विशेष
भाजपा की नजर 174 हिंदू बहुल सीटों पर रहेगी
फिलहाल 120 मुस्लिम बहुत सीटों में, ममता की झोली में 110
मुस्लिम वोट बैंक भाजपा की जीत में दीवार, तो हिंदू वोट बैंक कर सकता है खेला
कम मार्जिन वाली सीट फैक्टर टीएमसी के लिए डर, तो भाजपा के लिए रोशनी का विषय
डेढ़ करोड़ वोटरों के रिकॉर्ड में गड़बड़ियां, एसआइआर में 68 लाख नाम हट सकते हैं
नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
ठीक 10 साल पहले, यानी 2016 में भाजपा 2014 की बंपर जीत के बाद उत्तर भारत से बाहर अपने विस्तार को लेकर कमर कस चुकी थी। यह वही दौर था, जब असम के बाद पश्चिम बंगाल में भी उदय का सपना भाजपा ने देखा। लेकिन 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को कुछ खास हासिल नहीं हुआ। लेकिन भाजपा के साथ एक सकारात्मक पहलू यह जुड़ा कि लेफ्ट का वोटबैंक भाजपा की तरफ आता दिखा। यह भाजपा के लिए एक संकेत था। इससे उत्साहित भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने पश्चिम बंगाल को लेकर नये समीकरण बनाने शुरू किये और पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। इसका नतीजा यह हुआ कि भाजपा का टकराव सीधे तृणमूल कांग्रेस से हुआ और भाजपा बतौर विपक्ष चर्चा में आ गयी, जहां उसे पूछने वाला कोई नहीं था। भाजपा के इस अभियान और तत्परता का परिणाम भी सफल रहा और 2019 के लोकसभा चुनाव में उसने पश्चिम बंगाल में 18 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। हालांकि, इसके तीन साल बाद 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा सत्ता में तो नहीं आ पायी, लेकिन 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी पार्टी बन कर उभरी। बंगाल के राजनीतिक पंडित खोजते-विचारते रहे कि आखिर लोकसभा में इतनी बड़ी बढ़त के बाद भी विधानसभा चुनाव में भाजपा पीछे कैसे रह गयी। इसके कई कारण रहे, लेकिन एक सबसे बड़ा मुद्दा अल्पसंख्यक वोट, अल्पसंख्यक बहुल सीटें या फिर 10 प्रतिशत से ज्यादा वाली मुस्लिम बहुल वोटरों की कई विधानसभा सीटों पर मौजूदगी। पश्चिम बंगाल में क्या हैं चुनौतियां, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।
विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोट बैंक का समीकरण
पश्चिम बंगाल में 2011 की जनगणना के मुताबिक 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है। लेकिन माना जा रहा है कि 30 फीसदी वोट मुस्लिम हैं। बंगाल की 294 सीटों में 120 सीटों पर मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में हैं। एक तरफ मुर्शिदाबाद जिले में 60 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम हैं, वहीं मालदा और उत्तर दिनाजपुर जिले में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी है। दक्षिण 24 परगना और बीरभूम में 35 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं। उत्तर 24 परगना, कूच बिहार और हावड़ा में 25 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं। बंगाल में 25 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली 112 विधानसभा सीटें आती हैं। राज्य में 46 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम 50 फीसदी और 20 सीटें पर मुसलमानों की आबादी 40 फीसदी से अधिक है। 30 से 35 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है और 50 सीटों पर मुस्लिम 25 फीसदी से अधिक हैं। इस तरह तकरीबन 120 से 140 सीटें ऐसी हैं, जहां पर मुस्लिम मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मुस्लिम ममता बनर्जी की सियासत ताकत
