- अनियमितता करने वाले अधिकारी के पक्ष में उतरे राज्य के पीसीसीएफ
- मामला एनटीपीसी द्वारा 100 एकड़ में अवैध खनन का
Ranchi | जिस रिर्पोट को सरकार ने विधानसभा में रखा था. उसे झारखंड प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने एक सिरे से नकार दिया है. मामला यह है कि अवैध खनन के दोषियों को बचाने और रिपोर्ट बनाने वाले अधिकारी को बचाने के लिए झारखंड सरकार द्वारा विधानसभा में दिए जवाब को ही वन विभाग गलत साबित करते हुए सरकार को रिपोर्ट भेज दी है. जिसे लेकर शिकायतकर्ता मंटू सोनी ने पीसीसीएफ और विजिलेंस (वन विभाग) के अधिकारी पर विभागीय और कानूनी कार्रवाई के लिए सरकार को पत्र लिखा है. जिसकी प्रतिलिपि राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और ईडी तथा सीबीआई को भी दी गई है. शुभम संदेश इस मामले की पहले से ही परत दर परत खुलासा करता रहा है. फिर इस मामले में एक नया खुलासा सामने आया है |
सरकार की रिपोर्ट सही, या पीसीसीएफ की
हजारीबाग के बड़कागांव में एनटीपीसी की पंकरी बरवाडीह कोल परियोजना के एमडीओ त्रिवेणी-सैनिक माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड द्वारा फॉरेस्ट क्लीयरेंस की शर्तों का उल्लंघन कर 37.20 हेक्टेयर एरिया में अवैध खनन किया गया था. जिसको लेकर विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में झारखंड सरकार ने यह माना था कि अवैध खनन हुआ है और यह मामला वन संरक्षक अधिनियम 1980 के उल्लंघन से संबंधित है एवं वन संरक्षण अधिनियम 1980 की धारा 3 बी के आलोक में प्रतिष्ठान द्वारा किए गए अपराध के लिए उक्त अवधि में प्रतिष्ठान के प्रमुख को दोषी माना जाता है. साथ ही कार्रवाई का निर्णय भारत सरकार द्वारा लिया जाता है. परंतु हजारीबाग के तत्कालीन वन प्रमंडल पदाधिकारी आरएन मिश्रा ने अवैध खनन की पुष्टि होने पर अपनी पहली रिपोर्ट को बदल कर दोषियों पर वन अधिनियम के तहत कार्रवाई के लिए अनुसंशा नहीं की थी. मंटू सोनी की शिकायत पर झारखंड सरकार ने पीसीसीएफ को मुख्य वन संरक्षक (सतर्कता) से जांच करवा कर रिपोर्ट मांगी थी. आठ महीने बाद पीसीसीएफ ने आरएन मिश्रा की रिपोर्ट को सही मानते हुए सरकार को रिपोर्ट भेज दी. जिसमें उनके द्वारा अवैध खनन के दोषियों पर वन अधिनियम के तहत कार्रवाई नहीं करने की अनुसंशा की थी. ऐसे में सवाल उठता है कि झारखंड सरकार ने जो जवाब विधानसभा में दिया वह सही है या पीसीसीएफ ने झारखंड सरकार को जो जवाब भेजा है, वह सही है |
डीएफओ ने बदली रिपोर्ट
एनटीपीसी द्वारा करीब 100 एकड़ में अवैध खनन की पुष्टि विभागीय जांच रिपोर्ट में हुई थी. उपरोक्त रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद पश्चिमी वन प्रमंडल पदाधिकारी आरएन मिश्रा ने वन संरक्षक प्रादेशिक अंचल, हजारीबाग को पत्र लिखकर तीन बिंदुओं पर कार्रवाई की अनुशंसा की थी. पहले बिंदु में अनाधिकृत खनन के लिए उपयोग किए सौ एकड़ एरिया के पांच गुणा एनपीवी वसूलने, दूसरे बिंदु में सौ एकड़ एरिया के पांच गुणा दंड क्षतिपूर्ति पौधरोपण करने और तीसरे बिंदु में एनटीपीसी के कार्यकारी निदेशक प्रशांत कश्यप, विक्रम चंद्र दुबे, अपर महाप्रबंधक ( खनन) और रंजीत प्रसाद उप महाप्रबंधक (खनन) पर वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत 3 ए और 3 बी धाराओं में कार्रवाई की अनुशंसा की गई थी |
लेकिन उसके बाद वन संरक्षक, प्रादेशिक अंचल हजारीबाग के कार्यालय के हवाले से, जिसमें उन्हें एनटीपीसी का पक्ष अंकित करने को कहा गया था. लेकिन आरएन मिश्रा ने एनटीपीसी और उसके एमडीओ त्रिवेणी-सैनिक माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड से सांठगांठ कर आपराधिक षड्यंत्र कर अवैध खनन के दोषियों से ही पक्ष लेकर तथ्यों का गलत विश्लेषण करते हुए वन संरक्षक प्रादेशिक अंचल, हजारीबाग को लिखी अपनी पहली रिपोर्ट को बदल कर वन संरक्षक प्रादेशिक अंचल हजारीबाग को दूसरी रिपोर्ट लिख दी. जिसमें किसी भी अधिकारी को दोषी नहीं बताया और सिर्फ अनाधिकृत खनन के लिए उपयोग किए सौ एकड़ एरिया के पांच गुना एनपी भी वसूलने और सौ एकड़ एरिया में अवैध खनन के पांच गुणा दंड क्षतिपूर्ति करने का अनुशंसा पत्र लिखा और दोषियों को बचाने के लिए पहली रिपोर्ट में वर्णित वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत 3ए और 3 बी धाराओं में कार्रवाई की अनुशंसा को छुपा दिया, ताकि दोषियों को कार्रवाई से बचाया जा सके.