विशेष
सुगठित रणनीति और चाक-चौबंद समन्वित व्यवस्था ने दिलायी कामयाबी
नोटबंदी से लेकर विकास का रोडमैप, धैर्य और प्रहार से लेकर बेहतर आत्मसमर्पण नीति ने सटीक भूमिका निभाई
अमित शाह ने जो संकल्प लिया उसे पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी
31 मार्च वह तारीख है, जिसका एलान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद के खात्मे के लिए किया था। अब वह तारीख भी निकल चुकी है और इस तारीख से एक दिन पहले ही संसद में केंद्रीय गृह मंत्री ने एलान कर दिया कि अब देश नक्सल मुक्त हो चुका है। ऐसे में अब जब पूरा देश नक्सल मुक्त हो चुका है, तब यह जानना बेहद रोमांचक है कि भारत के लिए नक्सलवाद यानी लाल आतंक की समाप्ति का मतलब क्या है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के पिछले 12 साल के कार्यकाल की यह शायद ऐसी उपलब्धि है, जिसकी जितनी भी तारीफ की जाये, कम है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के निर्देशन में जिस तरह से सुगठित रणनीति और समन्वित अभियानों के जरिये नक्सलवाद को खत्म करने का संकल्प पूरा किया गया, वह दिखाता है कि सुरक्षा बल अब किस तरह काम करते हैं। कहा जाता है कि नक्सलवाद को सामाजिक रूप से ही खत्म किया जा सकता है, लेकिन इस कथन को सुरक्षा बलों ने गलत साबित कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गृह मंत्री अमित शाह ने लाल आतंक से मुक्ति के लिए जो रणनीति तैयार की, वह केवल इसलिए कामयाब हो सकी, क्योंकि इसके पीछे संकल्प था। पहले के समय न सड़कें थीं और दूसरी सुविधाएं भी नहीं थीं। तब विकास नहीं था और नक्सली अपनी पैठ जमा चुके थे। नक्सलियों से लोहा लेने के लिए सुरक्षा बालों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता था। लेकिन अब वह दौर खत्म हो चुका है। अब हालात बदले हैं। सड़कें, बिजली और दूसरी बुनियादी सुविधाएं पहुंच रही हैं। सरकार ने आॅल एजेंसी अप्रोच अपनायी, जिसमें सीएपीएफ, राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाया गया। फंडिंग और सपोर्ट सिस्टम पर प्रहार किया गया। सरेंडर नीति लागू की गयी, जिसमें आत्मसमर्पण करने वालों को आर्थिक मदद और पुनर्वास दिया गया। सरकार ने हर गांव तक अपनी पहुंच बनायी, जिससे नक्सलवाद कमजोर हुआ। रणनीति के हिसाब से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विकास हुआ। हजारों किलोमीटर सड़कें बनीं, मोबाइल टावर लगाये गये, बैंक, एटीएम और डाकघर खोले गये। संचार को मजबूत करने के लिए दुर्गम इलाकों में 2,500 से अधिक मोबाइल टावर लगाये गये। शिक्षा के लिए एकलव्य स्कूल, आइटीआइ और कौशल केंद्र बनाये गये। नोटबंदी ने नक्सलियों के कैश भंडार को भारी नुकसान पहुंचाया। जांच एजेंसियों ने एनआइए और इडी ने नक्सलियों के मददगारों और उनकी संपत्तियों पर शिकंजा कसा, जिससे उनकी रसद और हथियारों की सप्लाई चेन टूट गयी। सरकार ने नक्सलवाद को खत्म करने के लिए जो डेडलाइन तय की थी और उस डेडलाइन में लक्ष्य को लगभग हासिल भी कर लिया है, तो इसके लिए सरकार के साथ सुरक्षाबलों की और उनकी नीतियों की तारीफ होनी चाहिए। क्या है नक्सलवाद, देश में कैसे इसका विस्तार हुआ और कैसे इसका अंत हुआ, बता रहे हैं आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह।
