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    Home»झारखंड»झारखंड का नासूर बन रहा है रांची का सदर अस्पताल
    झारखंड

    झारखंड का नासूर बन रहा है रांची का सदर अस्पताल

    adminBy adminApril 28, 2021No Comments6 Mins Read
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    झारखंड का एक बड़ा बड़ा कोविड केयर सेंटर, यानी रांची का सदर अस्पताल अपनी तमाम खूबियों के बावजूद इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। तीन सौ कोरोना संक्रमितों का इलाज करनेवाले इस अस्पताल में फैल रही अव्यवस्था कोरोना से जंग में झारखंड सरकार को कमजोर कर रही है। पिछले तीन दिनों से यहां की करीब 30 नर्सें हड़ताल पर थीं और इस कारण कम से कम 10 मरीजों की मौत हो गयी। इन हड़ताली नर्सों की मांग इंसेंटिव के भुगतान की है, जिसे पूरा करने का वादा किया जा चुका है, लेकिन ये अब तक काम पर नहीं लौटी हैं। इसी तरह यहां के कुछ डॉक्टर भी मरीजों का इलाज करने की बजाय अपना हित साधने में लगे हैं। इनके व्यवहार ने राज्य के सबसे बड़े कोविड केयर सेंटर को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। यहां भर्ती कोरोना संक्रमितों के परिजनों को वेरोक-टोक वार्ड में आने-जाने की छूट मिली हुई है, जिससे संक्रमण के फैलने का खतरा बढ़ रहा है। यहां की व्यवस्था की हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक मरीज को इंजेक्शन लगवाने के लिए भी 36 घंटे का इंतजार करना पड़ता है और आॅक्सीजन सिलेंडर बदलने के लिए परिजनों को खुद आगे आना होता है। आपदा के इस दौर में सदर अस्पताल का महत्व सभी को पता है, लेकिन केवल यहां की हड़ताली नर्सों और इलाज की बजाय निजी हित देखनेवाले डॉक्टर ही इसे नहीं समझ रहे हैं। इन्हीं डॉक्टरों और नर्सों की संवेदनहीनता ने पूरे देश में झारखंड की किरकिरी करायी थी, जब हजारीबाग की एक बेटी कोरोना से तड़प रहे अपने पिता के इलाज के लिए सदर के गेट पर हाथ जोड़ रही थी, विनती कर रही थी, लेकिन यहां के डॉक्टर और नर्सों के दिल नहीं पसीजे और उस बेटी ने सदर अस्पताल की देहरी पर अपने पिता को खो दिया। जिस समय की यह घटना है, उस समय झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री सदर अस्पताल में ही थे, लेकिन उन्हें भी तब पता चला, जब अस्पताल के निरीक्षण के बाद वह लौट रहे थे। उन्होंने कहा था: जांच के आदेश दे दिये हैं, दोषी बख्शे नहीं जायेंगे। इस अव्यवस्था को तत्काल दूर करने की जरूरत है। रांची के सदर अस्पताल में फैली अव्यवस्थाओं पर आजाद सिपाही के टीकाकार राहुल सिंह की विशेष रिपोर्ट।

    ‘आज हम काम पर नहीं लौटेंगे, क्योंकि आज हमारा मूड नहीं है।’ कोविड केयर सेंटर की आइसीयू में तैनात नर्सें कहें, 

    यह बात कोई आम कर्मचारी कहे, तो एक मिनट के लिए बर्दाश्त किया जा सकता है, लेकिन यदि यही बात कोरोना के कहर से कराह रहे झारखंड के सबसे बड़ेतो इसे केवल झारखंड का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। रांची के सदर अस्पताल की करीब 30 नर्सें पिछले चार दिन से हड़ताल पर हैं, क्योंकि उन्हें सरकार द्वारा घोषित इंसेंटिव का भुगतान नहीं किया गया है।

