काठमांडू। इन दिनों नेपाल में अमेरिकी गतिविधियां तेज हो गई हैं। तीन सप्ताह में अमेरिका के तीन अधिकारियों ने नेपाल का दौरा किया है। इन अधिकारियों ने यहां के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ जिस तरह से विभिन्न दौर की बैठकें की हैं, उससे ऐसा लगता है कि अमेरिका यहां की नई सरकार से प्रतिबद्धता चाहता है। अमेरिका की उपमंत्री आफरीन अख्तर दो दिवसीय नेपाल यात्रा के बाद मंगलवार को स्वदेश लौट गईं। अपने दौरे के आखिरी दिन उन्होंने थल सेनाध्यक्ष प्रभुराम शर्मा से मुलाकात की।
पिछले हफ्ते, अमेरिकी सहायता के लिए यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूसएड) की प्रशासक सामंथा पावर ने नेपाल का दौरा किया। उन्होंने प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड से भी मुलाकात की। पावर के दौरे के दौरान यूरोपियन कमिश्नर फॉर इंटरनेशनल पार्टनरशिप जूटा उर्पिलीनिन भी नेपाल में थे। उन्होंने प्रधानमंत्री दाहाल से मुलाकात की थी।
जनवरी के अंत में, एक अन्य उपमंत्री विक्टोरिया नूलैंड ने भी नेपाल का दौरा किया था। तीन हफ्तों में तीन अमेरिकी अधिकारियों ने लगातार नेपाल का दौरा किया। इससे प्रचंड के नेतृत्व वाली नई सरकार के गठन के बाद अमेरिकी सक्रियता देखी जा सकती है।
नेपाल में ताजा अमेरिकी गतिविधि को पूर्व विदेश मंत्री भेश बहादुर थापा वैश्विक कूटनीतिक पैंतरेबाजी के एक हिस्से के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि जब दुनिया भर में युद्ध और अन्य घटनाओं के कारण अराजकता हो तो इसे स्वाभाविक माना जाना चाहिए।
भू-राजनीतिक विश्लेषक डॉ. चंद्रदेव भट्ट अमेरिकी अधिकारियों के लगातार नेपाल दौरे को हताशा की स्थिति बताते हैं। उनका कहना है कि अमेरिका अपने प्रभाव क्षेत्र को खोना नहीं चाहता है और ऐसा लगता है कि वह नई सरकार से प्रतिबद्धता की तलाश कर रहा है।
अमेरिका का नेपाल में सक्रियता का एक लंबा इतिहास रहा है। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों के 75 साल पूरे हो गए हैं। भारत और चीन के बीच होने के कारण अमेरिका की नेपाल में रुचि रही है, जिसका भू-राजनीतिक महत्व है। अतीत में, जब नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा प्रधानमंत्री थे, तो अमरीकियों ने बहुत दौरे किये थे। उस समय अमेरिकी सहयोग एमसीसी संसद द्वारा पारित किया गया था।