रही है और अपने विधायकों-नेताओं को आम लोगों से जुड़े रहने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रम कर रही है। इसके अलावा पार्टी सरकार को घेरने का कोई अवसर नहीं गंवा रही है। विधानसभा चुनाव हारने के तुरंत बाद पैदा हुए कोरोना संकट के दौरान जहां भाजपा के अधिकांश नेता और कार्यकर्ता केवल सोशल मीडिया पर दिखाई दे रहे थे, वहीं अब उन्हें पार्टी के प्रदेश मुख्यालय से लेकर सड़कों पर भी देखा जा सकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रदेश के लिए विपक्ष की यह सक्रियता सकारात्मक संकेत तो देती ही है, साथ ही झारखंड की सियासत में भी हलचल मचा रही है। भाजपा के इस तरह से अचानक सक्रिय होने के पीछे का सियासी गणित चाहे कुछ भी हो, एक बात जरूर है कि इसके कारण सरकार भी सचेत होगी और उसके कामकाज में धार आयेगी। उधर भाजपा की सक्रियता के बाद राज्य की सत्तारूढ़ झामुमो और कांग्रेस पार्टी भी पहले से ज्यादा सजग जिम्मेदार नजर आ रही है। जनता की किसी भी शिकायत पर खुद मुख्यमंत्री संज्ञान ले रहे हैं और तत्काल अधिकारियों को निर्देश देकर समस्या का समाधान निकलवा रहे हैं। उन्होंने हर आम और खास के लिए अपना दरवाज खोल दिया है और कोई भी अपनी समस्या लेकर उनके पास सीधे मुख्यमंत्री आवास पहुंच सकता है। हर दिन वह जनता की समस्याओं को खुद देख-सुन रहे हैं और उसका समाधान निकाल रहे हैं। भाजपा, झामुमो और कांग्रेस की इस सक्रियता के कारणों की पड़ताल करती आजाद सिपाही पॉलिटिकल ब्यूरो की विशेष रिपोर्ट।
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अंतर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं।
पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की एक कविता ‘दो अनुभूतियां’ की दूसरी अनुभूति की ये पंक्तियां आज झारखंड प्रदेश भाजपा के लिए पूरी तरह सच साबित हो रही हैं। ऐसा लगता है कि पार्टी ने अपने संस्थापक और महानतम नेता की इन पंक्तियों को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है और विधानसभा चुनाव में शिकस्त की पीड़ा को भूल कर नये जोश के साथ झारखंड के सियासी मैदान में ताल ठोक कर खड़ी हो गयी है।
आज से करीब 13 महीने पहले दिसंबर 2019 में विधानसभा चुनाव में करारी पराजय झेलने के बाद भाजपा के नेता और कार्यकर्ता सकते में थे। कोई कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था। एक समय तो ऐसा भी आया था कि उसमें विभाजन की अफवाहें फिजाओं में तैरने लगी थीं। इसके बाद कोरोना संकट और लॉकडाउन के दौरान अधिकांश भाजपा सांसदों-विधायकों की चुप्पी ने भाजपा की स्थिति को कुछ ज्यादा ही लचर बना दिया था। लेकिन पिछले दो महीने से पार्टी जिस तरह सक्रिय हो गयी है और इसके नेता-कार्यकर्ता एक्टिव मोड में दिख रहे हैं, उससे यह बात साबित होती है कि झारखंड भाजपा को एक बार फिर प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश और भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी ने पदाधिकारियों-नेताओं के कामकाज को धार दे दी है।
2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ‘65 प्लस’ के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरी थी। इसका कारण उसी साल मई में हुए लोकसभा चुनाव का परिणाम था। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 57 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी और 14 में से 12 संसदीय सीटों पर कब्जा जमाया था। झारखंड भाजपा को विधानसभा चुनाव में यही प्रदर्शन दोहराने की उम्मीद थी, लेकिन 23 दिसंबर को घोषित हुए परिणाम ने उसकी उम्मीद को करारा झटका दिया। पार्टी को महज 25 सीटें ही मिलीं और उसके सीटिंग सीएम तथा तीन मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष तथा कई दिग्गज चुनाव हार गये। इस पराजय के बाद पार्टी के भीतर उथल-पुथल तो मची, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिसे बगावत कहा जा सके। विधानसभा चुनाव के तीन महीने बाद ही कोरोना संकट और लॉकडाउन हो गया, जिस दौरान राजनीतिक गतिविधियां लगभग बंद हो गयी थीं। भाजपा ने विधानसभा के बजट सत्र के दौरान नेता प्रतिपक्ष का मुद्दा जोर-शोर से उठाया, लेकिन लॉकडाउन के दौरान पार्टी के नेता सोशल मीडिया तक ही सीमित हो गये थे। इसका जनता के बीच गलत संदेश जा रहा था।
