आधा दर्जन दावेदारों की सूची लेकर लौटे दिल्ली, अब फैसला वहीं होगा
मंगलवार दिन के बारह बजकर पांच मिनट पर जब श्रद्धानंद रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय राजीव गांधी अमर रहे…राजीव गांधी जिंदाबाद के नारों से गूंज रहा था, वहां मौजूद कांग्रेस के झारखंड प्रभारी आरपीएन सिंह पत्रकारों के सवालों से जूझ रहे थे। उन सवालों में एक कॉमन सवाल था प्रदेश कांग्रेस को नया अध्यक्ष कब मिलेगा। और जवाब में उनके मुंह से सिर्फ इतना निकल रहा था शीघ्र। इस जवाब से जो अर्थ निकलकर सामने आ रहा था वह यह था कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा जल्द होगी और नये प्रदेश अध्यक्ष पर निर्णय पार्टी का आलाकमान करेगा। यही नहीं वह जिन नामों की चर्चा प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए चल रही है उनके संबंध में भी कुछ बोलने से बच रहे थे। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए असमंजस की यह स्थिति सिर्फ आरपीएन सिंह के सामने नहीं है बल्कि लगभग हर कांग्रेसी इस विषय पर असमंजस की स्थिति में है और यह जानना चाहता है कि आखिर पार्टी का नया प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा। प्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी हालत पर दयानंद राय की खास रिपोर्ट।
नौ अगस्त को कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद से डॉ अजय कुमार के इस्तीफे के बाद से पार्टी और राजनीति के गलियारे में चर्चाओं का बाजार गर्म है कि पार्टी का नया प्रदेश अध्यक्ष आलमगीर आलम या सुखदेव भगत में से कोई हो सकता है। इस पद के लिए जिन अन्य नामों की चर्चा है उनमें सुबोधकांत सहाय, फुरकान अंसारी, ददई दुबे और प्रदीप बलमुचु, कालीचरण मुंडा और रामेश्वर उरांव के साथ हेमंत टोप्पो के भी नाम शामिल हैं। हालत यह है कि कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए एक अनार और सौ बीमार वाली स्थिति है। और इस पद के लिए पार्टी के सीनियर नेता दिल्ली तक अपनी गोटी सेट करने में जुटे हुए हैं। यही नहीं आरपीएन सिंह को भी वे अपनी भावना से अवगत कराने से चूक नहीं रहे। पर इतना तो तय है कि पार्टी में यह पद किसी एक को ही मिलेगा और यह तय पार्टी का आलाकमान तय करेगा। इस मसले पर आरपीएन सिंह की भूमिका आलाकमान को सिर्फ जमीनी स्थिति और किसी बेहतर विकल्प का सुझाव देने से अधिक नहीं है।
कुछ कहने से बचते रहे आरपीएन सिंह
झारखंड में कांग्रेस का नया प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा इस पर स्पष्ट रूप से कुछ बोलने से पार्टी के झारखंड प्रभारी इसलिए बच रहे हैं, क्योंकि अभी इस पर पार्टी में आम सहमति नहीं बन पायी है।
उनके पास कुछ नामों की सूची है और इस मसले पर उन्होंने पार्टी के सीनियर नेताओं से मशवरा करके उनकी राय भी जानी है। पार्टी इस मसले पर खुलकर कुछ कहने से इसलिए भी बचना चाहती है, क्योंकि झारखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और थोड़ी सी भी चूक पार्टी में माहौल और खराब कर सकती है। पार्टी में जिस तरह से लगभग 16 महीने के कार्यकाल के बाद डॉ अजय की विदाई हुई है, उससे पार्टी सदमे में है और नये प्रदेश अध्यक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती पार्टी में नयी ऊर्जा भरने और सबको साथ लेकर चलने की होगी। इधर, बदलते समीकरणों के बीच मंगलवार शाम नये प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए संभावित नेताओं की सूची लेकर आरपीएन सिंह दिल्ली चले गये। संभवत: 22 अगस्त को दिल्ली में नये प्रदेश अध्यक्ष पद की घोषणा हो सकती है।
आदिवासी या मुस्लिम समुदाय में से होगा कोई नया प्रदेश अध्यक्ष
केंद्र में अभी कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के हाथों में है और उनकी कार्यप्रणाली को देखते हुए इसकी संभावना है कि पार्टी आदिवासी या मुस्लिम समुदाय में से किसी को कांग्रेस का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाये। पार्टी में जिस तरह के समीकरण बन रहे हैं, उसमें अधिक संभावना यही है कि पार्टी आलमगीर आलम को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाये, क्योंकि उनके नाम पर कोई विवाद नहीं है। प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए दूसरे प्रमुख दावेदार सुखदेव भगत की कार्यशैली पर प्रदीप बलमुचु उंगली उठा चुके हैं। आलमगीर आलम के साथ प्लस प्वाइंट यह भी है कि उनकी प्रशंसा