पांच महीने पहले दिसंबर में जब झारखंड विधानसभा का चुनाव हुआ था और झामुमो-कांग्रेस-राजद का गठबंधन ऐतिहासिक जीत हासिल कर सत्तारूढ़ हुआ था, तभी से राजनीतिक हलकों में कहा जाने लगा था कि हेमंत सोरेन के लिए शासन चलाना उतना आसान नहीं होगा, क्योंकि केंद्र में उनके प्रतिद्वंद्वी की सरकार है। हालांकि शपथ ग्रहण के ठीक बाद हेमंत ने कहा था कि वह केंद्र के साथ टकराव की स्थिति पैदा नहीं होने देंगे और मिल कर झारखंड के विकास का ब्लूप्रिंट तैयार करेंगे। उस समय केंद्र से भी उन्हें पूरा सहयोग दिये जाने का भरोसा दिया गया था। पांच महीने बाद अब हेमंत को लगने लगा है कि उन्हें दिया गया भरोसा पूरी तरह खोखला था। मंगलवार को उन्होंने खुल कर अपना दर्द साझा किया और केंद्र सरकार के असहयोग की चर्चा सार्वजनिक रूप से की। झारखंड की सत्ता संभालने के बाद हेमंत सोरेन का केंद्र के प्रति ऐसी पीड़ा पहली बार सुनने को मिली। इतना ही नहीं, उन्होंने पहली बार भाजपा पर तीखे राजनीतिक प्रहार भी किये। एक मुख्यमंत्री के तौर पर हेमंत ने जो पीड़ा मीडिया के सामने रखी, वह देश की खनिज आवश्यकताओं का 40 प्रतिशत आपूर्ति करनेवाले झारखंड की है। एक तो खाली खजाना और ऊपर से कोरोना संकट ने झारखंड के सामने राजनीतिक दृष्टि से विकट स्थिति पैदा कर दी है। हेमंत सोरेन के बयान की पृष्ठभूमि में झारखंड के मौजूदा हालात पर आजाद सिपाही ब्यूरो की खास रिपोर्ट।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर आइजैक न्यूटन ने भौतिक विज्ञान के जिन तीन नियमों को प्रतिपादित किया था, उनमें से तीसरा नियम यह है कि प्रत्येक क्रिया के बराबर विपरीत प्रतिक्रिया होती है। न्यूटन का यह नियम मंगलवार को भौतिक विज्ञान की किताबों-प्रयोगशालाओं से बाहर निकल कर झारखंड सरकार के मुख्यालय रांची के प्रोजेक्ट भवन में उस समय प्रकट हुआ, जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र सरकार और भाजपा पर चुन-चुन कर प्रहार किया। हेमंत ने जब कहा कि झारखंड ने केंद्र के सामने अपनी कई मांगें रखीं, लेकिन वहां से एक वेंटीलेटर तक नहीं मिला, तो उनके चेहरे पर गुस्सा या अतिरेक नहीं था, बल्कि एक पीड़ा झलक रही थी। कोरोना के विकराल संकट के समय झारखंड की लड़ने की तैयारी कैसी और कितनी मजबूत है, उस पर से वे पर्दा उठा रहे थे।
कोरोना संकट के इस दौर में झारखंड को केंद्र से क्या मिला और क्या नहीं मिला, इस पर विवाद हो सकता है, लेकिन एक बात तय है कि आज झारखंड का खजाना खाली है। स्वास्थ्य मशीनरी को उपकरणों और दूसरे संसाधनों की कमी से जूझना पड़ रहा है। केंद्र सरकार ने अब सब कुछ राज्यों पर छोड़ दिया है। चाहे प्रवासी श्रमिकों को लाने का मामला हो या सामाजिक सुरक्षा के मुद्दे, झारखंड को कहीं से कोई मदद नहीं मिल रही है। हेमंत ने साफ तौर पर कहा कि झारखंड अपने सीमित संसाधनों से इस संकट से जूझ रहा है। सत्ता संभालने के बाद हेमंत ने पहली बार इतने बेबाक ढंग से अपनी बात कही। कोरोना संकट के इस दौर में अपनी बात इस तरीके से कहनेवाले वह शायद पहले मुख्यमंत्री हैं। इससे पहले प्रधानमंत्री और दूसरे केंद्रीय मंत्रियों के साथ बातचीत के दौरान वह झारखंड की मांगें सामने रख चुके थे, लेकिन पहली बार उन्होंने भाजपा को निशाने पर लिया। यह हेमंत सोरेन का नया तेवर है, जिसके राजनीतिक मायने भी स्वाभाविक तौर पर निकाले जायेंगे।
