बेगूसराय। बेगूसराय में देश के विभिन्न शहरों से प्रवासियो के आने का सिलसिला लगातार जारी है। रोज ट्रेन के अलावा बस, ट्रक, बाइक समेत अन्य वाहनों से प्रवासी अपने घर की ओर लौट रहे हैं। इन घर लौटने वाले प्रवासियों को काम की चिंता सताने लगी है। बिहार सरकार विभिन्न योजना शुरू कर अपने प्रवासी कामगारों को घर में काम उपलब्ध कराने की कवायद कर रही है। उन्हें राशन और नगद उपलब्ध कराए जा रहे हैं लेकिन इन सारी कवायद के बीच प्रवासियों के नाम पर राजनीति भी शुरू हो गई है। जब लॉकडाउन था तो किसी भी दल के नेताओं ने इन प्रवासियों के दर्द को ना तो समझा और ना ही साझा किया लेकिन लॉकडाउन खत्म होते ही सब के सब जग गए हैं, उन्हें चिंता सताने लगी है।
बिहार विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है तो स्वभाविक है कि सभी राजनीतिक दल इसे अपने-अपने तरीके से भुनाने में लगे हैं। लगे भी क्यों ना अपना काम-धंधा छोड़कर घर आ रहे ये लाखों-लाख प्रवासी आगामी विधानसभा चुनाव में जिसकी चाहे सरकार बना सकते हैं। तो ऐसे में सभी राजनीतिक दल प्रवासी के नाम पर अपनी राजनीतिक गोटी सेट करने में लगे हैं। सत्ताधारी दल जहां काम देने के नाम पर इन कामगारों को अपने खेमे में ले रहे हैं, तो वहीं कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, रालोसपा समेत अन्य राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता लोगों को समझा रहे हैं कि बिहार सरकार और केंद्र की सरकार ने कितना दुख दिया है। हालांकि इस दौर में अधिकांश प्रवासी भी राजनीतिक दलों की चाल समझ रहे हैं। वह जान रहे हैं कि नवंबर तक बिहार में चुनाव होना है और हम मोहरा बनाए जा रहे हैं।
दिल्ली के नजफगढ़ में रहकर मजदूर सप्लाई करने वाले मीरगंज के रामभरोसे चौधरी बताते हैं कि देशव्यापी लॉकडाउन के कारण जब सब काम-धंधा बंद हो गया तो दिल्ली में किसी भी राजनीतिक दल को धरातलीय स्तर पर श्रमिकों की चिंता नहीं आई। बिहार के रहने वाले कुछ लोगों ने श्रमिकों की मदद किया भी तो उनका उद्देश्य राजनीति था और वे अपने राजनीति के लिए वहां लोगों की मदद कर रहे थे। श्रमिकों की परेशानी देख समग्र विकास में लगे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब ट्रेन चलाई तो बड़ी संख्या में हम प्रवासी कहे जाने वाले अपने घर वापस लौटे हैं। यहां भी राजनीति ही हो रही है, सब यही कह रहे हैं कि वो हर प्रकार की सुविधा देंगे। हालांकि हकीकत यह है कि सभी ने अपने-अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी किया है।
आजादी के दो दशक बाद से आज तक किसी ने गरीबों के लिए नहीं सोचा, जिसका नतीजा है कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, पंजाब, हरियाणा, असम, गुवाहाटी समेत देश के तमाम शहरों में रोज बिहार से लोगों की भीड़ बढ़ती गई और वह शहर और राज्य विकसित हो गया। वहां बिहारी कामगारों के श्रम से बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां लगीं लेकिन बिहार के लोगों के लिए बिहार के किसी भी राजनीतिक दल के लोगों ने नहीं सोचा। सबसे पहले मुख्यमंत्री डॉ श्री कृष्ण सिंह बने थे तो बेगूसराय बिहार की औद्योगिक राजधानी कही जाती थी, बिहार के अन्य शहरों में भी उद्योग का जाल बिछ गया था। उनके बाद स्थिति दिनों-दिन बिगड़ती गई, कल कारखाने बंद होते चले गए। हालत यह हो गया कि रोजी-रोटी के चक्कर में बिहार के कामगार, बिहार के श्रमिक ही नहीं, पढ़े लिखे लोगों ने भी देश के विभिन्न शहरों की ओर रुख करना शुरू कर दिया।
रामभरोसे चौधरी ने कहा कि सरकार को अब अपने मजदूरों की, कामगारों की, बेरोजगारों की दक्षता को समझना चाहिए। इनके हित के लिए कागज पर नहीं धरातल पर सोचना चाहिए, नहीं तो इस महामारी में सब कुछ छोड़ कर अपने घर की ओर लौटे कामगारों को फिर परदेस जाना पड़ेगा। अब जबकि चुनाव का समय है तो सत्ता को सोचना चाहिए कि यहां उद्योग-धंधा लगाने के लिए कागज पर नहीं धरातल पर ठोस और जल्दी कार्रवाई हो ताकि चुनाव आते-आते यह प्रवासी परदेस की ओर रुक नहीं कर सकें। राजनीतिक दलों को इन कामगारों की पीड़ा को कुरेदना नहीं चाहिए, अन्यथा खिन्न एवं आक्रोशित लाखों प्रवासी किसी का भी बना और बिगाड़ सकते हैं।