डॉ अजय कुमार ने भी की है। इन परिस्थितियों में पार्टी यदि विवाद से बचना चाहेगी, तो निश्चित रूप से उसके सामने अंतिम विकल्प आलमगीर आलम का होगा। आलमगीर आलम कांग्रेस विधायक दल के नेता भी हैं और उन्हें पार्टी के सभी विधायकों का समर्थन भी प्राप्त है। वैसे भी विनम्र और सबको साधकर चलनेवाले आलमगीर पर शायद ही किसी अन्य सीनियर नेता को आपत्ति हो। इसी तरह इनके प्रदेश अध्यक्ष बनने से कांग्रेस डॉ अजय कुमार को भी खोने से बच जायेगी, क्योंकि जिन नामों की चर्चा चल रही है उनमें से किसी अन्य के पार्टी अध्यक्ष बनने से निश्चित रूप से डॉ अजय कुमार पार्टी छोड़ देने को विवश हो जायेंगे। आखिर जिन लोगों को वह अपराधियों से बदतर बता चुके हैं, उनके साथ वे काम कैसे करेंगे।
किस उम्मीदवार में क्या है प्लस और माइनस
आलमगीर आलम : आलमगीर आलम झारखंड विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्हें यह जिम्मेदारी देकर कांग्रेस मुसलमानों को खुश कर सकती है। वर्तमान में वह कांग्रेस विधायक दल के नेता भी हैं। उनका सबसे प्लस प्वाइंट यह है कि उनके नाम पर शायद ही किसी वरीय नेता को ऐतराज हो। डॉ अजय कुमार ने अपने इस्तीफे में जिनकी प्रशंसा की है वे आलमगीर ही हैं।
सुखदेव भगत : सुखदेव भगत राज्य के आदिवासी समाज का प्रमुख चेहरा हैं। अच्छे वक्ता हैं और उन्हें झारखंड के जमीनी मुद्दों की समझ है।
उन्हें झारखंड के प्रदेश अध्यक्ष के पद का पूर्व का अनुभव है और उन्होंने अपनी जिम्मेवारी का निर्वहन बखूबी किया है। यूथ कांग्रेस, महिला कांग्रेस और अल्पसंख्यक वर्ग में उनकी पकड़ है। पर प्रदीप बलमुचु ने इनकी कार्यशैली पर सवाल उठाये थे यह इनका नेगेटिव प्वाइंट है।
सुबोधकांत सहाय : सहज और सबके लिए सुलभ रहनेवाले सुबोधकांत सहाय के पक्ष में राजनीति में उनका लंबा अनुभव है। अल्पसंख्यकों के बीच वह खासे लोकप्रिय हैं। विधायक और सांसद रहने के साथ वे केंद्र सरकार में भी मंत्री पद चुके हैं और सबको पार्टी में साधने का काम भी कर सकते हैं, पर पार्टी के कई सीनियर नेता उन्हें यह जिम्मेदारी मिलते देखना नहीं चाहेंगे। डॉ अजय कुमार के साथ उनकी तनातनी भी उनका नेगेटिव प्वाइंट है। उनका नाम सामने आते ही विरोधी सक्रिय हो जाते हैं।
ददई दुबे : ददई दुबे इंटक के कद्दावर नेता रहे हैं। दबंग स्वभाव के हैं। राजनीति में वे मुखिया से लेकर विधायक और सांसद भी रह चुके हैं। वे झारखंड सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर तक का भी दायित्व संभाल चुके हैं। मजदूरों के वे धाकड़ नेता हैं पर प्रदेश अध्यक्ष पद में सबको साथ लेकर चलने और साधने की कला में वे जरा कमजोर साबित होंगे। उनके नाम पर आम सहमति बनने की संभावना भी कम है। राज्य के आदिवासियों और मुसलमानों के बीच इनकी पकड़ भी बहुत अच्छी नहीं है।
रामेश्वर उरांव : रामेश्वर उरांव आइपीएस रह चुके हैं। अच्छे वक्ता हैं और आदिवासी समुदाय में उनकी पकड़ भी अच्छी है। लोहरदगा सीट से वे सांसद भी रह चुके हैं। राष्टÑीय अनुसूचित जनजाति आयोग के चेयरमैन के रुप में उन्होंने आदिवासियों के उत्थान के लिए उल्लेखनीय काम किया है। वे प्रेसिडेंट पुलिस मेडल से भी सम्मानित हैं। पर इनकी पुलिसिया छवि इनके लिए नेगेटिव प्वाइंट साबित हो सकती है।
कालीचरण मुंडा : कालीचरण मुंडा ने खूंटी सीट पर अर्जुन मुंडा को कड़ी टक्कर दी थी। वे खूंटी लोकसभा चुनाव बहुत कम मतों के अंतर से हारे। आदिवासी समुदाय का वे युवा चेहरा हैं। खूंटी और राज्य के आदिवासियों को कांग्रेस के पक्ष में करने में वे अहम भूमिका निभा सकते हैं। यदि पार्टी किसी नये नेता को प्रदेश अध्यक्ष पद देने की संभावनाओं पर विचार करती है तो वे उनका नाम भी टटोला जा सकता है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पद पर विवाद एक नजर में
20 नवंबर 2017 को डॉ अजय कुमार ने कांग्रेस के नये प्रदेश अध्यक्ष का पदभार संभाला था
उनका कार्यकाल 16 महीने तक का रहा
एक अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में डॉ अजय कुमार और सुबोधकांत के समर्थकों के बीच हाथापाई हुई
नौ अगस्त को उन्होंने राहुल गांधी को अपना इस्तीफा दे दिया
19 अगस्त को कांग्रेस के झारखंड प्रभारी आरपीएन सिंह रांची पहुंचे और पार्टी के वरीय नेताओं से नये अध्यक्ष पद के लिए सुझाव लिए। संभावित उम्मीदवारों की सूची लेकर वे 20 अगस्त को दिल्ली लौट गये
22 अगस्त को हो सकती है कांग्रेस के नये प्रदेश अध्यक्ष पद की घोषणा