आदिवासी इलाकों के हितों के लिए बनायी गयी जनजातीय परामर्शदातृ समिति (टीएसी) की बैठक में भाजपा के तीन सदस्य शामिल नहीं हुए। उनका कहना था कि टीएसी का पुनर्गठन ही असंवैधानिक है और इसलिए वे इसकी कार्यवाही में शामिल नहीं होंगे। भाजपा का यह तर्क राजनीतिक दृष्टिकोण से उनकी पार्टी के नजरिये से सही लग सकता है, लेकिन यह सोचनेवाली बात है कि आखिर बैठक का बहिष्कार करने से भाजपा को हासिल क्या होगा। यदि उसके बहिष्कार का बैठक के आयोजन पर या उसके संचालन पर असर पड़ता, तो बात समझ में आ सकती थी। लेकिन ऐसा कुछ तो होनेवाला नहीं। तो इसका सीधा मतलब यह है कि भाजपा ने केवल इसलिए टीएसी की बैठक का विरोध किया कि उसका गठन हेमंत सोरेन सरकार ने किया है। ऐसे में यह सवाल उठाया जा सकता है कि किसी बैठक के बहिष्कार से विरोध कैसे दर्ज हो सकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध का अधिकार सभी को है और कम से कम विपक्ष का तो यह कर्तव्य भी है। लेकिन टीएसी का गठन तो आदिवासियों के हित में किया गया है और इसमें सिर्फ और सिर्फ आदिवासी ही रखे गये हैं। इसका गठन पार्टी आधार पर नहीं, बल्कि आदिवासी विधायकों के बीच से किया गया है। ऐसे में कहा जा सकता है कि आदिवासियों का भला बैठक में शामिल होकर उनकी समस्याओं को रेखांकित करने और उसका समाधान निकलवाने से होगा न कि बैठक के बहिष्कार से। टीएसी की गिनती विधानसभा के बाद झारखंड के आदिवासियों के हित पोषण की सबसे बड़ी और एकमात्र संवैधानिक संस्था के रूप में की जाती है। इसके माध्यम से सरकार को आदिवासी कल्याण की नीतियां बनाने के लिए सलाह मिलती है। इसलिए इसकी बैठक हमेशा से महत्वपूर्ण मानी जाती रही है। आदिवासी हितों की राजनीति करनेवाली भाजपा ने इसकी बैठक का बहिष्कार कर निश्चित रूप से अपने इस घोषित उद्देश्य से अलग काम किया है। निश्चित रूप से झारखंड के आदिवासी उससे पूछेंगे कि बैठक का बहिष्कार करके भाजपा ने क्या भला किया! टीएसी के पुनर्गठन से लेकर उसकी बैठक के बहिष्कार के फैसले के राजनीतिक प्रभाव का विश्लेषण करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह की खास रिपोर्ट।
अमेरिकी मूल के नॉर्वे के राजनीतिक वैज्ञानिक स्कॉट गेट्स ने इस्लामी देशों की राजनीतिक व्यवस्था पर अपने एक शोध पत्र में लिखा है कि वहां विरोध का सबसे आसान हथियार बहिष्कार माना जाता है और यही वहां की लोकतंत्र की जड़ों को जमने के रास्ते में बाधा पहुंचाता है। उनके इस कथन को यदि भारतीय संदर्भ में देखा जाये, तो ऐसा लगता है कि जब-जब किसी बैठक या कार्यवाही का बहिष्कार करने का फैसला होता है, उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था खतरे में पड़ जाती है। चाहे लोकसभा हो या विधानसभा, कोई संवैधानिक संस्था हो या फिर कोई सामाजिक-राजनीतिक संगठन, इसकी कार्यवाही का बहिष्कार पलायन की श्रेणी में रखा जाता है। ऐसे फैसलों ने उस जनता के हित का अहित होता है, जिसने इन्हें अपनी आवाज उठाने के लिए जनप्रतिनिधि के रूप में चुन कर भेजा है।
एक दिन पहले 28 जून को झारखंड जनजातीय परामर्शदातृ परिषद यानी टीएसी की बैठक आयोजित की गयी। करीब डेढ़ साल बाद हुई इस बैठक का भाजपा ने यह कहते हुए बहिष्कार कर दिया कि टीएसी का गठन ही असंवैधानिक है और किसी असंवैधानिक संस्था की कार्यवाही में शामिल होने की गलती वह नहीं करेगी। भाजपा का यह फैसला उसके राजनीतिक चश्मे से देखने पर पहली नजर में सही लग सकता है, लेकिन यदि इसकी पृष्ठभूमि और इसके पीछे के कारणों का विश्लेषण किया जाये, तो कई सवाल पैदा होते हैं।