पश्चिम बंगाल में 2011 से ही मुस्लिम वोटर ममता बनर्जी के लिए अहम फैक्टर बने हुए हैं। मुस्लिम वोटों के सहारे ममता बनर्जी लगातार तीन बार सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हो चुकी हैं। 2021 में मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस ने आइएसएफ जैसे मुस्लिम आधार दल के साथ गठजोड़ किया था, लेकिन उसके बाद भी मुसलमान ममता बनर्जी के साथ खड़े रहे थे और कांग्रेस गठबंधन को सिरे से खारिज कर दिया था। सीएसडीएस और लोकनीति का आंकड़ा भी बताता है कि पिछले विधानसभा चुनाव में 87 फीसद मुस्लिमों ने टीएमसी को वोट दिया था। मुस्लिम बहुल सीटें ममता बनर्जी जीतने में एकतरफा सफल रही थीं, जिसके चलते ही भाजपा 2021 में ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर करने में असफल रही। सूबे में 30 फीसदी मुस्लिम बहुल 89 सीटों में से टीएमसी 87 सीटें जीतने में सफल रही थी और 25 फीसदी से ज्यादा वाली सीटों के नतीजे देखते हैं तो 112 सीटों में से 106 सीटें टीएमसी जीतने में सफल रही थी। मुर्शिदाबाद जिले में 60 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं, जहां पर 22 विधानसभा सीटें आती हैं। 2021 में जिले की इन 22 सीटों में से 20 सीटें टीएमसी ने जीती थी और भाजपा को सिर्फ दो सीटें मिली थीं। ऐसे ही मालदा जिले की 12 विधानसभा सीटों में से 8 सीटें टीएमसी और 4 सीटें भाजपा जीत सकी थी। उत्तरी दिनाजपुर जिले में 9 सीटें हंै, जिसमें से 7 सीटें टीएमसी और 2 सीटें भाजपा ने जीती थी। उदाहरण के तौर पर देखें तो मालदा की सुजापुर सीट पर 82 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं और यह सीट टीएमसी 1 लाख 30 हजार की मार्जिन से जीती थीं। मुर्शिदाबाद की डोमकल सीट पर 85 फीसदी मुस्लिम है, जिसे टीएमसी जीतने में सफल रही। ऐसे ही मुर्शिदाबाद की भगवानगोला और रानीगगर सीट पर 80 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं और टीएमसी दोनों ही सीटें जीतने में सफल रही थी। कोलकाता की मटियाबुर्ज सीट पर 75 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं तो दक्षिण 24 परगना की भांगड़ सीट पर 65 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। ये दोनों सीटें भी ममता बनर्जी ने जीती थी।
भाजपा बंगाल में दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी
राजनीति के जानकारों का मानना है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल सीटें भाजपा के लिए सियासी दीवार बन गयी थीं। जिन सीटों पर मुस्लिम आबादी 0-10 फीसदी थी, वहां भाजपा के जीत का ट्रैक रिकार्ड करीब 42 फीसदी रहा। 0-10 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले 77 विधानसभा सीटों में 33 सीटें भाजपा ने जीती थीं। पश्चिम बंगाल में कुल 294 विधानसभा सीटे हैं और किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है। बंगाल में मुस्लिम बहुल करीब 120 सीटें हंै, जिसमें 110 सीटें टीएमसी जीतने में सफल रही और 9 सीटें भाजपा और एक सीट अन्य को मिली थी। वहीं 2021 में ममता बनर्जी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में 110 सीटें जीती थीं, जबकि हिंदू बहुल इलाके की 174 सीटों में से 105 सीटें जीतने में सफल रही थीं। इस समीकरण से ममता बनर्जी 215 सीटें पायीं थीं और चुनाव जीतने में सफल रही थीं। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा बंगाल में दूसरे नंबर की पार्टी जरूर बनने में सफल रही थी, लेकिन ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर नहीं कर सकी थी। राज्य की 294 सीटों में से टीएमसी ने 215 सीटें जीती थीं जबकि भाजपा को 77 सीटें ही मिल सकी थीं। टीएमसी को लगभग 48 फीसदी वोट मिले थे और भाजपा को 38 फीसदी वोटों से संतोष करना पड़ा। भाजपा ने हिंदू बहुल सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया था।
टीएमसी को कहां खेला होने का डर
