दुनिया भर के विद्वानों और शोधकर्ताओं ने कई बार कहा है कि कोई भी आपदा, चाहे वह मानव निर्मित हो या प्राकृतिक, अपने साथ कई संकट लेकर आती है। चाहे बाढ़ हो या सूखा, भूकंप हो या चक्रवाती तूफान या फिर महामारी, सभी के साथ आम जीवन से जुड़े कई संकट खुद-ब-खुद चले आते हैं। इनमें कुछ संकट प्राकृतिक और परिस्थितियों की वजह से होते हैं, जबकि कुछ के पीछे मनुष्य का ही हाथ होता है। इसलिए हर आपदा का गहन विश्लेषण किया जाता है। इसमें वैज्ञानिकों के साथ अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री के साथ दूसरे क्षेत्र के विशेषज्ञ जुटते हैं। कोरोना महामारी के इस संकट भरे दौर में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। आम लोग जहां स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं, वहीं सामाजिक ताना-बना बिखर रहा है और इसके साथ बेलगाम महंगाई ने लोगों का जीना तक मुहाल कर रखा है। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान पिछले तीन महीने में जरूरत के हर सामान की कीमत डेढ़ से दोगुना तक बढ़ गयी है। फल-सब्जी से लेकर खाद्य सामग्री और यहां तक कि पेट्रोल-डीजल के दाम भी बेतहाशा बढ़ रहे हैं। बाजार पर किसी सरकार या प्रशासन का नियंत्रण नहीं रह गया है और जमाखोरी-कालाबाजारी चरम पर है। कोरोना संकट में महंगाई की मार का विश्लेषण करती आजाद सिपाही के टीकाकार राहुल सिंह की विशेष रिपोर्ट।
सुफल महतो रांची के रातू में रहते हैं और हर दिन अपना टेंपो लेकर सवारी ढोते हैं। उनके परिवार में कुल सात सदस्य हैं। किराये के घर में रहते हैं। तीन बच्चे, पत्नी और मां-बाप की जिम्मेदारी उनके कंधे पर है। सुफल बताते हैं कि पिछले साल लॉकडाउन के बावजूद उनका घर ठीक तरह से चल गया था। खर्च में कटौती कर उन्होंने संकट का दौर निकाल लिया, लेकिन इस बार अब घर की गाड़ी को खींच पाना बेहद मुश्किल हो रहा है। इस साल की शुरूआत में जहां सात से आठ हजार रुपये में घर का खर्च चल जाता था, पिछले तीन महीने में यह बढ़ कर 10 हजार रुपये हो गया है। ऊपर से आय भी घट गयी है। राशन से लेकर सब्जी तक के लिए अब अधिक खर्च करना पड़ रहा है।
यह अकेले सुफल महतो की पीड़ा नहीं है। कोरोना की दूसरी लहर में बेलगाम महंगाई ने एक मध्यमवर्गीय परिवार की कमर तोड़ कर रख दी है। पिछले साल कोरोना की पहली लहर में लगाया गया लॉकडाउन लोगों पर इतना भारी नहीं पड़ा था, क्योंकि उनके जीवन यापन का खर्च बहुत अधिक नहीं बढ़ा था। कम हो गयी आय के साथ लोगों ने सामंजस्य बैठा लिया था, लेकिन इस बार महंगाई कहीं अधिक तेजी से बढ़ती जा रही है। लोगों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर जरूरी चीजों की कीमतों में अचानक इतनी बढ़ोत्तरी क्यों हो रही है। वे यह भी सवाल करते हैं कि सरकार और प्रशासन इस तरफ ध्यान क्यों नहीं दे रहा है।
यह सवाल एकदम मौजूं है। जरूरी चीजों की कहीं कोई किल्लत नहीं है। राशन से लेकर खाद्य तेल और फल-सब्जी के आवागमन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। फिर भी इनकी कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। इसका एकमात्र कारण आपदा को अवसर में बदलने की प्रवृत्ति है। जमाखोरी और कालाबाजारी चरम पर है। हर कोई अधिक से अधिक लाभ कमाने में जुट गया है। चाहे चावल हो या आटा, दाल हो या चीनी या फिर मसाले, खाद्य तेल हों या सब्जी-फल, मांस-मछली हो या मिठाई-नमकीन, हर चीज महंगी हो गयी है। अर्थशास्त्र कहता है कि मांग और आपूर्ति में असंतुलन पैदा होने से कीमत बढ़ती है। लेकिन अभी तो दवा और चिकित्सा उपकरणों के अलावा किसी चीज की मांग भी नहीं बढ़ी है। इसलिए अर्थशास्त्रियों को भी महंगाई का कारण समझ में नहीं आ रहा है। दूसरी तरफ महामारी ने लोगों की आय कम कर दी है। दिहाड़ी कमानेवाले बेकार हो गये हैं और उनके घर के जो लोग बाहर गये थे, वे या तो खुद की जान बचाने में जुटे हैं या खाली हाथ वापस आ चुके हैं। कम आय वर्ग के लोग, जिनके पास बहुत अधिक जमा पूंजी नहीं है, तीन बार की बजाय दो बार खाना खा रहे हैं। दाल-सब्जी की बजाय चटनी से काम चला रहे हैं।
अफसोस इस बात का होता है कि आम लोगों की इस मुसीबत की तरफ किसी का ध्यान नहीं है। प्रशासन की ओर से बेफिक्र हो जाने के बाद जमाखोरों-कालाबाजारियों का कहर आम लोगों पर टूट पड़ा है। किसानों से औने-पौने दाम पर सब्जियां खरीद कर उन्हें ऊंची कीमत पर मंडियों में बेचनेवाले दलाल और बिचौलिये मालामाल हो रहे हैं। आम लोग कोरोना महामारी से बचने के साथ-साथ अब रोटी की जुगाड़ में परेशान होने लगे हैं, जिससे पैदा हुआ मानसिक तनाव सामाजिक बिखराव का कारण बनता जा रहा है। इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है, अन्यथा लोग महामारी से बच भी जायेंगे, तो महंगाई उन्हें लील लेगी।