आखिर हेमंत को यह तेवर क्यों अख्तियार करना पड़ा। हेमंत को नजदीक से जाननेवाले कहते हैं कि वह आम तौर पर कठोर तेवर नहीं अपनाते। अपनी बात बेहद तार्किक ढंग से पूरी तरह संयमित और शालीन ढंग से कहते हैं। मंगलवार को उन्होंने जो कुछ कहा, वह तर्क और संयम-शालीनता की कसौटी पर तो पूरी तरह खरा उतरता है, लेकिन एक मुख्यमंत्री की बेबसी को दर्शाता है। हेमंत ने अपनी बातों से एक बड़ा सवाल यह खड़ा किया है कि आखिर झारखंड के साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया जा रहा है। जो राज्य पूरे देश को कोयला और दूसरे खनिज पदार्थ देता है, उसके साथ यह व्यवहार क्यों हो रहा है।
कोरोना संकट शुरू होने के साथ ही हेमंत ने साफ कर दिया था कि झारखंड वही करेगा, जो केंद्र कहेगा। चाहे लॉकडाउन के दिशा-निर्देश हों या दूसरा कोई भी फैसला, झारखंड ने केवल वही किया, जो केंद्र ने कहा। इतना ही नहीं, प्रवासी श्रमिकों की वापसी के मुद्दे पर दूसरे राज्यों ने केंद्र के साथ टकराव का रास्ता अख्तियार किया, लेकिन हेमंत चुपचाप अपने काम में जुटे रहे। प्रवासी श्रमिकों को विमान से लाने के कारण उनकी चारों तरफ तारीफ भी हुई, लेकिन उन्होंने इसे पूरी शालीनता से स्वीकार किया। कहीं कोई प्रचार-प्रसार नहीं। अपने राज्य के मजदूरों के हितों की रक्षा करने के कारण उन्हें देशविरोधी तक करार दिया गया, लेकिन कभी हेमंत ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की।
लेकिन अब हेमंत की बात से तो यही लगता है कि झारखंड के साथ सचमुच न्याय नहीं हो रहा है। अपनी बेशुमार खनिज संपदाओं के कारण चर्चित झारखंड को केंद्र का मजबूत समर्थन चाहिए। हेमंत सरकार अपनी पूरी ताकत और हर उपलब्ध संसाधन का इस्तेमाल कर रही है, लेकिन राज्य की माली हालत जिस हालत में है, उसे सुधारना अकेले राज्य के वश की बात नहीं है। राजनीति अलग है और शासन अलग। दोनों को यदि मिला दिया जायेगा, तो इससे केवल नुकसान ही होगा। और यह नुकसान हेमंत सोरेन को कम होगा, क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। वह जो भी हासिल करेंगे, वह उनका लाभ ही होगा। नुकसान तो उसका होगा, जो झारखंड को इस हालत में पहुंचाने के लिए जिम्मेवार है। हेमंत को सब कुछ शून्य से शुरू करना है, इसलिए उनके सामने फेल होने का डर नहीं है। हेमंत ने गेंद केंद्र के पाले में डाल दी है और अब देखना यह है कि केंद्र का रवैया झारखंड के प्रति बदलता है या नहीं।

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