2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 35 विधानसभा सीटें ऐसी थीं, जिनके नतीजे 5000 से भी कम वोटों में तय हो गये थे। इन 35 सीटों में से भाजपा 22, और तृणमूल कांग्रेस 12 सीटें जीत पायी थी। 2021 में ममता बनर्जी अपनी सीट भाजपा के शुभेंदु अधिकारी से हार गयी थीं, लेकिन टीएमसी को सत्ता दिलाने में सफल रहीं। पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से टीएमसी ने 215 सीटें जीत ली थीं, जबकि भाजपा के खाते में 77 सीटें ही आयी थीं। पश्चिम बंगाल के इन 35 विधानसभा क्षेत्रों में से 12 में लोकसभा चुनाव आते आते समीकरण बदल गये। विधानसभा चुनाव लीड करने वाली पार्टी लोकसभा चुनाव 2024 में पिछड़ चुकी थी। भाजपा ने कम अंतर वाली 5 सीटें जो 2021 में जीती थी, 2024 के आम चुनाव में उन इलाकों में टीएमसी से पिछड़ी हुई पायी गयी और टीएमसी भी ऐसी ही जीती हुई 6 सीटों पर भाजपा से पिछड़ गयी थी। भाजपा ने कम अंतर से 2021 में जीती हुई 16 सीटों पर 2024 में भी बढ़त बरकरार रखी, लेकिन टीएमसी ऐसे सिर्फ 6 सीटों पर ही खुद को आगे रखने में कामयाब हो पायी। जिन 35 सीटों की बात हम कर रहे हैं, 2021 के विधानसभा चुनाव उनमें से 17 सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा वोट सीपीएम ने हासिल किये थे, और ऐसे ही 9 सीटों पर कांग्रेस की पोजीशन दर्ज हुई थी। पश्चिम बंगाल की दिनहाटा सीट पर 2021 में जीत का सबसे कम अंतर दर्ज किया गया था। बीजेपी ने 57 वोटों से टीएमसी को हरा दिया था। पांच साल पहले यह सीट टीएमसी ने जीती थी, जब भाजपा तीसरे पायदान तक ही पहुंच पायी थी, लेकिन बाद में हुए उपचुनाव में टीएमसी ने फिर से दिनहाटा अपने कब्जे में ले लिया। एक और खास बात, 2021 के विधानसभा चुनावों में उन 35 सीटों पर जीत के अंतर का जो औसत 2,680 वोट था, लोकसभा चुनाव तक में यह औसत बढ़कर 13,367 वोट हो गया था।
एसआइआर
पश्चिम बंगाल में एसआइआर का काम अंतिम चरण में है। 28 फरवरी को चुनाव आयोग वोटरों की फाइनल लिस्ट जारी करेगा। पश्चिम बंगाल में इस बार 50 लाख से अधिक वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से बाहर किये जाने की बात कही जा रही है। हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वहां हुए एसआइआरमें 48 लाख वोटरों के नाम काटे गये थे। अब पश्चिम बंगाल में भी बड़े पैमाने पर छंटनी की आशंका है। आंकड़ों के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनावों की तुलना में मतदाताओं की संख्या में 68 लाख (लगभग 9%) तक की गिरावट आ सकती है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 16 दिसंबर को जारी राज्य की ड्राफ्ट एसआइआर लिस्ट में करीब 7.1 करोड़ मतदाता दर्ज थे। इस सूची से लगभग 58 लाख ऐसे वोटर्स के नाम हटाये गये थे, जो अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट पाये गये। वहीं टाइम्स आॅफ इंडिया ने भारत निर्वाचन आयोग के सूत्रों के हवाले से बताया कि अब करीब 10 लाख और नाम हटाये जाने की तैयारी है।
डेढ़ करोड़ वोटरों के रिकॉर्ड में गड़बड़ियां
सूत्रों की मानें तो करीब 1.5 करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड में तार्किक गड़बड़ियां पायीं गयीं या वे ‘अनमैप्ड’ चिह्नित किये गये थे। इन सभी को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए बुलाया गया। इनमें से करीब 3.6 लाख मतदाताओं को बूथ लेवल आॅफिसर (बीएलओ) नोटिस ही नहीं दे पाये, क्योंकि वे उन्हें ढूंढ नहीं सके। अधिकारी के अनुसार- इन 3.6 लाख मतदाताओं के नाम सीधे अंतिम सूची से हटा दिये जायेंगे। इसके अलावा, करीब 5.2 लाख मतदाताओं को सुनवाई का नोटिस मिला, लेकिन वे शनिवार दोपहर 2 बजे तक इआरओ या एइआरओ के सामने पेश नहीं हुए। अब उनके नाम भी हटाये जायेंगे।
एसआइआर का टीएमसी कर रही विरोध
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस एसआइआर का लगातार विरोध करती रही हैं। उन्होंने आशंका जतायी है कि यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से प्रेरित है और इससे वैध मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काटे जा सकते हैं। टीएमसी का कहना है कि एसआइआर के नाम पर लाखों मतदाताओं खासकर गरीब, प्रवासी मजदूर, अल्पसंख्यक और सीमावर्ती इलाकों के लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाये जा रहे हैं। टीएमसी का आरोप है कि इस अभियान का सबसे ज्यादा असर गरीबों, प्रवासी मजदूरों, अल्पसंख्यकों और सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों पर पड़ रहा है, जो अक्सर दस्तावेजी साक्ष्य देने या सुनवाई में शामिल होने की स्थिति में नहीं होते, जिससे उनका वोटिंग अधिकार छिन सकता है।
