नई दिल्ली/ बीजिंग: ओबामा शासन में भारत अमेरिका की दोस्ती के चर्चे तो बखूबी सुने होंगे लेकिन जैसे ही अमेरिका की सत्ता बदली वैसे ही हरत को लेकर हालत भी बदलने लगे हैं। अमेरिका ने एकबार फिर से भारत को झटका दिया है। अमेरिका आगामी होने वाले वन वेल्ट वन रोड फोरम में शामिल होने का एलान किया है। अमेरिका के इस कदम भारत के साथ धोखा और विश्वासघात के समान माना जा रहा है।

चीन के पेइचिंग में इसी 14 और 15 मई को ‘वन बेल्ट वन रोड’ (ओबीओआर) फोरम की बैठक होने वाली है। बैठक पर भारत पहले से ही चिंतित था वहीँ अमेरिका और नेपाल ने भारत की चिंता को दुगना कर दिया है। इस बैठक में अमेरिका के नये शासन ने भाग लेने का एलान किया है। जिसके बाद भारत के लिए एक बड़ी मुश्किल घडी आन पड़ी है। पहले भारत के साथ मध्यस्था दिखाने वाला अमेरिका ने इसपर अचानक यू-टर्न ले लिया है। दूसरी तरफ चीन की इस महत्वाकांक्षी योजना में अब नेपाल भी जुड़ गया है।

 

अब भारत ही बचा है जो इसमें शामिल नहीं हो रहा है। वहीँ इस योजना में सहमति नहीं जताने वाले इस देश ने भारत को अकेला छोड़ते हुए शुक्रवार को इस परियोजना में शामिल होने के लिए हस्ताक्षर कर दिए। चीन के ओबीओआर प्रोजेक्ट में शामिल न होने वाले देशों में भूटाने के अलावा नेपाल दूसरा देश था। भूटान के चीन से किसी भी प्रकार के राजनयिक रिश्ते नहीं हैं। वहीँ नेपाल और अमेरिका ने ऐन मौके पर अपने फैसलों में बदलाव कर भारत को मुश्किल में डाल दिया है।

बतादें कि चीन के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में शामिल न होने वाला भारत दक्षिण एशिया का अकेला देश रह गया है। दोनों देशों का यह कदम भारत पर काफी दबाव डालने वाला है, क्योंकि अभी तक भारत ने चीन के ‘वन बेल्ट, वन रोड’ समिट में अपना प्रतिनिधि भेजने पर कोई निर्णय नहीं लिया है। भारत की संप्रभुता की उपेक्षा करते हुए चीन इसे गिलगित-बाल्टिस्तान इलाके से गुजार रहा है जिस पर भारत अपना दावा पेश करता है। वहीँ नेपाल के भी इस फोरम में शामिल होने के तुरंत बाद ही चीन के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भारत के खिलाफ नफरत से भरे बयान दिए।

विशेषज्ञों ने कहा कि भारत अगर इस योजना में शामिल नहीं हुआ, तो उसे भविष्य में दक्षिण एशिया में अलग कर दिया जाएगा। चीन के विशेषज्ञों ने भारत को चेतावनी देने के साथ ही कहा है कि अगर भारत के सभी पड़ोसी इस योजना में शामिल होते हैं और भारत शामिल नहीं होता है, तो पड़ोसी देश भारत पर सवाल खड़े करेंगे।

आखिर क्या है वन वेल्ट वन रोड (ओबीओआर)

चीन की यह एक प्रभावशाली बड़ी परियोजना है। जिसमें वह सभी  देशों का सर्मथन और सहयोग चाहता है, लेकिन भारत ने इसी अपने साथ छल करने जैसा देख रहा है। साथ ही चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा है। चीन सीपीईसी के जरिए शिनजियांग को ग्वादर बंदरगाह से जोडऩे की फिराक में है जिसे उसने बलूचिस्तान में बनाया है। इसपर भारत कड़ी आपत्ति जता चुका है। इसी कारण भारत ने इस फोरम में शामिल न होने का मन बना लिया है। हालांकि, भारत अगर ओबीओआर फोरम में अभी अपना कोई प्रतिनिधि नहीं भेजता है तो भी इससे भारत को कोई खास नुकसान नहीं होने वाला है, क्योंकि ओबीओआर सदस्यता आधारित संगठन नहीं है, बल्कि हो सकता है भविष्य में भारत के इस कदम की तारीफ की जाए कि वह अपने सैद्धांतिक पक्ष पर खड़ा रहा।

 

बता दें कि चीन में रविवार को होने वाली इस बैठक में 50 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि भाग लेंगे, जबकि 28 देशों के नेता भी शिरकत करेंगे। इन नेताओं में रूस से राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी शामिल हैं। विशेषज्ञों की माने तो भारत इसमें जूनियर लेबल के अधिकारीयों को भेज सकता है। इसके साथ ही इस फोरम में कुछ भारतीय विशेषज्ञ भी शामिल होंगे।

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