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    Home»Top Story»किसान आंदोलन: क्यों भड़के हैं अन्नदाता, जानिए 3 वजहें
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    किसान आंदोलन: क्यों भड़के हैं अन्नदाता, जानिए 3 वजहें

    आजाद सिपाहीBy आजाद सिपाहीJune 12, 2017No Comments6 Mins Read
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    खेती के लिए बैंकों से मिले कर्ज के बोझ और फसलों की उचित कीमत न मिलने से परेशान किसान सड़कों पर उतर आए हैं। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के बाद कर्नाटक और पंजाब के अन्नदाता राज्य सरकारों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने को मजबूर हैं। वे स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की भी मांग कर रहे हैं।

    हालांकि किसान संगठनों के विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने रविवार को किसानों के पूर्ण कर्जमाफी की घोषणा कर दी, जिसमें सरकार का कहना है कि किसानों का पूरा कर्ज माफ करने के लिए सरकार एक कमेटी का गठन करेगी जो कर्जमाफी के लिए मानक तैयार करेगी।

    किसानों के राहत के लिए शिवराज की 6 घोषणाएं
    वहीं, मध्यप्रदेश में हिंसक हुए किसान आंदोलन में कम से 6 किसानों की मौत हो गई थी, जिसके बाद सीएम शिवराज सिंह चौहान ने 28 घंटे से जारी अपने अनशन को खत्म करने से पहले किसानों के लाभ के लिए कुछ कदम उठाने की घोषणा कर दी।

    उन्होंने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर किसी भी कृषि उत्पाद की खरीद को अपराध माना जाएगा। कृषि भूमि अब संबद्ध किसानों की सहमति से ही अधिग्रहित की जाएगी। उन्होंने कहा कि किसान बाजार की स्थापना सभी नगर निगम इलाकों में की जाएगी और राज्य भर में गुजरात के अमूल डेयरी कोऑपरेटिव्स की तर्ज पर सहकारी संस्थान की स्थापना की जाएगी।

    चौहान ने कहा कि सरकार 1,000 करोड़ रुपये के एक मूल्य स्थिरीकरण कोष की स्थापना करने जा रही है ताकि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कृषि उत्पादों की खरीद की जा सके। इसके अलावा, कृषि लागत एवं विपणन आयोग की स्थापना भी की जाएगी ताकि कृषि उत्पाद का उचित मूल्य सुनिश्चित किया जा सके।

    इस बीच तमिलनाडु के सीएम ई पलानीसामी ने सोमवार को डेल्टा रीजन के किसानों के लिए 56.92 करोड़ की धनराशि आवंटित की। अपको बता दें कि तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में हजारों एकड़ फसलें खराब मानसून के चलते चौपट हो गई हैं। सूखे की हालत यह है कि राज्य के सभी 32 जिलों को सूखा ग्रस्त घोषित कर दिया गया है।

    राज्य सरकार ने 2 हजार 247 करोड़ रुपए का सूखा राहत पैकेज देने की बात कही थी हालांकि किसान इसे कम मान रहे हैं। किसानों ने केंद्र सरकार से राहत पैकेज देने के लिए दिल्ली के जंतर मंतर पर कई दिनों तक प्रदर्शन किया। केंद्र ने इसे राज्य सरकार का मामला बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया।

    इन 3 कारणों से किसान हैं परेशान

    1. फसलों की उचित कीमत न मिलना:
    किसान फसलों को उगाने के लिए बीज, खाद और सिंचाई पर जितना पैसा खर्च करते हैं, उतना पैसा उनको फसल तैयार होने पर नहीं मिलता है। जब वे मंडी में अपनी फसलों को बेचने जाते हैं तो कम कीमत के कारण लागत भी नहीं निकलती है। इससे परेशान किसान विरोध स्वरूप अपनी फसलें सड़कों पर फेंक देते हैं। आपने कई बार सड़कों पर टमाटर, आलू, हरी सब्जियों के अलावा दूध बहाए जाने की तस्वीरें और खबरें देखी होंगी। मंदसौर आंदोलन से जुड़े किसानों की मांगों में फसल की लागत की डेढ़ गुनी कीमत भी एक मांग है। हालां​कि सरकार समय-समय पर फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करती है।

