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    Home»Jharkhand Top News»राम मंदिर चढ़ावा चोरी का असर भविष्य की राजनीति पर गहरा पड़ेगा
    Jharkhand Top News

    राम मंदिर चढ़ावा चोरी का असर भविष्य की राजनीति पर गहरा पड़ेगा

    shivam kumarBy shivam kumarJune 30, 2026No Comments9 Mins Read
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    राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं का इमोशन है और इमोशन ही भविष्य की राजनीति तय करती है
    यह मुद्दा महज चोरी का नहीं है, यह मुद्दा आस्था के साथ खिलवाड़ का है, भरोसे से प्रपंच का है
    राकेश सिंह
    500 वर्षों का लंबा संघर्ष, अनगिनत बलिदान और पीढ़ियों की प्रतीक्षा के बाद, जब अयोध्या में प्रभु राम का भव्य मंदिर आकार लेने लगा, तो समूचे देश के हिंदुओं में उल्लास और संतोष की लहर दौड़ गयी। राम मंदिर आंदोलन से भारतीय राजनीति के नेपथ्य से निकलकर मुख्यधारा में आयी भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लिए यह एक ऐसा शिखर था, जिसने उन्हें असीम शक्ति और सामर्थ्य दिया। लेकिन, इस ऐतिहासिक उल्लास के बीच एक ऐसी घटना घटी, जिसने करोड़ों रामभक्तों के हृदय को छलनी कर दिया। किसी ने सोचा भी नहीं था कि राम मंदिर में भी कोई चढ़ावा चोरी जैसी घटना को अंजाम दे सकता है। जहां सैकड़ों राम भक्तों का खून बहा हो, कैसे किसी का ह्रदय इतना दूषित हो सकता है कि लालच की पराकाष्ठा उसके मन-मष्तिस्क को घेर ले। कोई राम मंदिर में चोरी कैसे कर सकता है। यह सवाल करोड़ों हिंदुओं की जुबान पर है।

    -उल्लास के बीच एक गहरी साजिश
    अयोध्या के राम मंदिर में देशभर से श्रद्धालु अपनी श्रद्धा का अंश चढ़ावे के रूप में अर्पित करते हैं। हर किसी के मन में यह भाव रहता है कि उनकी यह पाई-पाई रामलला के चरणों में जा रही है। लेकिन क्या पता था कि बंद दरवाजों के पीछे एक अलग ही खेल चल रहा था। राम मंदिर चढ़ावे में चोरी की सुगबुगाहट शुरू हुई, तो पहले इसे अफवाह माना गया। लेकिन यह केवल चंद रुपयों की चोरी नहीं थी, बल्कि यह करोड़ों हिंदुओं के उस अटूट विश्वास पर डाका था, जो उन्होंने मंदिर प्रबंधन पर जताया था।

    -भाजपा और आरएसएस दोनों के लिए संकट का विषय
    हिंदुओं में राम मंदिर चढ़ावा चोरी को लेकर रोष है। यह उनके विश्वास पर गहरा आघात है। यह घटना भाजपा और आरएसएस दोनों के लिए संकट का विषय बना हुआ है। इस मुद्दे पर विपक्ष जो भी कह रहा है, जो भी नैरेटिव सेट करना चाह रहा है, या राजनीति कर रहा है, यह भाजपा के लिए चिंता का विषय नहीं है। भाजपा राजनीतिक पार्टियों द्वारा किसी भी नैरेटिव से सामना करने के लिए सक्षम है। वह करती भी आ रही है। उसे विपक्ष के बयानों से कोई फर्क भी नहीं पड़ता। लेकिन यहां विषय करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़ा है। इस मामले को भाजपा हो या संघ, हलके में लेने की गलती नहीं करना चाहेगी। भाजपा का आधार ही हिंदुओं का विवश्वास है। विश्वास टूटेगा, तो समस्या दोनों तरफ आयेगी।

