होनहार : हौसले हैं बुलंद इनके, सपनों में भी है जान, आसमान में हैं उड़ने को तैयार, बस थोड़ी मदद की है दरकार
गरीब और पिछड़ा कहा जाने वाला राज्य झारखंड, देश का वह राज्य है जिसकी गोद में सिर्फ काला कोयला ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में राज्य का नाम रौशन करने वाले कोहिनूर भी बसते हैं। माना की झारखंड अन्य राज्यों की तुलना में उतना विकसित और संसाधन से लैस नहीं है, लेकिन यहां के युवा खिलाड़ियों की अगर बात की जाये तो यह विश्व के किसी भी देश के राज्यों से कम नहीं हैं। जैसे मछली के बच्चों को तैराना नहीं सिखाया जाता वैसे ही झारखंड के युवाओं को खेल के क्षेत्र में उड़ान भरना नहीं सिखाया जाता। झारखंड की मिट्टी में ही कोई बात है जिसने महेंद्र सिंह धोनी और दीपिका कुमारी जैसे कोहिनूर को जन्म दिया। जिन्होंने अपने हुनर से झारखंड का नाम सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में रौशन कर दिखाया। यह झारखड़ का दुर्भाय कहें या फिर कलयुग की माया जिसकी वजह से आसमान में चमकने वाले न जाने कितने सितारे आज जमीन पर टिमटिमाने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। यहां की मिट्टी ने उनके पैरों में जान तो डाल दी, उन्हें मेहनत करना भी सिखा दिया, लेकिन उनके हौसले और सपने को टूटने से बचा नहीं पायी। यहां के हर युवा खिलाड़ियों में धोनी और दीपिका जैसा जज्बा और हुनर है। लेकिन जिंदगी के थपेड़ों के सामने उनका हौसला कमजोर होता जा रहा है। ‘आजाद सिपाही’ की टीम ने इन खिलाड़ियों की पीड़ा और इनके हालात को जाना और समझा। झारखंड का भविष्य कहीं और नहीं, इन्हीं युवाओं के हाथों की लकीरों में है। इनके भाग्य की स्याही से झारखंड के सुनहरे भविष्य का अध्याय लिखा जा सकता है। बस जरूरत है हाथ बढ़ाने की। राज्य के युवा खिलाड़ियों की स्थिति की पड़ताल करती आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राहुल सिंह की रिपोर्ट।
आज पूरा विश्व कोरोना की मार झेल रहा है और भारत इस महामारी की चपेट में पूरी तरह से आ गया है। देश का हर नागरिक आज कोरोना से हताश और निराश हो चुका है। कितनों के अपने चले गये। कितनों के घर छुट गये। कितनों का रोजगार छिन गया। कितनों का परिवार बिछड़ गया। और न जाने कितनों का सपना टूट गया।
इनके बीच राज्य के युवा खिलाड़ी भी हैं। जिन्होंने कुछ बनने का सपना देखा है। ऊंची उड़ान भरने की तमन्ना है। जिनके अंदर वह जज्बा और हुनर है, जिसके दम पर वह अपनी मंजिल पा सकते हैं। झारखंड के साथ-साथ देश का भी नाम विश्व के फलक पर रौशन कर सकते हैं। वह विपरीत परिस्थिति में भी अब तक टूटे नहीं हैं। बस जरूरत है तो उनके इस आग को हवा देने की। उनके मनोबल को बल देने की। उनकी मजबूरी को समझने की। उन्हें मदद करने की।
मजबूरी केवल पांच हजार रुपये की
खिलाड़ियों की मजबूरी समझने के लिए उनकी जिंदगी और मौजूदा हालात में झांकना जरूरी है। तभी उनकी मजबूरी को महसूस किया जा सकता है। एक लड़का है। वह दिव्यांग है। उसका सपना एक एथलीट बनने का था। दिव्यांग होने के बावजूद उसने हिम्मत नहीं हारी। अपने सपने को पूरा करने के लिए मेहनत करता गया। उसकी मेहनत रंग लायी। वह खेलकूद में अव्वल रहने लगा और धीरे-धीरे एथलीट बन गया। अपने 10 साल के करियर में उसने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 100 मीटर, 200 मीटर और 400 मीटर की दौड़ में कई मेडल अपने नाम किये। उसने राष्ट्रीय पारा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में दस वर्ष तक देश का प्रतिनिधित्व भी किया। जब जीत से हौसला बुलंद हुआ तो उसके सपने भी बड़े होते गये। अब उसका लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप में देश का प्रतिनिधित्व कर तिरंगे को सम्मान देने का था। देखते ही देखते उस लड़के का सपना पूरा होता दिखने लगा। साल 2015 में अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप के लिए उसका चयन भी हो गया। ये चैंपियनशिप बेलरूश में होनी थी। एसोसिएशन की तरफ से चैंपियनशिप में भाग लेने के