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    Home»Top Story»सिमडेगा में आदिवासी और इसाई मतदाताओं को साधा
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    सिमडेगा में आदिवासी और इसाई मतदाताओं को साधा

    azad sipahi deskBy azad sipahi deskMay 3, 2019Updated:May 3, 2019No Comments5 Mins Read
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    कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी की दूसरी झारखंड यात्रा ने प्रदेश के राजनीतिक हलकों में थोड़ी हलचल जरूर पैदा की है। इस चुनाव में एक बात नोट करनेवाली है कि कांग्रेस के पास अग्रिम पंक्ति के नेताओं का भयंकर टोटा है। इसलिए राहुल गांधी ने इतनी देर से झारखंड में चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत की है। गुरुवार को वह सिमडेगा में थे, जहां उन्होंने खूंटी समेत अन्य संसदीय सीटों पर यूपीए प्रत्याशियों के समर्थन में वोट मांगा। अपने भाषण के दौरान उन्होंने न्याय योजना पर जोर दिया और केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधा। उनके भाषण के दौरान एक बात ध्यान देनेवाली रही कि उन्होंने एक बार भी ‘चौकीदार चोर है’ का नारा नहीं लगाया, हालांकि इशारों-इशारों में वह सारी बात कह गये।
    राहुल गांधी की इस पहली चुनावी रैली के बाद सवाल यह उठने लगा है कि आखिर कांग्रेस अध्यक्ष को झारखंड आने में इतनी देरी क्यों हुई। क्या उनकी प्राथमिकता सूची में झारखंड नहीं है या क्या वह राज्य में यूपीए प्रत्याशियों की जीत के प्रति इतने आश्वस्त हैं कि उन्हें लगा कि यहां केंद्रीय नेताओं के प्रचार की जरूरत नहीं है। तीसरा कारण यह हो सकता है कि लोकसभा की करीब पौने चार सौ सीटों पर चुनाव होने के बाद कांग्रेस को शायद लगने लगा है कि एनडीए को सत्ता में लौटने से रोकने में वह सफल नहीं हो रही है। इसलिए चुनाव के आखिरी तीन चरण में वह पूरा जोर लगा रही है। राहुल के देरी से झारखंड आने का चौथा कारण पूरी तरह स्थानीय है और शायद यही सबसे सटीक भी है। अब तक राज्य की जिन तीन सीटों पर मतदान हुआ है, उनमें से चतरा सीट पर राजद ने भी अपना उम्मीदवार दिया था। यदि राहुल गांधी उस चरण में झारखंड आते, तो उनके सामने बेहद मुश्किल भरा सवाल होता कि आखिर चतरा में वह किसके लिए वोट मांगते। वहां से कांग्रेस का भी प्रत्याशी था। चतरा के अलावा राजद ने पलामू में अपना प्रत्याशी दिया था। यदि राहुल गांधी पलामू में राजद के लिए वोट मांगते तो चतरा के कांग्रेसियों के बीच गलत संदेश जाता। इसलिए उन्होंने पहले चरण के चुनाव प्रचार के लिए झारखंड आना मुनासिब नहीं समझा।
    अब जबकि खूंटी, रांची और हजारीबाग में कांग्रेस की किस्मत दांव पर लगी है और कोडरमा में झाविमो को कांग्रेस का समर्थन है, राहुल गांधी ने सिमडेगा से चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत कर आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को साधने की कोशिश की है। इसके अलावा कांग्रेस केवल चाईबासा और धनबाद में सीधे चुनाव लड़ रही है, जबकि बाकी पांच सीटों में से चार, दुमका, राजमहल, जमशेदपुर और गिरिडीह में झामुमो और गोड्डा में झाविमो का प्रत्याशी है।
    सिमडेगा आदिवासी बहुल क्षेत्र है। यहां करीब 72 प्रतिशत आदिवासी मतदाता हैं। इनमें से 65 फीसदी इसाई हैं। इस नाते यहां गैर-भाजपा मतों का ध्रुवीकरण खूंटी संसदीय क्षेत्र के परिणाम को प्रभावित कर सकता है। कोलेबिरा विधानसभा के उप चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की अप्रत्याशित जीत ने साबित किया था कि इलाके के आदिवासी भाजपा के पक्ष में नहीं हैं। इस बात की भी पूरी संभावना है कि राहुल के इस दौरे ने प्रदेश की बाकी सीटों पर भी असर छोड़ा है, हालांकि इसका पता तो मतदान के दिन ही लग सकेगा। राहुल गांधी के सिमडेगा दौरे ने निश्चित तौर पर यूपीए के प्रत्याशियों में नये उत्साह का संचार किया है। राहुल के दौरे की दूसरी खास बात यह रही कि सभा के मंच पर यूपीए के सभी घटक दलों के नेता एक साथ दिखे। झामुमो के हेमंत सोरेन और झाविमो के बाबूलाल मरांडी की मौजूदगी ने मतदाताओं को संकेत दे दिया कि यूपीए भी एकजुट है। हालांकि राजद नेताओं की अनुपस्थिति के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। लेकिन यह सच है कि राजद के लिए चुनाव खत्म हो चुका है। जिन दो सीटों पर वह चुनाव लड़ रहा है, वहां मतदान हो गया है।
    राहुल गांधी की यह चुनावी रैली भीड़ के लिहाज से बहुत छोटी नहीं कही जा सकती है, लेकिन इसमें खुद राहुल का हाव-भाव या बॉडी लैंग्वेज बहुत उत्साहजनक नहीं था, लेकिन उन्होंने न केवल जल-जंगल-जमीन का मुद्दा उठा कर आदिवासियों को अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास किया, बल्कि राज्य के हर जिले में टेक्निकल यूनिवर्सिटी स्थापित करने और स्वास्थ्य सेवाओं में आमूल-चूल बदलाव लाने की बात कह कर इस इलाके के लोगों को प्रभावित करने का भरपूर प्रयास किया। एक और बात जो सामने आयी, वह यह कि कांग्रेस के पास राहुल गांधी के अलावा कोई और स्टार प्रचारक नहीं है। सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी यूपी में ही व्यस्त हैं, जबकि दूसरे बड़े नेता, यहां तक कि प्रदेश प्रभारी आरपीएन सिंह अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों से बाहर निकलने का खतरा मोल लेना नहीं चाहते। ऐसे में यूपीए का पूरा प्रचार अभियान अकेले राहुल गांधी के भरोसे चल रहा है और यह उनके झारखंड आने में देरी का बड़ा कारण कहा जा सकता है। कांग्रेस के अंदरखाने यह चर्चा भी हो रही है कि अब कम से कम एक बार प्रियंका गांधी झारखंड में एक रैली में आ जायें, तो उसका सकारात्मक असर पड़ेगा। अब तक उनका कार्यक्रम तय नहीं हुआ है। ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राहुल गांधी के इस दौरे ने कांग्रेस समेत यूपीए के अन्य प्रत्याशियों की स्थिति में कोई बदलाव लाया है या नहीं और क्या सिमडेगा रैली में इकट्ठा भीड़ वाकई मतदान केंद्रों तक पहुंच कर यूपीए के पक्ष में मतदान करती है। यदि ऐसा हो गया, तो वह स्थिति एनडीए के लिए कष्टदायक हो सकती है।

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