शिक्षकों को बच्चों का भविष्य गढ़नेवाला कहा जाता है। कोरोना ने इन शिक्षकों का वर्तमान अंधकारमय बना दिया है। पिछले एक साल से कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण स्कूल, कॉलेज, कोचिंग, निजी ट्यूशन आदि पर ग्रहण लगा हुआ है। निजी स्कूल, कोचिंग, होम ट्यूशन करने ाले शिक्षकों की अपनी व्यथा है। इन संस्थानों के संचालकों की अपनी मजबूरी है। उधर, सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की अलग परेशानी है। हजारों की संख्या में शिक्षा के क्षेत्र में अलख जगानेवाले शिक्षक फांकाकशी की स्थिति में पहुंच गये हैं। कई शिक्षकों की नौकरी चली गयी है, तो कई को आधे वेतन पर काम करना पड़ रहा है। राज्य के कई छोटे प्ले स्कूल बंद हो गये हैं। चूंकि इनका पेशा बच्चों को पढ़ाना है और लंबे समय से इस क्षेत्र से जुड़े हैं, इसलिए पेशा बदलना भी संभव नहीं है। ये वैसे लोग हैं, जो शिक्षा क्षेत्र से सीधे जुड़े हुए हैं और बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इसके अलावा रिशेप्सनिस्ट, क्लर्क, बस के ड्राइवर और खलासी, केयर टेकर आदि कई ऐसे लोग हैं, जो इन संस्थानों में नन-टीचिंग कार्यों से जुड़े हुए थे। इनकी संख्या भी हजारों में है। इनके सामने भी भुखमरी की स्थिति आ गयी है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों पर प्रस्तुत है आजाद सिपाही के राजनीतिक संपादक प्रशांत झा की विशेष रिपोर्ट।
भारत में गुरु शब्द का प्रयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है। आज के समय में गुरुजी के लिए शिक्षक, अध्यापक या अंग्रेजी शब्द टीचर या ग्रामीण बोलचाल की भाषा में मास्टर साहब जो भी प्रयोग करें, इसके अर्थ में कोई बदलाव नहीं आया है। इसका एक ही अर्थ है, शिक्षा देनेवाला। प्राचीन भारतीय मान्यताओं के अनुसार शिक्षक का स्थान भगवान से भी ऊंचा माना गया है। इस बात को कुछ ऐसे प्रदर्शित किया गया है कि गुरुर ब्रह्मा गुरुरविष्णु: गुरु: देवो महेश्वर:, गुरु: साक्षात परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:। कबीर कहते हैं: गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पांय, बलिहारि गुरु आपनो गोविंद दियो बताय। शिक्षक बच्चों को सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति बनाने का प्रयास करता है। इसलिए हम यह कह सकते हैं कि शिक्षक अपने शिष्य का सच्चा पथ प्रदर्शक है। ऐसे पथ प्रदर्शक आज खुद हाशिये पर हैं।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े हैं 50 हजार लोग
कोचिंग संचालकों के अनुसार राज्य में लगभग एक सौ से ज्यादा कोचिंग संस्थान हैं। इनमें सबसे अधिक रांची, जमशेदपुर, धनबाद और हजारीबाग में हैं। ये कोचिंग संस्थान इंजीनियरिंग, मेडिकल, यूपीएससी, जेपीएससी, क्लर्क, लॉ समेत अन्य संस्थानों में प्रवेश के लिए छात्रों को तैयारी कराते हैं। इसके अलावा कंप्यूटर, अंग्रेजी, टाइपिंग आदि सीखने के संस्थान खुले हुए हैं। इन सभी में शिक्षण कार्य में लगभग 10 से 15 हजार शिक्षक हैं। इसी तरह इन संस्थानों में रिशेप्सनिस्ट, सफाईकर्मी, क्लर्क, एकाउंटेंट आदि कार्यों से जुड़े तीन से चार हजार लोग हैं। स्कूली शिक्षा से जुड़े एसोसिएशन के अधिकारियों के मुताबिक निजी स्कूलों की बात की जाये, तो सीबीएसइ और आइसीएसइ से मान्यता प्राप्त पंजीकृत स्कूलों की संख्या लगभग आठ सौ है। बगैर मान्यता प्राप्त छोटे स्कूलों और प्ले स्कूलों की संख्या भी लगभग तीन सौ है। यानी कुल एक हजार से अधिक निजी स्कूल राज्य में हैं। इन स्कूलों में अगर औसत 10 शिक्षकों को ही माना जाये, तो 10 हजार शिक्षक बच्चों के जीवन को गढ़ने में लगे हैं। इसके अलावा बड़े स्कूलों में बस के