लिए निजी खर्च पर जाने का फरमान जारी किया गया था। किसी तरह दौड़-भाग कर पासपोर्ट तो बनवा लिया, लेकिन पांच हजार रुपये के लिए उसका वीजा नहीं बन पाया। उसने बहुत कोशिश की लेकिन किसी ने उसकी मदद भी नहीं की। महज पांच हजार रुपये के लिए वह अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप में भाग नहीं ले पाया। अंत में उस लड़के को इस बड़ी प्रतियोगिता से हाथ धोना पड़ा। उस लड़के का नाम है अजय। नाम के अनुसार कभी नहीं हारने वाला यह लड़का, आज भी नहीं हारा है। यह उस लड़के की हार नहीं है। यह हमारे समाज और हमारे सिस्टम की हार है। यह उस लड़के की बेबसी नहीं थी कि पांच हजार रुपये नहीं मिल पाये। यह समाज और सिस्टम का दुर्भाय था कि महज पांच हजार के लिए हमने अपने तिरंगे से वह सम्मान छिन लिया जो अजय दिलाना चाहता था। यह कोई कहानी नहीं, एक खिलाड़ी के जीवन की सच्चाई है। हम बात कर रहे हैं धनबाद के बाघमारा प्रखंड अंतर्गत मालकेरा दक्षिण पंचायत के मालकेरा चार नंबर निवासी एथलीट अजय कुमार पासवान की जिसने झारखंड का मान बढ़ाया। जिसने राष्ट्रीय पारा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में दस वर्ष तक देश का प्रतिनिधित्व किया। गरीबी और मौजूदा हालात ने उसे खेल से तो दूर कर ही दिया, साथ ही आज अपनी पेट की भूख मिटाने के लिए मेडल बेचने के बारे में सोचना पड़ रहा है।
प्रैक्टिस के लिए मैदान नहीं, काम के लिए मिल रहा खेत
हरला थाना सेक्टर-09 अंतर्गत महेशपुर निवासी तीरंदाज गुड़िया कुमारी आर्थिक तंगी को दूर करने के लिए कभी दूसरे के खेतों में धान का बिचड़ा रोपती है। कभी ईंट-भट्ठा में काम करती है। इन दिनों अपने घर के आस-पास हीं दूसरे के घर का काम रही है। उसने बताया कि घर की आर्थिक स्थित बहुत डंवाडोल है। पिता की तबीयत ठीक नहीं रहती है। दो छोटे भाई अभी पढ़ते हैं।
पेट की आग के सामने, भटक गया ‘निशाना’
बिरसा बासा-सेक्टर 12 निवासी तीरंदाज दीपक संवइया घर-परिवार की आर्थिक समस्या को दूर करने के लिए पिछले कोरोना काल से हीं दिहाड़ी मजदूरी कर रहा है। उसके पिता नहीं हैं। मां घर में ही परचून की दुकान चलाती हैं, जो अब चलती भी नहीं है। बड़ा भाई तीरंदाजी में अभी हाथ साफ ही कर रहा था, कि पिता की मौत हो गयी। नतीजतन तीरंदाज दीपक को घर-परिवार चलाने के लिए दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ी।
हालात की काली साया में दब रहा हुनर
यह हालत केवल अजय, दीपक या गुड़िया जैसे दो-तीन खिलाड़ियों की नहीं है। राज्य में ऐसे पचासों की संख्या में खिलाड़ी हैं। खिलाड़ियों की दुर्दशा की कहानी लॉकडाउन में लगातार उभर कर सामने आ रही है। पिछले एक साल के इस कोविड काल में मीडिया के माध्यम से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को सब्जी बेचते देखने से लेकर तमाम झंझावातों से गुजरते लोगों ने देखा। ये खिलाड़ी हर दिन खुद जीवन जीने के लिए लड़ रहे हैं। इसे झारखंड के साथ-साथ देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहें? जो कोहिनूर अपने हुनर से पूरे विश्व को रौशन कर सकते हैं, वह आज काले कोयले के साये के नीचे छिपे हुए हैं। जिनका हुनर हालात की वजह से दब रहा है।
कदम बढ़ा है, थोड़ा बढ़ाने की जरूरत
ऐसा नहीं कि सरकार की इन खिलाड़ियों पर नजर नहीं है। हाल में हेमंत सरकार ने खेल नीति में बदलाव कर खिलाड़ियों को सहुलियत देने की पहल की है। कई खिलाड़ियों को नौकरी दी गयी है। नौकरी करने लायक बड़े खिलाड़ी हैं। सोचना उनके लिये भी होगा, जो नयी पौध हैं। उन्हें वृक्ष बनाने के लिए मदद की दरकार है। राज्य के छोटे-छोटे इलाके में बसे छोटे नन्हें खिलाड़ियों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। जो न जाने हर दिन रात में कितने सपने बुनते होंगे और सुबह गरीबी के थपेड़े में परिवार के साथ पिस कर सपने चूर हो जाते होंगे। ऐसे खिलाड़ियों को चिन्हित कर पारिवारिक उत्थान पर ध्यान देने की जरूरत है, जिससे ये परिवार की जरूरत को पूरा करने के लिये रोज गरीबी की चक्की में पिस कर कहीं गुम न हो जायें।