    -संघ परिवार की प्रतिष्ठा को गहरा आघात
    एक तरफ जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतर यह धारणा बन रही है कि राम मंदिर ट्रस्ट के निवर्तमान महासचिव चंपत राय ने समूचे संघ परिवार की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचाया है, वहीं संघ के भीतर ऐसे लोगों की तादाद भी ज्यादा है, जो यह मानते हैं कि चंपत राय, जो एक स्वयंसेवक रहे हैं, का आचरण, इस घटना को लेकर संघ की प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाला रहा है। चंपत राय को लेकर जो बातें संघ के लिए सबसे ज्यादा नाराजगी का कारण बनी है, वह है चंपत राय का झूठ बोलना। सब कुछ जानते हुए, समझते हुए, सब चीजों का संज्ञान लेना चंपत राय के अधीन था। उसके बाद भी चंपत राय ने सार्वजनिक रूप से यह कहने का प्रयत्न किया कि चढ़ावे की जांच पड़ताल की गयी। उसमें कहीं कोई गड़बड़ी नहीं मिली। गिनती में कोई गड़बड़ी नहीं हुई। सब काम अच्छा चल रहा है। किसी की दृष्टि में कुछ भी गड़बड़ी नहीं आयी है। यह बात अब आरएसएस को खलने लगी है कि चंपत राय को सब सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना चाहिए था। कैसे चंपत राय के नाक के नीचे इतना बड़ा घपला हो रहा हो और उन्हें इस बात की तनिक भी जानकारी नहीं हो। लेकिन चंपत राय ‘आॅल इज वेल’ टाइप का संदेश देने की कोशिश करते रहे। चंपत राय यह संदेश उस तारीख को दे रहे थे, जब वहां घपले-घोटाले, चोरी की तमाम घटनाएं अनवरत रूप से घट चुकी थीं। इस कारण से चंपत राय और संघ के बीच में एक बड़ी विभाजन की रेखा खिंच गयी है।

    -पांच जून वाला वीडियो अहम
    चढ़ावा चोरी मामले में कुछ नये वीडियो आये हैं, जिससे चंपत राय घिरते जा रहे हैं। एक सीसीटीवी फुटेज वायरल हुआ है। फुटेज पांच जून का है। यह वह तारीख है, जब सपा प्रमुख अखिलेश यादव या समाजवादी पार्टी के अयोध्या के नेता पवन पांडेय ने भी चढ़ावा चोरी के आरोप नहीं लगाये थे। तब पांच जून को पांच लाख रुपये गिनती करने वालों की टीम में शामिल एक व्यक्ति, जिसका नाम अविनाश है, उसके पास से बरामद की गयी थी। यह बरामदगी अनौपचारिक तौर पर थी। लेकिन उसमें ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारी शामिल थे। उन्हें जानकारी थी। इसका मतलब चंपत राय के संज्ञान में यह मामला था। वीडियो में पुलिस के भी कुछ कारिंदे खड़े दिखाई दे रहे हैं और अविनाश भी दिखाई दे रहा है। रुपया का झोला भी दिखाई दे रहा है। इसका मतलब पांच जून को भी चंपत राय की संज्ञान में था कि चोरी जारी है। राम मंदिर प्रांगण में बेरोक-टोक डकैती जारी है। दरअसल, पांच जून को पुलिस ने अविनाश शुक्ला के ठिकाने पर छापेमारी की थी और सीसीटीवी वीडियो में उसे अपने साथ ले जाती भी दिखी। हालांकि उस समय ट्रस्ट की ओर से कोई औपचारिक शिकायत नहीं दी गयी थी। लेकिन चंपत राय ने इसके बाद भी सार्वजनिक रूप से अपना एक वक्तव्य रिकॉर्ड करवाया। फिर उसको प्रसारित करवाया कि कहीं कुछ भी गड़बड़ नहीं है। सब काम ईमानदारी से हो रहा है।

    -संघ की नाक कटवाने का काम शुरू हुआ
    उसके बाद अपने बयानों से संघ की नाक कटाने का काम चंपत राय ने शुरू किया। संघ परिवार इस बात को अच्छे से समझता है कि अयोध्या सिर्फ एक मंदिर नहीं है। राम मंदिर करोड़ों-करोड़ हिंदुओं का इमोशन है। रामलला का मंदिर भारत के कुछ बड़े मंदिरों में से एक है। यह महज एक और मंदिर भर नहीं है। उसके पीछे 500 वर्षों का संघर्ष है, रक्त है, त्याग है। भारत की आत्मा राम मंदिर से जुड़ती है। यह भाजपा से बेहतर कौन जान सकता है कि इस मंदिर के राजनैतिक फलितार्थ कैसे-कैसे रहे। अयोध्या आंदोलन से जो शक्ति, ऊर्जा, क्षमता और सामर्थ्य संघ परिवार ने पायी, विश्व हिंदू परिषद ने पायी, भारतीय जनता पार्टी ने पायी, वो किसी से छुपा तो नहीं है। अयोध्या आंदोलन से पहले विश्व हिंदू परिषद की गति और प्रगति नगण्य थी। राम मंदिर आंदोलन से पहले संघ के तेवर में वह तेजस्विता नहीं थी और भारतीय जनता पार्टी तो बिल्कुल नेपथ्य में थी। ये सभी भारत की राजनीति में मुख्यधारा में तब आये, जब अयोध्या का हाथ पकड़ा। तो जो अयोध्या अपनी उंगली पकड़ाकर भाजपा, विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को यहां तक ले कर आयी है, उस अयोध्या में डाका पड़ गया है और आस्था पर छल हो गया है, प्रपंच हो गया है और वो भी संघ परिवार के एक बुजुर्ग स्वयंसेवक की उपस्थिति में, जिसको महासचिव बनाकर बैठाया गया। भरोसा किया गया।