ड्राइवर, कंडक्टर, माली, सफाईकर्मी, एकाउंटेंट आदि नन टीचिंग स्टाफ की संख्या दो-तीन हजार के लगभग है। होम ट्यूशन की बात की जाये, तो स्कूल के शिक्षकों के साथ-साथ प्रतियोगिता की तैयारी या उच्च शिक्षा ले रहे छात्र भी ट्यूशन क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। होम ट्यूटर उपलब्ध करानेवाली एजेंसी के मुताबिक झारखंड में इस तरह के लोगों की संख्या दो-तीन हजार से कम नहीं है। यानी शिक्षा क्षेत्र से टीचिंग और नन टीचिंग मिला कर लगभग 50 हजार लोग सीधे जुड़े हैं। परोक्ष रूप से जुड़े इनके परिवार को जोड़ा जाये, तो यह संख्या एक लाख को पार कर जायेगी। इसमें सरकारी स्कूलों और कॉलेजों के शिक्षकों को शामिल नहीं किया गया है। इन्हें शामिल करने से यह आंकड़ा और बढ़ जायेगा।
बच्चों को जरूरत, पर अभिभावकों की मजबूरी
कोरोना संक्रमण के कारण पिछले 15 महीने से स्कूल-कोचिंग आदि बंद हैं। कुछ बड़े निजी स्कूल और कोचिंग संस्थान आॅनलाइन क्लास करवा रहे हैं। मध्यम दर्जे के स्कूल या छोटे स्कूल और छोटे स्तर के कोचिंग संस्थान आॅनलाइन कक्षा आयोजन करने में भी सक्षम नहीं हो पा रहे हैं। कई प्ले स्कूल बंद हो गये हैं। केवल रांची में ही छह प्ले स्कूल हैं, जो एक वर्ष से बंद हंै। ऐसा नहीं है कि बच्चों को जरूरत नहीं है। अभिभावकों की भी अपनी मजबूरी है। कई अभिभावकों पर भी कोरोना संकट और लॉकडाउन का असर हुआ है। उनकी शिक्षा पर खर्च करने की क्षमता कम हुई है। एक बात और है कि कोचिंग संस्थानों या स्कूलों को अपना कार्यालय भी खोलने की अनुमति नहीं है। इसका असर नामांकन पर भी हुआ है। छात्र घटे हैं। फीस कम आ रही है। नतीजतन राज्य के कई निजी स्कूलों और कोचिंग संस्थानों ने टीचिंग और नन टीचिंग स्टाफ को कम कर लिया है। शिक्षकों को कम वेतन देने की भी बात सामने आयी है। कई कोचिंग में प्रति कक्षा शिक्षक को भुगतान होता था। जब छात्र कम हो गये, तो शिक्षकों का काम भी बंद हो गया। कई शिक्षकों के पास लंबे समय से कोई काम नहीं है। होम ट्यूशन का काम तो लगभग बंद ही हो गया है। निजी स्कूल और कोचिंग संस्थान के संचालक भी इस बात को कबूल करते हैं कि छात्रों की कमी और फीस कम आने के कारण संकट बढ़ा है और हमारी भी कुछ सीमाएं हैं।
शिक्षकों के पास विकल्प नहीं
किसी भी स्तर के बच्चों को पढ़ाना आसान कार्य नहीं है। यह एक हुनर है। यह एक कला है। जिस स्तर के बच्चों को जो विषय पढ़ा रहे हैं, उस विषय का ज्ञान होने के साथ-साथ बच्चों को समझाने का हुनर भी जरूरी है। जिनमें यह हुनर है, उनके लिए शिक्षा क्षेत्र के अलावा दूसरे क्षेत्र में काम करना आसान नहीं है। इसलिए शिक्षकों के पास बच्चों को पढ़ाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता है। नतीजतन उनकी आमदनी लगभग बंद हो गयी है। नन टीचिंग क्षेत्र से जुड़े कुछ लोगों ने जरूर अपना पेशा बदल लिया है। एक निजी स्कूल में कार्यरत सफाईकर्मी इन दिनों स्कूल के सामने ही सब्जी बेच कर किसी तरह से अपने परिवार का जीवन चला रहेहैं। इस तरह के कई अन्य लोग होंगे। सरकारी स्कूल के शिक्षकों की बात की जाये, तो वे कई तरह की परेशानी गिनाते हैं। कोरोना, चुनाव, जनगणना, बच्चों के घर-घर मीड-डे मील पहुंचाने आदि कई तरह के शिक्षण क्षेत्र से इतर कार्य की बात करते हुए अपनी परेशानी बताते हैं, लेकिन उन्हें वेतन मिल रहा और खाने के लाले नहीं हैं। इन निजी स्कूलों, कोचिंग संस्थानों और होम ट्यूशन से जीवन यापन करनेवाले बेचारे ये शिक्षक आखिर क्या करें? यह एक अहम सवाल है। इस सवाल का जवाब सरकार, सांसद, विधायक, समाज के प्रबुद्धजनों, एनजीओ सभी को मिल कर ढूंढ़ने की जरूरत है, क्योंकि यही वह वर्ग है, जो भारत की नींव बनाने और भविष्य गढ़ने में अहम योगदान दे रहा है।