बीते करीब छह दशक से नक्सलवाद भारत के लिए सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती बना हुआ था। हालांकि, 31 मार्च (मंगलवार) इस बड़े खतरे के अंत की घोषणा का दिन साबित हुआ। दरअसल, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2024 के मध्य में छत्तीसगढ़ में हुई कुछ बैठकों में इस तारीख को नक्सलवाद के अंतिम दिन के तौर पर तय करने का प्रण लिया था। इसके बाद से ओड़िशा से लेकर छत्तीसगढ़ और झारखंड से लेकर आंध्र प्रदेश तक न सिर्फ नक्सली नेतृत्व को ध्वस्त किया गया, बल्कि कैडर के कैडर का सफाया कर दिया गया। 30 मार्च को खुद अमित शाह ने लोकसभा में एलान किया कि देश अब लाल आतंक से मुक्त हो चुका है। चौंकाने वाली बात यह है कि 1967 में एक छोटी सी क्रांति के नाम पर शुरू हुआ नक्सल आंदोलन बीते करीब 60 साल से आम लोगों और सुरक्षा बलों के लिए खतरा बना हुआ था।
1967 में नक्सलबाड़ी से हुई थी शुरूआत
नक्सलबाड़ी आंदोलन भारतीय राजनीति और इतिहास की एक ऐसी घटना है जिसने देश की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक-आर्थिक विमर्श को हमेशा के लिए बदल दिया। 1967 में पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव से शुरू हुई यह चिंगारी देखते ही देखते एक बड़ी आग बन गयी।
पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में 1967 में एक छोटे से किसान विद्रोह के रूप में यह जन्मा था। दरअसल, यहां कट्टरपंथी वाम नेताओं ने मजदूरों और किसानों को स्थानीय जमींदारों के खिलाफ एकजुट कर लिया। शुरूआत में तो इस आंदोलन का लक्ष्य अपने अधिकार मांगने तक था, लेकिन बाद में यह हिंसक हो गया। देखते ही देखते नक्सलबाड़ी में किसानों के इस हिंसक आंदोलन का असर पूरे देश में दिखने लगा और जमींदारों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई। यहीं से नक्सलवाद का उभार हुआ। एक के बाद एक बिहार से लेकर ओड़िशा तक कई वाम चरमपंथी संगठनों का उभार हुआ।
1977 में बना भाकपा-माओवादी संगठन
1970 के दशक में यह सभी संगठन एक साथ आ गये और जन्म हुआ-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी का, जो कि चीन के शासक माओ त्से तुंग के आंदोलन से प्रेरित थी और हिंसा के जरिये अपने हक हासिल करने का समर्थन करती थी। इस संगठन ने भारत सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया। एक समय नक्सलवाद बड़े-छोटे स्तर पर 10 राज्यों तक फैला था। उस दौर में वामपंथी उग्रवाद ने भारत में कम से कम 180 जिलों को प्रभावित किया था। सरकारी रिकॉर्ड्स के मुताबिक, 2004 से 2014 के बीच नक्सली हिंसा की 16,463 घटनाएं दर्ज की गयीं। इस दौरान नक्सल हमलों में 1,851 सुरक्षाकर्मियों की जान जाने का भी रिकॉर्ड है। इसी समय में 4,766 आम लोगों की भी जान गयी।
शुरूआती कार्रवाई (1960-70 का दशक)
1967 में नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद जब यह आंदोलन फैलने लगा, तब सरकार ने नक्सलियों पर कड़ी कार्रवाई की। इस कार्रवाई से यह मूल आंदोलन एक तरह से खत्म हो गया। इसके मुख्य विचारक चारू मजूमदार को गिरफ्तार कर लिया गया, जिनकी 1972 में पुलिस हिरासत में मौत हो गयी। हालांकि, यह आंदोलन तब तक सिर्फ नक्सलबाड़ी तक सीमित नहीं था। यह कई और राज्यों में फैल चुका था। केंद्र और राज्य सरकार एक साथ इसे खत्म करने के लिए साथ नहीं आ पायीं।
