झारखंड के तीन जिलों में खामोश क्रांति हो रही है। यह क्रांति शिक्षा के जरिये सामाजिक परिवर्तन की क्रांति है, गांवों के उत्थान की क्रांति है और यह देशज संस्कृति के पुनर्जागरण की भी क्रांति है। शिक्षा के जरिये क्रांति की यह पटकथा पूर्व आइपीएस आॅफिसर डॉ अरुण उरांव लिख रहे हैं। उचरी गांव से शुरू हुई बाबा कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला का यह सफर अब 49 स्कूलों तक जा पहुंचा है और इसके जरिये तीन हजार से अधिक बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। दो सौ से अधिक शिक्षक इन बच्चों को पढ़ा रहे हैं और उन्हें वही शिक्षा दी जा रही है, जो कमोबेश निजी स्कूलों के बच्चों को मिलती है। शिक्षा से समाज को रौशन करने की यात्रा पर डॉ अरुण उरांव अकेले ही निकले थे। उस समय लग रहा था कि राह बहुत कठिन है। टेढ़ी-मेढ़ी है। लेकिन कहते हैं न कि अगर इरादे नेक हों, मन में अटल विश्वास हो और काम को अंजाम तक पहुंचा देने का जज्बा हो, तो समाज भी आपके साथ खड़ा हो जाता है और डॉ अरुण उरांव के साथ भी यही हुआ है। डॉ उरांव की इस मुहिम को समाज का भी अब भरपूर साथ मिलने लगा है। शिक्षा के जरिये समाज में बदलाव लाने की डॉ अरुण उरांव की मुहिम को रेखांकित करती दयानंद राय की रिपोर्ट।

2014 में मांडर से शुरू हुआ अभियान
सुदूर ग्रामीण इलाकों में ग्रामीण बच्चों को शिक्षा देकर शिक्षित झारखंड गढ़ने का यह अभियान वर्ष 2014 में मांडर के उचरी गांव से शुरू हुआ। यहां बाबा कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला के जरिये इस अभियान का श्रीगणेश हुआ। अनिल उरांव के नेतृत्व में शुरू हुई इस पाठशाला में शुरुआत में बच्चों की संख्या 40 थी, जो अब बढ़ कर 200 से ज्यादा हो गयी है। डॉ अरुण उरांव कहते हैं कि जब मैंने आइपीएस की नौकरी से वालेंटरी रिटायरमेंट लिया, तो अपने घर पर कुछ बच्चों को पढ़ाने लगा। तभी महसूस हुआ कि गांव के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, इसके लिए कुछ किया जाना चाहिए और इसके बाद बाबा कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला के संचालन और विस्तार की रणनीति बनी और फिर सफर शुरू हो गया। अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के जरिये इन रात्रि पाठशालाओं का संचालन किया जा रहा है।

बाबा कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला के अभिनव प्रयास को ग्रामीण इलाकों में जबर्दस्त समर्थन मिल रहा है। पाठशाला के जरिये युवा साथी नि:स्वार्थ भाव से बाबा कार्तिक उरांव के सपनों को पूरा करने में लगे हुए हैं। शिक्षा के जरिये गांव को एकजुट करने में रात्रि पाठशाला पूरे दम-खम के साथ जुटी हुई है। रात्रि पाठशाला से जुड़े मांडर के कार्तिक लोहरा बताते हैं कि रात्रि पाठशालाओं के जरिये न सिर्फ अज्ञानता का अंधेरा दूर हो रहा है, बल्कि गांव की बेटियां-बहन और माताएं भी इससे जुड़ रही हैं।
महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए सिनगी दई सिलाई केंद्र की शुरूआत भी उचरी में की गयी है। इससे गांव के पुरुष भी रात्रि पाठशाला से जुड़ने लगे हैं। इससे गांवों में संवाद का सिलसिला कायम हुआ है। गांव की पहले की अखड़ा और धुमकुड़िया संस्कृति को भी इन पाठशालाओं के जरिये जीवित किया जा रहा है। इससे देशज संस्कृति का पुनर्जागरण भी किया जा रहा है। रात्रि पाठशालाओं के जरिये नशापान की समस्या सुलझाने के साथ महिलाओं की आमदनी बढ़ाने के लिए उन्हें सिलाई-बुनाई और कढ़ाई के लिए प्रेरित किया जा रहा है। खेती-बारी को फायदेमंद कैसे बनायें, इस पर भी उनके बीच चर्चा होती है। जिन पाठशालाओं में 100 से अधिक बच्चे हैं, उन्हें कंप्यूटर दिया गया है। उन्हें बचपन से ही डिजिटल मीडिया और आइटी का इस्तेमाल सिखाया जा रहा है।

बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ा
रात्रि पाठशालाओं का जो सिलेबस तैयार किया गया है, वह सरकारी स्कूलों में पढ़ाये जानेवाले सिलेबस के अनुरूप ही है, पर इसमें पब्लिक स्पीकिंग पर जोर दिया गया है। हर पांच-छह महीने के अंतराल में इन पाठशाला के बच्चों के बीच लिखित परीक्षा, सांस्कृतिक कार्यक्रम, भाषण और चित्रांकन प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इससे बच्चों में सबसे अच्छा करने की होड़ लग गयी है। अच्छा करनेवाले बच्चों को पुरस्कार के साथ सम्मानित भी किया जाता है। इससे उनका उत्साहवर्द्धन हुआ है। रात्रि पाठशाला की छात्रा खुशबू कुमारी कहती हैं कि उनका सपना बड़े होकर डॉक्टर बनने का है। रात्रि पाठशाला में अंग्रेजी और गणित के साथ विज्ञान विषय की पढ़ाई पर खास जोर है। यही नहीं, यहां कंप्यूटर भी सिखाया जाता है। इससे मेरी रुचि विज्ञान में बढ़ती जा रही है। रात्रि पाठशाला के जरिये हमें बहुमुखी शिक्षा दी जा रही है।

ऐसे होती है रात्रि पाठशालाओं में पढ़ाई
रात्रि पाठशालाएं आंगनबाड़ी, धुमकुड़िया या सामुदायिक भवनों में संचालित की जाती हैं। इसमेें शाम छह बजे से रात साढ़े आठ बजे तक पठन-पाठन होता है। गांव के ही कॉलेज जानेवाले मेधावी युवक-युवतियां इन बच्चों को पढ़ाते हैं। इन शिक्षकों को प्रशिक्षण के जरिये पढ़ाने की तकनीक बतायी गयी है। इसके अलावा खुद की मेहनत से भी इन शिक्षकों ने अपने ज्ञान और कौशल को उन्नत किया है।

कार्तिक बाबा के सपने को पूरा करना है
डॉ अरुण उरांव कहते हैं कि गांव के गरीब-गुरबों के बीच शिक्षा की अलग जगाने और उन्हें एकजुट करने के ध्येय से हमारी यात्रा दिनोंदिन आगे बढ़ रही है। एक पाठशाला से शुरू हुआ सफर 49 पाठशालाओं तक पहुंच गया है। इनमें 200 से अधिक शिक्षक तीन हजार बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। यह रास्ता लंबा, संघर्षपूर्ण और चुनौतियों से भरा है, पर हमने एक नयी लकीर खींचने की ठानी है। हम हर हाल में कार्तिक बाबा के शिक्षित और समृद्ध झारखंड के सपने को पूरा करेंगे, यह हमारा अटल विश्वास है।

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