टीएसी को आदिवासी बहुल राज्यों में आदिवासी हितों का ध्यान रखनेवाली सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था, यानी मिनी विधानसभा का दर्जा हासिल है। यह संस्था आदिवासियों से जुड़े मुद्दों और नीतियों के बारे में सरकार को परामर्श देती है और उस पर गंभीरता से विचार भी किये जाने की परंपरा रही है। भाजपा ने अपनी राजनीति का घोषित उद्देश्य आदिवासी हितों की रक्षा को रखा है। ऐसे में टीएसी जैसी संस्था की कार्यवाही का बहिष्कार कर उसकी तरफ से किस राजनीतिक परिपक्वता का संकेत है, यह अब तक साफ नहीं हो सका है। भाजपा का कहना है कि टीएसी की अध्यक्षता किसी आदिवासी को देनी चाहिए, न कि मुख्यमंत्री को। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जिस संस्था का काम ही सरकार की नीतियों पर सुझाव देना है, उसमें यदि राज्य का कार्यकारी प्रमुख शामिल नहीं होगा, तो उन सुझावों को कौन समझेगा, उसकी गंभीरता को कैसे महसूस करेगा। भाजपा यह तर्क देते समय शायद भूल गयी कि 2014 से लेकर 2019 तक उसके मुख्यमंत्री रघुवर दास, जो संयोग से आदिवासी नहीं थे, ने इस परिषद का नेतृत्व किया था। उस अवधि में गठित टीएसी में झामुमो और कांग्रेस के भी विधायक सदस्य के रूप में थे। उस अवधि में आयोजित सात बैठकों में से किसी में भी न तो बहिष्कार की नौबत आयी और न अध्यक्षता पर सवाल उठा। ऐसे में अब एक आदिवासी मुख्यमंत्री को अध्यक्ष बनाये जाने के औचित्य पर अब सवाल उठाना कहां तक जायज हो सकता है।
यह सही है कि विरोध विपक्ष का संवैधानिक अधिकार और कर्तव्य होता है, लेकिन यह विरोध भी ऐसा होना चाहिए, जिससे व्यवस्था सही हो। लोकतंत्र में हर मुद्दे का समाधान बातचीत के जरिये निकल पाने की परंपरा रही है। यदि भाजपा को टीएसी के पुनर्गठन को लेकर कोई विरोध है, तो वह बैठक में शामिल होकर इसे दर्ज करा सकती थी। उस स्थिति में भाजपा का उद्देश्य भी पूरा हो जाता और उसे माइलेज भी मिलता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। टीएसी की बैठक का बहिष्कार कर भाजपा ने सशक्त विरोध का एक अवसर गंवा दिया है। उसे समझना होगा कि हर स्थिति में बहिष्कार के सबसे मजबूत लोकतांत्रिक हथियार का इस्तेमाल इसके असर को कम कर सकता है। यदि भाजपा बैठक में शामिल होकर अपना विरोध दर्ज कराती, तो लोगों के बीच सकारात्मक संदेश जाता और सत्ता पक्ष पर दबाव भी बनता। संभव है कि बातचीत और तर्कों-बहसों से मुद्दे का समाधान निकलता और फिर टीएसी सचमुच दलीय राजनीति के दृष्टिकोण से ऊपर उठ कर अपना काम करने में सक्षम होती।
तो इस पूरे प्रकरण का निचोड़ यही है कि भाजपा ने केवल विपक्ष की अपनी भूमिका और विरोध के अपने अधिकार को याद रखा, जो लंबी अवधि में उसके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। सत्तारूढ़ दल यह प्रचारित करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेगा कि भाजपा ने टीएसी जैसी संस्था का विरोध कर आदिवासी विरोधी मानसिकता का परिचय दिया है। उसका यह संदेश कम से कम आदिवासी जनमानस में तेजी से फैलेगा, क्योंकि कोई भी समुदाय अपने हितों से इतनी आसानी से समझौता नहीं कर सकता।
अब भाजपा को अपने फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह बहिष्कार के फैसले से बचा जा सके। उसे स्वीकार करना होगा कि झारखंड में वह विपक्ष में है और उसे अपना कार्यक्रम इसी अनुरूप तैयार करना चाहिए। किसी कार्यवाही का बहिष्कार करने से सकारात्मक लक्ष्य तक नहीं पहुंचा जा सकता है।