    इस हड़ताल के कारण अब तक 10 मरीज दम तोड़ चुके हैं।

    आपदा के इस दौर में नर्सों की इस हड़ताल को अमानवीय ही कहा जा सकता है।
    कोरोना की दूसरी लहर के तेजी से फैलने की शुरूआत में जब रांची के सदर अस्पताल को राज्य के सबसे बड़े कोविड सेंटर के रूप में विकसित करने का काम शुरू किया गया था, तब यह आशंका जतायी गयी थी कि वहां की व्यवस्था इतने अधिक संक्रमितों को संभालने के लिए काफी नहीं है। लेकिन कोई विकल्प नहीं था, इसलिए इसे कोविड केयर सेंटर के रूप में तैयार किया गया। जरूरत के संसाधन उपलब्ध कराये गये, लेकिन करीब एक महीने के बाद ही यहां की व्यवस्था की पोल खुलने लगी है। कोरोना संक्रमितों के इलाज और देखभाल के सारे स्थापित प्रोटोकॉल यहां हर समय दम तोड़ रहे हैं। किसी भी वार्ड में बाहरी लोगों का आना-जाना बिना किसी रोक-टोक के हो रहा है। संक्रमित मरीजों के परिजन उनके पास मौजूद होते हैं, जिसके कारण संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ता जा रहा है। अव्यवस्था का आलम यह है कि गंभीर हालतवाले एक मरीज को रेमडेसिविर इंजेक्शन लगाने के लिए 36 घंटे तक इंतजार करना पड़ा, वह भी तब, जब इस बात की जानकारी झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता को भी थी।

    सेवा की प्रतिमूर्ति कही जानेवाली नर्सों का यह व्यवहार कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता है।
    इस अव्यवस्था के बीच भी कुछ नर्सें और डॉक्टर जी-जान से मरीजों की देखभाल में लगे हैं। इसके कारण कई संक्रमित भी हो चुके हैं, लेकिन सेवा का उनका जज्बा कम नहीं हुआ है। लेकिन इनकी कोशिशें अव्यवस्थाओं के कारण नाकाम साबित हो रही हैं। इन नर्सों और डॉक्टरों की पीड़ा उस समय देखने को मिलती है, जब उनका कोई मरीज दम तोड़ता है और उसके परिजन क्रंदन कर रहे होते हैं। अस्पताल में तैनात एक डॉक्टर ने कहा कि जब अव्यवस्था के कारण उनका कोई मरीज दम तोड़ता है, तो वह इसके लिए खुद को जिम्मेवार मानते हैं। रात-रात भर जगे रह जाते हैं।
    सदर अस्पताल की इस अव्यवस्था को तत्काल दूर करना अब जरूरी हो गया है। राज्य सरकार की कोशिशों को विफल करनेवाली इन नर्सों और डॉक्टरों की पहचान कर उन्हें अलग करने की जरूरत है। अपनी मांग मनवाने और अपना हित साधने के लिए तो बहुत समय पड़ा हुआ है। आपदा के इस समय में इस तरह हड़ताल करना और मरीजों के इलाज में लापरवाही बरतना अमानवीय ही नहीं, आपराधिक भी है। इसलिए अब इसके खिलाफ निर्णायक कदम उठाने का समय आ गया है। इसका सबसे आसान उपाय यह है कि प्रशासन को तमाम सरकारी अस्पतालों में नियंत्रण कक्ष की स्थापना कर देनी चाहिए, जो लगातार वहां की व्यवस्थाओं की मॉनिटरिंग करे। मरीज के भर्ती होने से लेकर उनके स्वस्थ होकर घर लौटने तक का पूरा इंतजाम अस्पताल के डॉक्टरों की बजाय इसी नियंत्रण कक्ष से संचालित हो, ताकि नर्सों और डॉक्टरों को उनकी विशेषज्ञता का काम ही करना पड़े। आपात स्थिति के दौरान कुछ नियमों को शिथिल करना भी एक उपाय हो सकता है, ताकि प्रक्रिया को आसान बनाया जा सके।
    राज्य के सबसे बड़े कोविड सेंटर की बदहाली से पूरे राज्य की छवि खराब हो रही है, इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए। कोरोना से जंग में हर व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है और किसी एक के भी इससे पीछे हटने से जंग हारने का खतरा पैदा हो सकता है। आम लोगों को भी इसका ध्यान रखना चाहिए और कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना होने पर उत्तेजना की बजाय समझदारी से काम लेना चाहिए। यह सच है कि विपरीत परिस्थितियों में साधारण मनुष्य अपना विवेक खो देता है, लेकिन यह समय संयम खोने का नहीं, बल्कि उसे बनाये रखने का है। झारखंड के सबसे बड़े कोविड केयर सेंटर की व्यवस्था में सुधार सभी लोगों के प्रयास से ही हो सकता है और इसकी पहल प्रशासन को करनी होगी। जरूरत पड़े तो कठोर कदम भी उठाया जाना चाहिए।

     

     

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