शांति वार्ता के प्रयास (2004)
जब 2000 के दशक में नक्सली हिंसा अपने चरम पर थी, तब जून 2004 में तत्कालीन अविभाजित आंध्र प्रदेश की मुख्यमंत्री वाइएस राजशेखर रेड्डी (वाइएसआर) की सरकार ने नक्सलियों के साथ शांति समझौता करने की कोशिश की थी। हालांकि, तब भी दोनों पक्षों के बीच गहरे अविश्वास के कारण यह वार्ता कुछ ही महीनों में विफल हो गयी और इसके बाद हिंसा में और तेजी आ गयी।
दंतेवाड़ा हमले के बाद भी बनी रहीं मुश्किलें
2010 में दंतेवाड़ा में हुए एक घातक नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों की जान चली गयी थी। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने अपने 2009 के बयान को दोहराया था और नक्सलवाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कही। हालांकि, एक बार फिर यह कोशिशें समन्वय की कमी से जूझती दिखीं। नतीजतन मई 2013 में नक्सलियों ने एक और बड़े हमले को अंजाम दिया। बस्तर जिले की झीरम घाटी में नक्सलियों ने 29 लोगों को हत्या कर दी, जिसमें कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल भी शामिल थे।
2014 के बाद से कैसे बदली केंद्र-राज्यों की रणनीति
2014 के बाद केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर एक एकीकृत, बहुआयामी और निर्णायक रणनीति तैयार की। 2017 में गृह मंत्रालय ने नक्सलवाद से निपटने के लिए ‘समाधान’ नाम से एक नया सिद्धांत पेश किया। आक्रामक रणनीति, प्रशिक्षण, सटीक खुफिया जानकारी, प्रदर्शन की निगरानी, तकनीक का उपयोग – जैसे ड्रोंस और सैटेलाइट, हर क्षेत्र के लिए अलग योजना और फंडिंग रोकना। संयुक्त अभियान और सटीक खुफिया तंत्र: विशेषज्ञों के मुताबिक, पहले जंगलों में बड़े पैमाने पर की जाने वाली सामान्य तलाशी की जगह अब सटीक खुफिया जानकारी पर आधारित स्ट्राइक ने ले ली। केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों और राज्य की पुलिस इकाइयों के बीच बेहतरीन तालमेल स्थापित किया गया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह और फिर अमित शाह ने खुद इस तालमेल की निगरानी शुरू की। इसके बाद नक्सली कमांड को खत्म करने के लिए केंद्र-राज्य टास्क फोर्स मिलकर काम करने लगे और ड्रोन तथा सैटेलाइट मैपिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाने लगा।
राज्यों का क्षमता निमार्ण:
केंद्र सरकार ने राज्यों की पुलिस और खुफिया तंत्र को मजबूत करने के लिए भारी वित्तीय सहायता दी। राज्यों को दी जाने वाली राशि में 155% की बढ़ोतरी की गयी। सरकार ने 2022 में स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम (एसआइएस) के तहत राज्य के स्पेशल फोर्सेज और स्पेशल इंटेलिजेंस ब्रांच को भी मजबूत किया। पिछले 10 वर्षों में राज्य पुलिस के लिए नक्सल प्रभावित इलाकों में 586 किलेबंद पुलिस स्टेशन बनाये गये, जिससे पुलिस की पकड़ मजबूत हुई।
फंडिंग नेटवर्क को पूरी तरह तोड़ना:
