आजाद सिपाही संवाददाता
रांची। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जिस निरंजन कुमार के खिलाफ निगरानी जांच के आदेश दिये हैं, उनके कारनामे किसी को भी हैरान कर सकते हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि सरकारी नियम और कायदे उनकी जेब में रहते हैं। हैरत की बात यह है कि वह झारखंड सरकार के अधिकारी नहीं हैं, बल्कि आइपीटीएएफएस के 1990 बैच के अधिकारी हैं और भारत संचार निगम लिमिटेड उनका मूल विभाग है। निरंजन कुमार को एक दिसंबर 2005 को झारखंड सरकार ने प्रतिनियुक्ति पर बुलाया था। यहां उन्हें तत्कालीन वित्त मंत्री रघुवर दास का ओएसडी बनाया गया। उसके बाद से उनका कद बढ़ता गया। झारखंड के बिजली महकमे में उनकी तूती बोलने लगी। बीच में चार जनवरी, 2013 से 26 जनवरी 2016 के दौरान वह अपने मूल विभाग में जरूर लौटे। झारखंड सरकार में दोबारा प्रतिनियुक्ति होने पर वह उच्च और तकनीकी शिक्षा विभाग में विशेष सचिव बने। रघुवर दास के झारखंड के सीएम बनते ही बिजली विभाग में इनकी लॉटरी लग गयी। 12 जुलाई 2016 को उन्हें जरेडा का प्रभारी एमडी बनाया गया। तीन फरवरी 2017 को उन्हें जेयूएसएनएल का प्रभारी एमडी बनाया गया। उसी साल 12 जुलाई को उन्हें जरेडा के एमडी का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया। फिर 29 नवंबर 2018 को उन्हें जेयूयूएनएल और टीवीएनएल के एमडी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया।
क्या है नियम
केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय द्वारा 17 जून 2010 को जारी कार्यालय ज्ञापांक संख्या 06/8/2009 में साफ कहा गया है कि किसी भी अधिकारी की प्रतिनियुक्ति की अवधि किसी भी स्थिति में पांच साल से अधिक नहीं हो सकती। इसके बाद इसी मंत्रालय के 17 फरवरी, 2017 के ज्ञापांक में इस अवधि को अधिकतम सात वर्ष किया गया।
मनोज कुमार का प्रभाव भी कम नहीं
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने धनबाद नगर निगम के पूर्व नगर आयुक्त मनोज कुमार और चार अन्य अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया है। मनोज कुमार भी नौकरशाही में अच्छा प्रभाव रखते हैं। उनके खिलाफ पहले भी एफआइआर करने का आदेश दिया गया था, लेकिन उन्होंने अपने प्रभाव से इस पर अमल नहीं होने दिया। मनोज कुमार बोकारो के डीसी रह चुके हैं। 27 मई के अंक में भूलवश उन्हें रांची का पूर्व बता दिया गया था।