    -चंपत राय को अयोध्या की भूमि छोड़नी होगी?
    जानकारों की मानें, तो आरएसएस द्वारा अब यह तय हुआ है कि चंपत राय को ना केवल इस्तीफा, बल्कि चंपत राय को अयोध्या की भूमि भी छोड़नी होगी। अयोध्या की भौगोलिक सीमा में चंपत राय अब नहीं रहेंगे। जल्द ही यह सार्वजनिक तौर स्पष्ट भी हो जायेगा, जब ट्रस्ट की बैठक होगी। महंत नृत्य गोपाल दास जी महाराज की अध्यक्षता में वह औपचारिकता है। लेकिन निर्णय हो चुका है कि चंपत राय को अयोध्या छोड़ना होगा। अनिल मिश्र ट्रस्ट को दूर से भी स्पर्श नहीं कर पायेंगे। उनका भी राम मंदिर की किसी भी व्यवस्था से बिल्कुल कटाव हो जायेगा। गोपाल राव को विश्व हिंदू परिषद, अयोध्या से कहीं दूर ले जाकर प्रक्षेपित करेगा। संघ इस बात को समझ रहा है कि गलती बड़ी है। भाजपा भी समझ रही है। भाजपा को चिंता इस बात की नहीं है कि अखिलेश यादव खेमा क्या कह रहा है। अरविंद केजरीवाल क्या कह रहे हैं। चिंता इस बात की भी नहीं कि कांग्रेसी क्या कह रहे हैं। खड़गे क्या कह रहे हैं। संघ और भाजपा के बड़े रणनीतिकार इस बात को मान रहे हैं कि चिंता विपक्षी दल नहीं हैं। भाजपा की चिंता विरोधी दल नहीं है। चिंता करोड़ों-करोड़ हिंदुओं का मानस परिवर्तन है। राम मंदिर चढ़ावा चोरी को लेकर जो रोष का भाव अब हिंदुओं के हृदय में भर गया है, सामान्य से लेकर विशिष्ट हिंदू तक, सब कह रहे हैं कि राम रामलला की चढ़ावा में चोरी, यह बर्दाश्त नहीं होगा। अब जहां इस प्रकार का आक्रोश हो हिंदू समाज में, इसका भविष्य में आरएसएस और भाजपा पर क्या असर पड़ेगा, समझा जा सकता है। इस बात की चिंता आरएसएस को भी डरा रही है। भाजपा को भी डरा रही है, विश्व हिंदू परिषद में भी कंपन पैदा हो चूका है। करोड़ों हिंदुओं के मन में जो ठेस लगी है, उस ठेस को जब तक ठीक नहीं किया जाता, तब तक भाजपा, संघ और विश्व हिंदू परिषद सबके लिए संकट बना रहेगा।

    -इमोशन ही भविष्य की राजनीति तय करती है
    इस घटना से रामलला के प्रति आस्था में कोई कमी नहीं आने वाली, न ही अयोध्या को लेकर आने वाली है। अयोध्या हर हिंदू के ह्रदय में है और रहेगा। लेकिन अयोध्या के मंदिर के प्रबंधन का जिम्मा जिन चेहरों के पास था, उनको लेकर करोड़ों हिंदुओं में गंभीर खिन्नता है, आक्रोश है। फिर चाहे उसका नाम चंपत राय हो, अनिल मिश्रा हो, गोपाल राव हो, चाहे इनसे ऊपर वाले हों या नीचे वाले हों। सबके प्रति गहरा आक्रोश, गहरी नाराजगी है। यह आक्रोश, यह नाराजगी राजनीतिक तौर पर भी महत्वपूर्ण है। सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर भी महत्वपूर्ण है। जानकारों की मानें, तो संघ परिवार ने सबसे पहले यह फैसला किया है कि ये तीन चेहरे, जिनको लेकर सबसे ज्यादा नाराजगी है, को अयोध्या से कोसों दूर करो। राम मंदिर से दूर करो, ताकि राम मंदिर में इनका राई-रत्ती भर कोई हस्तक्षेप ना दिखाई दे। ना इनके चेहरे ही राम मंदिर के इर्द-गिर्द दिखें, तब शायद जनता का यह आक्रोश ठंडा करने में मदद मिल पाये। क्योंकि अगर ये चेहरे दिखते रहे, तो आक्रोश ठंडा नहीं होगा, लोगों की भावना और तीखी हो जायेगी, लोगों की खिन्नता और धारदार होती जायेगी, क्योंकि राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं का इमोशन है। और इमोशन ही भविष्य की राजनीति तय करती है।

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