केंद्र सरकार की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने भी नक्सलवाद की कमर तोड़ने में अहम भूमिका निभायी है। एनआइए ने नक्सलवाद विरोधी एक अलग विंग बनाया। इसके अलावा एजेंसी ने प्रवर्तन निदेशालय (इडी) और राज्य की एजेंसियों ने मिलकर संयुक्त रूप से कार्रवाई करते हुए नक्सलियों की लगभग 92 करोड़ रुपये की संपत्तियां जब्त की। सुरक्षा बलों की आवाजाही और स्थानीय लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए केंद्र और राज्यों ने मिलकर रेड कॉरिडोर में 12 हजार किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया। इसके अलावा दुर्गम इलाकों में खुफिया जानकारी और संचार को बेहतर बनाने के लिए 8,500 से अधिक 4जी मोबाइल टावर चालू किये गये।
आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति में मजबूती:
आत्मसमर्पण नीति के तहत बड़े माओवादी नेताओं को हथियार डालने पर पांच लाख रुपये, निचले कैडर को ढाई लाख रुपये और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए 36 महीने तक 10 हजार रुपये का मासिक वजीफा देने की योजना लागू की गयी।
सुरक्षा और घेराबंदी
छत्तीसगढ़, झारखंड और ओड़िशा के ‘कोर जोन’ में सीआरपीएफ और कोबरा कमांडोज की भारी तैनाती की गयी। सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के गढ़ के अंदर घुसकर नये कैंप स्थापित किये। इससे नक्सलियों का फ्री मूवमेंट बंद हो गया और वे छोटे इलाकों में सिमट गये। नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में अब यूएवी और नाइट विजन उपकरणों का व्यापक उपयोग।
बड़े नक्सल चेहरों के खात्मे से तय हुआ नक्सलवाद का अंत
नंबाला केशव राव उर्फ बसवराजू: यह भाकपा (माओवादी) का महासचिव और संगठन का सर्वोच्च रणनीतिकार था। मई 2025 में छत्तीसगढ़ के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले नक्सली गढ़ अबूझमाड़ में हुए एक बड़े आॅपरेशन में इसे 26 अन्य नक्सलियों के साथ मार गिराया गया।
माडवी हिडमा:
यह केंद्रीय समिति का खूंखार कमांडर था और 2010 में 76 सीआरपीएफ जवानों की जान लेने वाले दंतेवाड़ा हमले का मुख्य मास्टरमाइंड था। नवंबर 2025 में आंध्र प्रदेश-छत्तीसगढ़ सीमा पर हुई एक लंबी मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने इसे ढेर कर दिया।
प्रताप रेड्डी रामचंद्र रेड्डी उर्फ चलपति:
केंद्रीय समिति का यह वरिष्ठ सदस्य नक्सलियों की रसद, भर्ती और विभिन्न राज्यों के बीच समन्वय का काम देखता था। जनवरी 2025 में छत्तीसगढ़-ओड़िशा सीमा के पास हुए एक संयुक्त अभियान में इसे मार गिराया गया।
अन्य शीर्ष नेता:
इन बड़े चेहरों के अलावा, कट्टा रामचंद्र रेड्डी, कदारी सत्यनारायण रेड्डी, गजरला रवि, सहदेव सोरेन, बालकृष्ण, नरसिम्हा और चेलम जैसे केंद्रीय समिति के कई अन्य सदस्य भी हाल के अभियानों में मारे गये हैं। फरवरी 2026 में हुए एक अन्य एनकाउंटर में प्रभाकर राव, पारकल वीर, स्वामी, पडकाला स्वामी और लोकेटी चंदर राव समेत सात नक्सली नेताओं को मार गिराया गया।
आंकड़ों की बात करें, तो 2024 और 2025 के दौरान कुल 28 शीर्ष नक्सली नेताओं को ढेर किया गया है, जिनमें से छह केंद्रीय समिति के सदस्य थे। इन शीर्ष कमांडरों के खात्मे से माओवादी संगठन का ढांचा और उनकी सैन्य ताकत लगभग पूरी तरह से ढह गयी है।
मौजूदा समय में देश में नक्सलवाद की स्थिति