कांग्रेस एकला चलो की राह पर
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 से पहले कांग्रेस ने एलान किया है कि वह राज्य की सभी 294 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी और किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी। यह फैसला दिल्ली में पार्टी की बैठक के बाद लिया गया, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और राज्य की लीडरशिप मौजूद थी। बैठक के बाद पार्टी के राज्य प्रभारी गुलाम अहमद मीर ने कहा, चर्चा के बाद यह तय किया गया है कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल की सभी 294 सीटों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेगी और उसी हिसाब से तैयारी करेगी। राज्य कांग्रेस का कहना है कि पिछले गठबंधनों से पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर हुआ था और अब पार्टी अपनी ताकत फिर से खड़ी करना चाहती है। यह फैसला ऐसे समय में आया जब राज्य की राजनीति पहले से ही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच तेज ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही है। कांग्रेस का यह कदम चुनावी समीकरणों को और जटिल बना सकता है।
वाम दल अलग मोर्चे की तलाश में
कांग्रेस के इस फैसले से सबसे ज्यादा असर वाम दलों के साथ उसके रिश्तों पर पड़ा है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआइ) के पश्चिम बंगाल सचिव मोहम्मद सलीम ने कहा कि कांग्रेस और वाम दलों का साथ मूल रूप से भाजपा को रोकने की रणनीति का हिस्सा था। उन्होंने कहा, पहले हम अलग-अलग चुनाव लड़ते थे। लेकिन भाजपा को रोकने के लिए हमने विपक्षी वोट को बंटने से बचाने के लिए समय-समय पर साथ काम किया। यह प्रयोग हमने राष्ट्रीय स्तर से पहले बंगाल में शुरू किया था। सलीम का आरोप है कि हाल के समय में कांग्रेस का रुख बदला है। उनके मुताबिक, हमें यह संकेत मिलने लगे थे कि कांग्रेस तृणमूल के साथ नरम रुख रखना चाहती है। अब हम बंगाल में सभी वाम दलों को साथ लेकर एक बड़े वाम मोर्चे के तौर पर चुनाव लड़ेंगे।
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का चुनावी इतिहास गठबंधनों के साथ जुड़ा रहा है। 2006 में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा और उसे 21 सीटें मिली थीं। 2011 में पार्टी ने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और वाम मोर्चे की 34 साल पुरानी सत्ता खत्म करने में अहम भूमिका निभायी। उस चुनाव में कांग्रेस को 42 सीटें मिली थीं। इसके बाद 2016 में कांग्रेस वाम दलों के साथ आई और गठबंधन ने 77 सीटें जीतीं, जिनमें से 44 सीटें कांग्रेस के खाते में गयी। लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में यही गठबंधन एक भी सीट नहीं जीत पाया और कांग्रेस का प्रदर्शन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2016 के बाद वाम और कांग्रेस का वोट बैंक धीरे-धीरे खिसक कर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की ओर चला गया, जिससे राज्य की राजनीति टीएमसी बनाम बीजेपी के मुकाबले में बदलती गयी।
कांग्रेस टीएमसी के साथ टकराव को कम करना चाहती है
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस का यह फैसला अचानक नहीं है। जानकारों का मानना है कि यह गठबंधन टूटना पहले से तय था। राहुल गांधी पश्चिम बंगाल की राजनीति में हाल के समय में लगभग नजर नहीं आये। उन्होंने एसआइआर या राज्य से जुड़े मुद्दों पर अब तक कोई सार्वजनिक टिप्पणी भी नहीं की है। कांग्रेस ने वाम दलों के साथ रहते हुए टीएमसी के खिलाफ तीखी राजनीति करने से दूरी बनायी। ऐसा लगता है कि कांग्रेस टीएमसी के साथ टकराव को कम करना चाहती है।

