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    Home»Top Story»अगली पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनेंगे राफेल के ‘वायुवीर’
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    अगली पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनेंगे राफेल के ‘वायुवीर’

    shivam kumarBy shivam kumarJuly 31, 2020No Comments5 Mins Read
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    फ्रांसीसी शहर बोर्डो के मेरिनैक एयर बेस से पांच राफेल फाइटर जेट भारत लाने वाले वायुसेना के सात ‘वायुवीर’ उन युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन सकते हैं, जो आसमान में उड़ने के लिए सपने देखते हैं। भारत में राफेल का आना भारतीय वायु सेना की युद्ध क्षमताओं में एक नए युग का प्रतीक है। इन लड़ाकू विमानों को भारत लाने वाले इन पायलटों की कहानी शायद अगली पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा बनेगी।
     
    इन सभी ने फ्रांसीसी शहर बोर्डो के मेरिनैक एयर बेस से 27 जुलाई को उड़ान भरी थी। उड़ान के पहले चरण में पांचों राफेल साढ़े सात घंटे में 5800 किमी. की दूरी तय करके संयुक्त अरब अमीरात में अबू धाबी के पास अल धफरा में फ्रांसीसी एयरबेस पर उतरे थे। इसके बाद विमानों ने बुधवार को सुबह 11.40 बजे यूएई से उड़ान भरी और 2700 किमी. की दूरी तय करके 3.09 बजे अंबाला एयरबेस में फाइनल लैंडिंग की। 2700 किमी. की उड़ान के दूसरे चरण में भारतीय वायुसेना के टैंकर ने एयर-टू-एयर ईंधन दिया। इस तरह सभी पायलट्स ने फ्रांस से भारत तक लगभग 8500 किमी. की दूरी तय की। पांच राफेल्स में ट्विन सीटर्स दो विमानों में दो-दो और सिंगल सीट वाले तीन विमानों में एक-एक पायलट थे। इस तरह पांच राफेल विमान सात पायलट्स उड़ाकर भारत लाये। इन पायलट्स में 17 स्क्वाड्रन ‘गोल्डन एरोज’ के कमांडिंग ऑफिसर ग्रुप कैप्टन हरकीरत सिंह, विंग कमांडर एमके सिंह, ग्रुप कैप्टन रोहित कटारिया, विंग कमांडर अभिषेक त्रिपाठी, विंग कमांडर मनीष सिंह, विंग कमांडर सिद्धू और विंग कमांडर अरुण कुमार शामिल हैं। 
     
    राफेल लाने वाले इंडियन एयरफोर्स के जाबांज पायलटों की टीम का नेतृत्व ‘गोल्डन एरो’ 17 स्क्वाड्रन राफेल के कमांडिंग ऑफिसर ग्रुप कैप्टन हरकीरत सिंह ने किया। उन्हें वायुसेना में 2001 में कमीशन दिया गया था। उन्हें उनकी बहादुरी के लिए शौर्य चक्र से सम्मानित किया जा चुका है। दरअसल उन्होंने 23 सितंबर, 2008 को राजस्थान के एक एयरबेस से मिग-21 बाइसन में नाइट मिशन पर उड़ान भरी थी। 4 किमी. की ऊंचाई पर उन्हें इंजन से 3 धमाके सुनाई दिए। इंजन बंद होते ही कॉकपिट में अंधेरा छा गया। हरकीरत ने इमरजेंसी लाइट जलाई और किसी तरह आग पर काबू पाया। देर किए बिना इंजन को स्टार्ट करने की कोशिश की। इंजन चालू कर उन्होंने ग्राउंड कंट्रोल की मदद से नेविगेशन सिस्टम के जरिए रात में लैंडिंग की। हरकीरत चाहते ताे कूद भी सकते थे लेकिन उन्होंने अपने विमान को आपात स्थिति में दुर्घटनाग्रस्त नहीं होने दिया। वह तब एक स्क्वाड्रन लीडर थे। उनके पिता निर्मल सिंह भी सेना से लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में सेवानिवृत्त हुए हैं। उनकी पत्नी अंबाला एयरफोर्स स्टेशन पर ही विंग कमांडर हैं और ग्राउंड ड्यूटी पर तैनात हैं। विंग कमांडर मनीष सिंह के पापा-दादा-भाई सभी फौजी हैं।   
     