अब पिछले एक महीने से झारखंड भाजपा एक बार फिर सड़कों पर दिखने लगी है। राज्य सरकार के एक साल पूरा होने पर पार्टी ने उसे कई मोर्चों पर घेरा है। इससे पहले कोरोना काल में हुए राज्यसभा चुनाव में पार्टी अपने विधायकों को एकजुट रखने में न सिर्फ सफल रही, बल्कि तय वोट से ज्यादा ही हासिल किया और एक सीट पर उसके प्रत्याशी की जीत ने विधानसभा चुनाव में हार के गम को थोड़ा हल्का जरूर कर दिया था। इस बीच दुमका और बेरमो का उप चुनाव भाजपा के पक्ष में नहीं रहा। ऐसे भी ये सीटें सत्ता पक्ष के पास ही थीं। सत्ता पक्ष ने दोनों ही सीटों पर दमदार युवा उम्मीदवार भी उतारा था और वे दोनों जीते भी।
इधर प्रदेश के नेताओं ने केंद्रीय नेताओं से मिलने और उनसे टास्क लेने का सिलसिला भी बढ़ा दिया है। प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश की सक्रियता ज्यादा बढ़ी है। संसद सत्र के बाद भी उन्होंने लंबे समय तक दिल्ली में कैंप कर केंद्रीय नेतृत्व से आगे की रणनीति पर मार्गनिर्देश लिया। इधर पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवर दास और विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी भी दिल्ली का दौरा कर चुके हैं। इतना ही नहीं, सौदान सिंह सरीखे पार्टी के केंद्रीय नेताओं का झारखंड दौरा भी शुरू हो गया है। पार्टी नेताओं की इसी आम-दरफ्त ने कार्यकर्ताओं के भीतर भी नयी ऊर्जा का संचार किया है। भाजपा ने अपने विधायकों को सक्रिय बनाये रखने के लिए सिलसिलेवार तरीके से राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी करने का टास्क सौंपा है। हर दिन प्रेस कांफ्रेंस हो रही है। झारखंड के लगभग सभी मुद्दों पर पार्टी के नेता, सांसद और विधायक सक्रिय रूप से प्रतिक्रिया देते हैं और यह उनकी सक्रियता दिखाता है।
हालांकि झारखंड भाजपा की की इस सक्रियता के सियासी मायने भी निकाले जा रहे हैं, लेकिन भाजपा की ओर से फिलहाल इसे खारिज किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल चुनाव तक पार्टी ऐसा कोई कदम नहीं उठायेगी, जिसका विपरीत राजनीतिक परिणाम हो। हालांकि इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि भाजपा झारखंड के सियासी समीकरणों पर बारीकी से नजर रख रही है, लेकिन बिहार का माहौल उसे कोई आक्रामक कदम उठाने से रोक रहा है। राजनीति में कुछ भी निश्चित नहीं होता, इसलिए संभावनाओं के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, लेकिन इतना तय है कि भाजपा की अति सक्रियता से सत्ता पक्ष भी चौकन्ना हुआ है और वह पहले से ज्यादा जनसरोकार की राजनीति पर जोर दे रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद सरकार के कामकाज पर बारीक नजर रखे हुए हैं और किसी भी तरह की सूचना या शिकायत मिलने पर वह तुरंत एक्शन ले रहे हैं। किसी भी स्तर से जब शिकायत उनके पास पहुंच रही है, तो वह पूरी मशीनरी को सक्रिय कर रहे हैं। शिकायत मिली नहीं कि तुरंत अधिकारियों को टास्क सौंप रहे हैं और उसका समाधान कर रिपोर्ट मंगवा रहे हैं। भाजपा की सक्रियता के बाद झामुमो के नेता-कार्यकर्ता भी रेस हुए हैं और उसके हर मूव का वे जवाब दे रहे हैं। वहीं कांग्रेस भी अपने कुनबे को संभालने के लिए सक्रिय हो गयी है। किसान रैली और सदस्यता अभियान के बहाने वह अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं में नयी ऊर्जा का संचार कर रही है। प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव से लेकर तमाम मंत्रियों की सक्रियता बढ़ गयी है। कार्यकर्ता भी रेस हुए हैं।