मौजूदा समय (2026) में भारत में नक्सलवाद या वामपंथी उग्रवाद का फैलाव अपने सबसे निचले स्तर पर आ चुका है। केंद्र-राज्य सरकारों के अलावा कई स्वतंत्र संगठनों ने भी पुष्टि की है कि कभी कई राज्यों में फैला विशाल रेड कॉरिडोर अब लगभग खत्म होने की कगार पर है। जहां 2014 में देश के 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर मात्र 11 रह गयी थी। फरवरी 2026 में गृह मंत्रालय की एक समीक्षा बैठक में सामने आया कि अब देश में केवल सात जिले ही वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित बचे हैं। इसके अलावा 2014 में 36 जिले नक्सलवाद से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों की श्रेणी में आते थे, जिनकी संख्या अब घटकर सिर्फ तीन रह गयी है।
कैडरों की घटती संख्या
फरवरी 2026 की एक खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में जहां 2,000 से अधिक सशस्त्र माओवादी थे, वहीं अब पूरे देश में केवल 220 सशस्त्र माओवादी कैडर ही बचे हैं। सुरक्षाबलों के लगातार अभियानों (जैसे- आॅपरेशन आॅक्टोपस और डबल बुल) के जरिये पिछले तीन दशकों से नक्सलियों के कब्जे वाले बूढ़ा पहाड़, पारसनाथ, बरमसिया और चकरबंधा (बिहार) जैसे बड़े गढ़ों को पूरी तरह से मुक्त करा लिया गया है। साथ ही अबूझमाड़ (छत्तीसगढ़) जैसे अभेद्य माने जाने वाले जंगलों में भी सुरक्षाबलों ने स्थायी कैंप स्थापित कर लिये हैं।
सरेंडर के साथ-साथ पुनर्वास पर जोर
सरकार एक तरफ नक्सलियों के सरेंडर पर जोर दे रही है, तो वहीं दूसरी तरफ सरेंडर कराने के बाद उनके पुनर्वास पर भी फोकस कर रही है। इसके लिए पहले से ही पूना मारगेम या नयी सुबह जैसी नीति चलायी जा रही है, जिसका उद्देश्य आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटाना है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के विकास पर ध्यान
सरकार नक्सल से प्रभावित इलाकों के विकास पर अब ज्यादा ध्यान दे रही है। नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस कैंप के आसपास स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ शिक्षा पर ध्यान दिया जा रहा है, ताकी पढ़-लिखकर आदिवासी युवा नक्सलवाद की हकीकत को समझ पायें। इसके अलावा सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं को ठीक करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
जागरूकता फैलाने पर कर रहे फोकस
गृह मंत्री अमित शाह देश से नक्सलवाद खत्म होने का एलान कर चुके हैं। ऐसे में अब सरकार का पूरा फोकस है कि किसी भी तरह से दोबारा नक्सलवाद फैलना शुरू न हो। इसके लिए एक वर्क प्लान बनाया गया है, जिसके तहत नक्सल प्रभावित इलाके के लोगों, खासतौर पर युवाओं को शिक्षा के साथ-साथ रोजगार से भी जोड़ा जायेगा, ताकी वे आतंक के रास्ते पर ध्यान न देकर मुख्यधारा से जुड़ें।
बंदूक की लड़ाई से हटा सरकार का फोकस
कुल मिलाकर सरकार का फोकस अब गन फाइट (बंदूक की लड़ाई) से हटकर आत्मसमर्पण और नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने का है। इसके लिए नक्सलवादियों के सरेंडर पर सबसे ज्यादा फोकस किया जा रहा है और उम्मीद यही की जा रही है कि आगे भी सरकार इस नीति पर सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित कर सकती है। मोदी सरकार के दौरान नक्सलियों के ‘शीर्ष नेतृत्व’ का सफाया या गिरफ्तारी और सुरक्षा बलों के ‘प्रो-एक्टिव’ रुख ने इस आंदोलन की कमर तोड़ दी है। अब यह आंदोलन केवल छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे कुछ सीमित इलाकों तक सिमट कर रह गया है।

