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    Home»Jharkhand Top News»झारखंड पुलिस की बदनामी के ‘ब्रांड अंबेसडर’ डीके पांडेय
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    झारखंड पुलिस की बदनामी के ‘ब्रांड अंबेसडर’ डीके पांडेय

    azad sipahi deskBy azad sipahi deskJuly 1, 2020No Comments6 Mins Read
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    झारखंड पुलिस के माथे पर कई कलंक लगे हुए हैं और समय-समय पर इन्हें धोने का ईमानदार प्रयास भी होता है। एक संगठन के रूप में झारखंड पुलिस का काम देश के अन्य राज्यों की पुलिस से अच्छा नहीं तो खराब भी नहीं रहा है। लेकिन अपने एक पूर्व डीजीपी के कारण इसके दामन पर जो दाग लगा है, उसने इसे बेहद शर्मनाक स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। राज्य के 11वें डीजीपी के रूप में करीब सवा तीन साल तक काम करनेवाले 1984 बैच के आइपीएस अधिकारी डीके पांडेय अपनी ही बहू द्वारा लगाये गये जिन घिनौने आरोपों से घिर गये हैं, उनसे न केवल उनकी अपनी, बल्कि पूरी पुलिस का चेहरा काला पड़ गया है। इस तरह डीके पांडेय झारखंड पुलिस की बदनामी के ‘ब्रांड अंबेसडर’ बन गये हैं। अपने कार्यकाल के दौरान डीके पांडेय हमेशा विवादों में रहे। कभी जमीन विवाद, तो कभी फर्जी मुठभेड़ और सार्वजनिक रूप से अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को व्यक्त करने के कारण उनकी कार्यशैली पर लगातार अंगुलियां उठती रहीं। लेकिन वह येन-केन-प्रकारेण अपनी चमड़ी बचाते रहे। अब, जब उनके घर के भीतर से ही उनका घिनौना चेहरा बाहर निकला है, पूरे झारखंड में डीजीपी रहते हुए उनके कामकाज और दूसरी करतूतों के बारे में बातें होने लगी हैं। इन चर्चाओं ने पूरे पुलिस बल के प्रति लोगों के विश्वास को हिला कर रख दिया है। डीके पांडेय के बारे में उनकी बहू ने जो आरोप लगाये हैं, वे इतने शर्मनाक हैं कि किसी सभ्य समाज में इसके बारे में बात भी नहीं की जा सकती है। डीके पांडेय पर लगे आरोपों और डीजीपी के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान कुछ विवादित घटनाओं पर आजाद सिपाही ब्यूरो की खास पेशकश।

    राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का एक प्रसिद्ध कथन है कि किसी व्यक्ति का चरित्र और आचरण समझना हो, तो यह देखना चाहिए कि वह अपने से छोटों से कैसा व्यवहार करता है। 24 फरवरी, 2015 से 31 मई, 2019 तक एक हजार 772 दिन झारखंड पुलिस के 11वें प्रमुख रहे 1984 बैच के आइपीएस डीके पांडेय पर यह कथन पूरी तरह सटीक बैठता है। अपने पूरे सेवा काल में जब भी वह वर्दी में रहे, अपने मातहतों के साथ उनका व्यवहार बेहद रुखा था। प्रशिक्षु आइपीएस से लेकर झारखंड के डीजीपी तक के सफर में उन्होंने कभी अपने मातहतों को महत्व नहीं दिया और हमेशा उन्हें नीची नजरों से देखते रहे। अब उनका यह आचरण और चरित्र उनके घर के भीतर से ही दुनिया के सामने आ गया है।
    इन दिनों झारखंड पुलिस मुख्यालय के अलावा रांची के विभिन्न थानों में डीके पांडेय के खिलाफ उनकी बहू द्वारा दर्ज प्राथमिकी की चर्चा हो रही है। पुलिस मुख्यालय के कई अधिकारी निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि डीके पांडेय की करतूतों ने पूरे पुलिस बल का सिर शर्म से झुका दिया है। हाल के दिनों में, खास कर कोरोना संकट के समय झारखंड पुलिस के जिस मानवीय चेहरे की चारों तरफ तारीफ हो रही थी, आज लोग उसी पुलिस को नफरत भरी निगाहों से देख रहे हैं। इसका सीधा असर पुलिस के मनोबल पर पड़ रहा है।
    डीके पांडेय के बारे में कहा जाता है कि वह प्रोफेसर बनना चाहते थे, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें आइपीएस बना दिया। वनस्पति विज्ञान में गोल्ड मेडलिस्ट डीके पांडेय का आइपीएस के रूप में करियर विवादों से भरा रहा। डीजीपी के रूप में वह जब झारखंड आये, तो उन्होंने अपनी कार्यशैली नहीं बदली। बात-बात पर अपने मातहतों को धमकाना और अपशब्द कहना, उनकी क्षमता पर सवाल उठाना और नीचा दिखाना उनका प्रिय शगल था। डीजीपी रहते हुए उन्होंने एक बार कहा था कि झारखंड पुलिस में नकारा लोगों की भरमार है। इसलिए डीजीपी के रूप में उनका कार्यकाल विवादों से भरा रहा। बकोरिया फर्जी मुठभेड़ कांड से लेकर चामा (कांके) में गैर-मजरुआ जमीन को जबरन अपनी पत्नी के नाम कराने तक उनकी करतूत हमेशा विवादों में घिरती रही। उनका एकमात्र काम अपने राजनीतिक आकाओं को खुश रखना था, जिसके लिए वह किसी भी हद तक जाने के लिए हमेशा तैयार रहते थे और कई बार गये भी।
    पेशेवर जिंदगी के साथ निजी जिंदगी में भी डीके पांडेय कई विवादों में घिरे। महाशिवरात्रि पर गले में सांप लपेट कर, रजरप्पा में मंजीरा बजाते हुए भजन गाने का मामला हो या फिर चामा में अपने मकान का काम कर रहे ठेकेदार को पैसा नहीं देने का हो, वह हमेशा चर्चा में रहे। रिटायरमेंट के बाद जब उन्होंने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की, तब भी पार्टी के बहुत से लोगों ने उनका विरोध किया।
    इन तमाम करतूतों को यदि तराजू के एक पलड़े पर रखा जाये और दूसरे पलड़े पर डीके पांडेय की बहू रेखा मिश्रा के आरोपों को रखा जाये, तो निश्चित तौर पर ये आरोप भारी साबित होंगे। अपने बेटे की शारीरिक और मानसिक बीमारी को छिपा कर एक बेबस लड़की के भविष्य को अंधकारमय बनाने और उसके सपनों को अपनी खाकी वर्दी के रौब के नीचे कुचलने के लिए समाज उन्हें कभी माफ नहीं करेगा। इतना ही नहीं, अपनी बहू को शारीरिक संबंध बनाने के लिए कहना किसी भी सभ्य समाज में नीचता की हद माना जाता है। डीके पांडेय पर उनकी बहू ने यह आरोप भी लगाया है। इन आरोपों में सच्चाई कितनी है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इतना तय है कि आज भी कोई युवती सार्वजनिक रूप से इस तरह के आरोप लगाने की हिम्मत नहीं करती है। ऐसा विरले ही होता है कि किसी युवती द्वारा लगाये गये इस तरह के आरोप गलत होते हैं।
    रेखा मिश्रा के साथ पूर्व डीजीपी, उनकी पत्नी और उनके पुत्र ने जो कुछ किया, वह शर्मनाक तो है ही, इसने तथाकथित उच्च वर्गीय समाज की कालिख भरी असलियत को भी सामने ला दिया है। डीजीपी के किलेनुमा सरकारी आवास के भीतर एक बेबस और मजबूर युवती के साथ इतना घिनौना व्यवहार होता रहा और उसकी चीखें उस आवास के भीतर घुट कर रह गयीं, यह सिस्टम के खोखलेपन को भी उजागर करता है। अब जबकि पूरे मामले की जांच चल रही है, उम्मीद है कि सब कुछ सामने आयेगा और कभी खाकी वर्दी धारण कर खुद को सर्वशक्तिमान समझनेवाले पूर्व आइपीएस अधिकारी डीके पांडेय को उनकी करतूतों की सजा जरूर मिलेगी।

    'brand ambassador' of Jharkhand Police's infamy DK Pandey
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