बड़ा सवाल : मदद की जरूरत तत्काल, 18 साल किसने देखा, सही पात्र तक पहुंचे योजना का लाभ, तभी बनेगी बात
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना महामारी के दौरान वैसे तो अब तक आम लोगों के हित की कई योजनाओं का एलान किया है, लेकिन इस बीमारी के कारण अनाथ हो चुके बच्चों के लिए उन्होंने जिस योजना की घोषणा की है, वह सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण है। दुनिया भर में महामारी झेलनेवाले देशों में भारत इकलौता ऐसा देश बन गया है, जिसने अनाथ हो चुके बच्चों के कल्याण के लिए इतना बड़ा फैसला किया है। लेकिन तमाम खूबियों के बावजूद इस योजना से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल यह है कि अनाथ बच्चों को मदद की तत्काल जरूरत है। 18 साल बाद स्टायपंड और 23 साल बाद दस लाख की मदद किसी के गले नहीं उतर रही। वहीं देश में यह योजना प्रभावी ढंग से लागू कैसे होगी। क्या देश की कार्यपालिका इस योजना का लाभ योग्य बच्चों तक पहुंचा पाने में सक्षम होगी या फिर यह योजना भी दूसरी योजनाओं की तरह हवा-हवाई बन कर रह जायेगी। आम जनमानस में सरकारी योजनाओं के बारे में जो छवि बन चुकी है, उसकी पृष्ठभूमि में ही प्रधानमंत्री की इस घोषणा को भी ऐसी ही श्रेणी में रखा जा रहा है और यह धारणा पूरी तरह गलत भी नहीं है। भारत में सरकारी योजनाओं का हाल लाभुक तक पहुंचते-पहुंचते क्या हो जाता है, यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में अपने मां-बाप को खो चुके बच्चे के लिए यह उम्मीद करना कि सिस्टम उसके पास पहुंचेगा और सरकार की देखरेख में वह अपना भविष्य संवार सकता है, भारत जैसे देश में फिलहाल तो काफी मुश्किल दिख रहा है। अभी तक इस योजना के बारे में जो जानकारी दी गयी है, उसके अनुसार केवल वही बच्चे इसके लाभुक होंगे, जिनके मां-बाप को कोरोना ने छीना है। इस प्रावधान में वैसे बच्चों के बारे में कोई जिक्र नहीं है, जो कोरोना जनित दूसरी समस्याओं के कारण अनाथ हुए हैं। प्रधानमंत्री की घोषणा को जमीन पर उतारने की राह में बाधा बनी इन चुनौतियों को रेखांकित करती आजाद सिपाही के टीकाकार राहुल सिंह की खास रिपोर्ट।
शनिवार 29 मई को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल की दूसरी वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर कोरोना के कारण अनाथ हुए बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेवारी उठाने की घोषणा की, तो पहली नजर में यह एक ऐतिहासिक घोषणा का आभास दे गया। अगली सुबह जब एक परिचिति परिवार के बच्चों से बात की गयी, तो उन्होंने जो सवाल उठाये, उससे लगा कि इस योजना को फुल प्रूफ बनाने में अभी बहुत काम किया जाना है। हाल ही में अपने मां-बाप को खो चुके दो बच्चों में से एक ने सवाल किया कि मुझे तो अभी मदद की जरूरत है। मुझे खाने-पीने, पढ़ने-लिखने में तत्काल मदद चाहिए, यह कौन देगा। अभी की बाधाओं को पार पाने के बाद ही तो हम 18 साल या 23 साल देख पायेंगे। अगर अभी जीवन यापन और शुरू की शिक्षा-दीक्षा ठीक से नहीं हो पायी, तो 18 साल का सफर कैसे पार करेंगे। वहीं एक 14 साल के किशोर का सवाल था कि हम आखिर कैसे सिद्ध कर पायेंगे कि हमारे माता-पिता की मौत कोरोना से ही हुई है। कोई अस्पताल सर्टिफिकेट में कोरोना से हुई मौत का जिक्र नहीं कर रहा है। वहीं उत्तरप्रदेश के एक मुखिया का कहना था कि उसके गांव में दो परिवार में बच्चे अनाथ हुए हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि उनके माता पिता की मौत घर में ही हो गयी। पहले खांसी हुई, फिर बुखार हुआ। बुखार से टायफायड का रूप धारण कर लिया और रात में सोते समय सांस अटक गयी और मौत हो गयी। अब हम कैसे सिद्ध करेंगे कि उन लोगों की मौत कोरोना से ही होगी। चूंकि उन लोगों ने किसी अस्पताल में इलाज नहीं कराया था, लिहाजा यह सिद्ध कर पाना मुश्किल है कि उनकी मौत कोरोना से हुई। ऐसे में उनके अनाथ बच्चों को कैसे लाभ मिलेगा।
