वर्तमान परिस्थितियों में सीनियर नेताओं में सर्वमान्य नेता ही आगे ले जा सकता है पार्टी को
क्या आलमगीर फूंक पायेंगे पार्टी में नयी जान
यदि प्रदेश नेतृत्व फिर से आलमगीर आलम को पार्टी की कमान सौंपता है और इसकी प्रबल संभावना भी है तो यह सवाल लाजिमी है कि क्या आलम कांग्रेस पार्टी में नयी जान फूंक पायेंगे। नवंबर-दिसंबर में झारखंड में विधानसभा चुनाव होना संभावित हैं। इससे पहले कांग्रेस पार्टी को एक ऊर्जावान नेतृत्व चाहिए जो विधानसभा चुनावों में पार्टी की नैया पार लगा सके। कांग्रेस को जरूरत नये खून की है, पर इसके लिए पार्टी के कई पुराने नेताओं की महत्वाकांक्षा की बलि चढ़ानी होगी। यह पार्टी के सीनियर नेता नहीं चाहते। डॉ अजय कुमार पार्टी में नया खून भरने की असफल कोशिश करके हार चुके हैं। अब चूंकि विधानसभा चुनाव नजदीक है, इसलिए ऐसी किसी पहल की संभावना भी नहीं है।
कांग्रेस को नया जीवन पाने के लिए क्या करना होगा
एक समय में झारखंड में सबसे मजबूत पार्टी रही कांग्रेस बीते लोकसभा चुनावों में केवल एक सीट पर सिमट कर रह गयी है। इसकी वजह यह रही कि पार्टी कुछ चुनिंदा नेताओं के हाथों की कठपुतली बन गयी है। पार्टी में नया नेतृत्व सामने नहीं आ रहा है। भाजपा के पास राष्ट्रवाद की संजीवनी बूटी है, तो कांग्रेस का सेकुलरिज्म बदलते जमाने में लगभग आभाहीन हो चुका है। केंद्र में भी पार्टी की स्थिति डगमग है और झारखंड में कांग्रेस लगातार कमजोर पड़ रही है। ऐसे में पार्टी को नया जीवन देने के दो रास्ते हैं, जिसमें एक दीर्घकालिक और दूसरा अल्पकालिक है। अल्पकालिक समाधान तो यह है कि आलमगीर आलम को कांग्रेस पार्टी कमान सौंपे और वह विधानसभा चुनाव में पार्टी को मजबूत रखते हुए बेहतर प्रदर्शन के लिए तैयार करें। वहीं दीर्घकालिक समाधान यह है कि पार्टी की सर्जरी की जाये और नये खून को नेतृत्व देने का रास्ता साफ किया जाये। भाजपा के राष्ट्रवाद की टक्कर में कांग्रेस पार्टी को एक कारगर वाद चाहिए जो जनता के बीच उसे लोकप्रिय बना सके।
नेता कोई बने, कांग्रेस की परिस्थितियां वही रहेंगी
झारखंड में पार्टी आलाकमान चाहे किसी के भी हाथ कमान सौंप दे, लेकिन झारखंड के कांगे्रसियों की सबसे खराब बात यही है कि वे चेहरे से नफरत करने लगे हैं। उन्हें अपने सामने सभी बौने लगते हैं। उनसे बड़ा काबिल और प्रभावशाली नेता कोई और नहीं। इन सबों के बीच पार्टी की कमान चाहे किसी को मिले, लेकिन कांग्रेस शायद ही फिलहाल झारखंड में अपनी आभा बिखेर पाये। उसका चेहरा मलिन हो गया है। अगर रंग-रोगन करके, स्रो पाउडर घस कर उसे चमकाने की कोशिश की गयी, तो ज्यादा आशंका इसी बात की है कि उसका चेहरा ही छिल जाये।
क्या है सुखदेव भगत का प्लस प्वाइंट
पार्टी के नये अध्यक्ष के लिए जिन नेताओं के नाम की चर्चा है, उनमें से एक सुखदेव भगत भी हैं। सुखदेव भगत के साथ प्लस प्वाइंट यह है कि वह राज्य के आदिवासी समाज का एक प्रमुख चेहरा हैं। पूर्व में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व संभाल चुके हैं। राजनीति में आने से पहले प्रशासनिक दायित्व का निर्वहन भी कर चुके हैं। प्रभावशाली वक्ता हैं। झारखंड के जमीनी मुद्दों की उनको गहरी समझ भी है। यूथ कांग्रेस, महिला कांग्रेस और अल्पसंख्यक वर्ग में उनकी पकड़ भी है। उनके नाम पर पार्टी झारखंड में आदिवासी कार्ड भी खेल सकती है। झारखंड की राजनीति में इसकी उपयोगिता भी है।
क्या है आलमगीर आलम का प्लस प्वाइंट
कांग्रेस विधायक दल के नेता आलमगीर आलम का सबल पक्ष यह है कि उनके नाम पर पार्टी के वरीय नेताओं के एतराज की संभावना कम है। उन्हें अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर पार्टी प्रदेश के मुसलमानों को खुश भी कर सकती है। विनम्र स्वभाव के आलमगीर सबको साथ लेकर चलने के हिमायती हैं। आसन्न विधानसभा चुनाव में वह जो टिकट बंटवारा करेंगे, उसमें पार्टी के सीनियर नेताओं की महत्वाकांक्षा का ध्यान रखेंगे। यानी पार्टी के बड़े नेताओं से बैर लेकर आलमगीर नहीं चलेंगे। वह झारखंड विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
कालीचरण मुंडा पर भी हो सकता है विचार
राजनीतिक गलियारे में यह भी चर्चा है कि पार्टी नये अध्यक्ष के लिए खूंटी के कालीचरण मुंडा के नाम पर भी विचार कर सकती है। उन्होंने लोकसभा चुनाव में खूंटी सीट पर अर्जुन मुंडा को कड़ी टक्कर दी। वह आदिवासी चेहरा भी हैं। झारखंड के आदिवासियों को कांग्रेस से जोड़ने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका भी हो सकती है। हालांकि उनके अध्यक्ष बनने की संभावना कम ही है।
अध्यक्ष पद से इसलिए इस्तीफा देना पड़ा डॉ अजय को
20 नवंबर 2017 को डॉ अजय ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का पदभार संभाला था। अपने 16 महीने के कार्यकाल में उन्होंने पार्टी में नया खून भरने की पूरी चेष्टा की थी, पर इस कवायद में पार्टी के सीनियर नेताओं को अपनी उपेक्षा महसूस होने लगी थी। प्रदेश कांग्रेस के वरीय नेताओं को डर था कि अगर डॉ अजय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने रहे तो इसकी प्रबल संभावना है कि उनमें से कइयों को और जिन चहेतों को वह टिकट दिलाना चाहते हैं, उन्हें टिकट नहीं मिले। इसलिए वे हाथ धोकर डॉ अजय के पीछे पड़ गये। इसका क्लाइमैक्स प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में मारा-मारी के रूप में सामने आया। डॉ अजय पर यह भी आरोप लगता रहा कि वह अपनी पुलिसिया छवि से बाहर नहीं निकल पाये हैं। लोकसभा चुनावों में टिकट बंटवारे के दौरान उन्होंने गड़बड़ी की थी। अपने 16 माह के कार्यकाल के दौरान उन्होंने जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने का काम किया था। हालांकि अपने कार्यकाल के दौरान वह प्रदेश कांग्रेस कमेटी का गठन तक नहीं कर पाये थे।