    क्या होता है न्यूनतम समर्थन मूल्य: केंद्र सरकार कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिशों के आधार पर कुछ फसलों के बुवाई सत्र के आरम्भ में
    न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। इसका मकसद किसानों की फसलों का एक न्यूनतम मूल्य तय करना होता है ताकि फसल की बंपर पैदावार के समय उसकी कीमतों में तेजी से गिरावट होती है तो किसानों को कम से कम फसल का निर्धारित न्यूनतम मूल्य मिल सके। इसका उद्देश्य किसानों को मजबूरन सस्ते कीमत पर फसल बिक्री करने से बचाना और सार्वजनिक वितरण के लिए उनसे खाद्दान्न की खरीद करना है।

    आपको बता दें कि सरकार 25 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है, जिनमें धान, गेहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर, मूंगफली, सरसों, तोरिया, सोयाबीन के बीज, कुसुम्भी, नारियल, कच्चा कपास, कच्चा जूट, गन्ना आदि शामिल हैं।

    2. पानी के लिए मानसून पर निर्भरता
    कई राज्यों के किसान अपनी फसलों की सिंचाई के लिए मानसून पर निर्भर होते हैैं, मानसून समय पर नहीं आया तो फसलें सूखने लगती हैं। फसलों के बर्बाद होने से बीज और खाद पर लगाई गई उनकी लागत भी नहीं निकलती। फसल बोने के लिए किसान जो कर्ज लेते हैं, वो उनके सिर का बोझ हो जाता है। अगली फसल के लिए उनको फिर बैंकों से कर्ज लेना पड़ता है, अगर आगे भी यही हाल रहता तो किसान के लिए उम्मीदें खत्म होने लगती हैं। लिहाजा देश के अलग अलग हिस्सों से अन्नदाताओं के खुदकुशी की खबरें आने लगती हैं। पिछले 20 सालों में करीब 3 लाख से अधिक किसानों ने खुदकुशी की है।

    3. किसानों के लिए कर्जमाफी ही दिखता है एक रास्ता
    बैंकों या ब्याजखोरों के कर्ज से दबे किसान राज्य और केंद्र सरकारों से कर्जमाफी की उम्मीद लगाते हैं, ताकि उनका कर्ज खत्म हो और आर्थिक राहत मिलने से वे एक बार फिर नई फसल बोने के बारे में सोच सकें। महाराष्ट्र के 1 करोड़ 36 लाख किसानों पर करीब 1 लाख 14 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है। इनमें से करीब 31 लाख छोटे किसानों की कर्जमाफी पर 30 हजार करोड़ रुपए का बोझ सरकार पर पड़ेगा। वहीं, यूपी की योगी सरकार ने किसानों के 36 हजार करोड़ के कर्ज माफ करने की घोषणा की है। यूपी सरकार के इस फैसले के बाद से ही अन्य राज्यों के किसान भी कर्जमाफी के लिए राज्य सरकारों पर दबाव डाल रहे हैं। इस बीच महाराष्ट्र में किसानों का कर्ज माफ किये जाने के सवाल पर वित्त मंत्री अरूण जेटली ने रविवार को कहा था कि​ जो भी राज्य कृषि ऋण माफ करना चाहते हैं इसके लिये उन्हें राशि अपने ही संसाधनों से जुटानी होगी।

    यूपीए सरकार ने स्वामीनाथन आयोग का गठन किया था, ताकि किसानों को उनकी फसलों के लाभकारी समर्थन मूल्य दिए जा सकें। यह रिपोर्ट साल 2007 में केंद्र सरकार को सौंप दी गई थी। इस रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई थी कि किसान की फसल की लागत में उसका 50 फीसदी लाभ जोड़कर समर्थन मूल्य तय किया जाए।

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