इस सवाल ने मन को झकझोर दिया और उन बच्चे ने इसके बाद जिन सवालों की झड़ी लगायी, उससे साफ हो गया कि प्रधानमंत्री की इस ऐतिहासिक घोषणा का लाभ वास्तविक लोगों तक पहुंचेगा, इसमें अभी कई पेंच हैं। बच्चे के सवालों को छोड़ भी दें, तो आम लोगों के मन में यह संदेह है कि यह योजना जमीन पर उतरते-उतरते कौन सा स्वरूप लेगी, यह कह पाना कठिन है। स्वाभाविक तौर पर पूर्व में शुरू की गयी योजनाओं का हश्र देखने और उन योजनाओं से मिले अनुभवों के बाद लोगों में इस घोषणा के प्रति भी संदेह पैदा हो रहा है।
यह सही है कि सरकारी योजनाएं अपना उद्देश्य हासिल करने में शत-प्रतिशत सफल नहीं हो पातीं, लेकिन यदि 60 या 70 प्रतिशत भी सफल होती हैं, तो उन्हें अच्छी योजना माना जाता है। लेकिन भारत के सिस्टम में व्याप्त ‘चलता है रवैया’ और भ्रष्टाचार के घुन ने सरकारी योजनाओं का क्या हश्र किया है, यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में बच्चों के लिए की गयी घोषणा के प्रति देश की कार्यपालिका संवेदनशील रहेगी, यह मान लेना थोड़ा अधिक हो जायेगा।
उत्तरप्रदेश के मुखिया के सवालों पर लौटते हैं। उनका सवाल था कि जिन बच्चों के मां-बाप की मौत घर में हुई है या पिता की मौत अस्पताल में हुई और मां बाद में घर में कोरोना की शिकार बनी, उनका क्या होगा। क्या उन्हें भी कोरोना के कारण अनाथ माना जायेगा या फिर अपने अनाथ होने का प्रमाण पत्र जुटाने के लिए जन प्रतिनिधियों और सरकारी बाबुओं के दरवाजे पर ठोकरें खानी होंगी। एक सवाल, जो उस किशोर ने किया कि पांच साल का कोई बच्चा, जिसने अपने मां-बाप को खोया है, उसे 13 साल बाद मासिक वजीफा देकर याद दिलाया जायेगा कि वह अनाथ है, मानवीय दृष्टिकोण से संवेदनशील माना जा सकता है। जब वह बच्चा वोट देने के काबिल होगा, तब उसे इतिहास की याद दिलायी जायेगी, जबकि वह उस वक्त अपने सुनहरे भविष्य की ओर कदम बढ़ा चुका होगा। फिर इस घोषणा से उसे क्या लाभ होगा। प्रधानमंत्री की घोषणा में कहा गया है कि अनाथ हो चुके बच्चों को केंद्रीय या नवोदय विद्यालयों में डे स्कॉलर के रूप में नामांकित कराया जायेगा, तो फिर इन बच्चों के रहने-खाने की व्यवस्था का क्या होगा। निजी स्कूलों में शिक्षा के अधिकार में विहित प्रावधानों के अनुसार फीस का भुगतान किया जायेगा, लेकिन ऐसे कितने निजी स्कूल हैं, जो इतनी कम फीस में गरीब बच्चों को पढ़ाते हैं। बाकी की फीस ये बच्चे कहां से लायेंगे।
ये कुछ सवाल हैं, जो हाल ही में अपने मां-बाप को खो चुके किशोर ने उठाये। इसके साथ ही उन्होंने एक सुझाव भी दिया कि यदि सरकार ऐसे बच्चों के लालन-पालन के प्रति गंभीर है, तो उनके लिए तत्काल मासिक पेंशन की व्यवस्था करे और इसका भुगतान आधार नंबर के जरिये करे। यह पेंशन बच्चे के अपने पैरों पर खड़ा होने तक नियमित रूप से जारी रहे। इसमें सभी वैसे बच्चों को शामिल किया जाना चाहिए, जिनके मां-बाप का साया किसी भी कारण से उनके सिर से उठ गया है। इतना ही नहीं, दूसरी प्राकृतिक आपदाओं में भी अपने मां-बाप को खो चुके बच्चों को इस योजना में शामिल किया जाना चाहिए।
सचमुच उन किशोर की बातों में दम है। यह भारत के उस उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करता है, जिसमें यहां के बच्चे केवल सवाल करना ही नहीं जानते, बल्कि रचनात्मक सुझाव भी देते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री से लोगों की यह उम्मीद बंधी है कि योजना के स्वरूप में बदलाव लाया जायेगा और मदद की तत्काल व्यवस्था की जाये। अनाथ बच्चों का पता लगाने के लिए एक ब्लॉक स्तर पर टास्क फोर्स का गठन किया जाये। सिर्फ अस्पतालों की सूची या सांसद-विधायकों के रेकोमेंडेशन पर न्याय नहीं मिल पायेगा। अनाथ बच्चों की मदद भी तत्काल शुरू की जाये। जख्म पर मरहम लगाने की जरूरत अभी है। जिस तरह बीमार को तत्काल इलाज की जरूरत होती है, उसी तरह जरूरतमंदों को मदद की भी तत्काल ही जरूरत होती है।