    विंग कमांडर अभिषेक राजस्थान के जालौर में पैदा हुए जबकि उनका परिवार हरदोई उप्र के संडीला कस्बे के मोहल्ला बरौनी का रहने वाला है। उनके पिता अनिल त्रिपाठी राजस्थान में बैंक में नौकरी करते हैं जबकि मां आयकर विभाग में कार्यरत हैं। उनके भाई अनुभव त्रिपाठी यूएस में इंजीनियर हैं। पत्नी प्रियंका लखनऊ की रहने वाली हैं। जालौर के ही स्कूल में पढ़ाई करने के बाद अभिषेक 11वीं-12वीं की पढ़ाई करने जयपुर आ गए थे। उसके बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली से एमएससी किया। 2001 में एयरफोर्स एकेडमी से बतौर फाइटर पायलट वायुसेना में कमीशन हुए। वह अपने स्कूल के दिनों में एक उभरते हुए पहलवान और अच्छे खिलाड़ी भी थे। वह अपनी मूल जड़ों से कटे बिल्कुल नहीं हैं। पारिवारिक मांगलिक कार्यक्रमों के अलावा भी अभिषेक संडीला आते रहते हैं। 
     
    विंग कमांडर मनीष सिंह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के बकवा कस्बा निवासी आर्मी से रिटायर मदन सिंह के बेटे हैं। राफेल की ट्रेनिंग के लिए फ्रांस जाने से पहले वह गोरखपुर में तैनात थे और उससे पहले अंबाला और जामनगर में। उनके भाई अनीश नौसेना में हैं जबकि पिता, दादा फौज से रिटायर्ड हैं। मनीष की शुरुआती पढ़ाई गांव के ही एक प्राइवेट स्कूल में और फिर छठी क्लास के बाद हरियाणा के कुंजपुरा सैनिक स्कूल से हुई है। एनडीए में चयन होने के बाद  2003 में वह बतौर फाइटर पायलट वायुसेना में कमीशन हुए। उनके पिता मदन सिंह कहते हैं कि यह गर्व की बात है कि मनीष को राफेल उड़ाने का फ्रांस में प्रशिक्षण देने के लिए चुना गया। यह केवल परिवार के लिए नहीं बल्कि उसके पैतृक गांव का नाम दुनिया में रोशन करने वाली बात है। उनकी मां उर्मिला देवी का कहना है कि हर किसी को अपने बेटे पर गर्व है। मनीष के छोटे भाई अनीश सिंह ने बताया कि भैया जब मंगलवार को अबुधाबी में थे तो उनसे हम लोगों ने कुशलक्षेम जानने के लिए बात की थी।
     
    ग्रुप कैप्टन रोहित कटारिया गुरुग्राम (हरियाणा) के गांव बसई के रहने वाले हैं। उनके पिता सतबीर सिंह भी सेना में कर्नल थे, इसलिए जहां-जहां उनके पिता की पोस्टिंग रही, वे वहां रहे। कर्नल के रूप में सेवानिवृत्त होने के बाद उनके पिता एक सैनिक स्कूल के प्रिंसिपल थे। रोहित की पढ़ाई झारखंड के तिलैया सैनिक स्कूल से हुई है। उनकी मां स्कूल टीचर रही हैं। रोहित 2003 में वायुसेना में कमिशन हुए थे और ट्रेनिंग के लिए फ्रांस जाने से पहले वह ग्वालियर में तैनात थे। वह राफेल से पहले मिराज और सुखोई फाइटर जेट उड़ा चुके हैं। वे अब परिवार सहित नोएडा के सेक्टर-56 के जलवायु विहार में रहते हैं। बसई गांव में उनके दादा दादा नारायण सिंह रहते हैं। छुट्टी लेकर वह दादा सहित परिवार के अन्य सदस्यों से मिलने बसई गांव पहुंचते हैं। उनके दादा कहते हैं कि पोते ने परिवार, समाज व देश का नाम रोशन कर दिया। उसके ऊपर बहुत गर्व है। बचपन से ही उसके भीतर देशप्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी है। उसकी बातों से हर कोई प्रेरित होता था। आज उसने वह खुशी दी है, जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। 
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