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    Home»विशेष»झारखंड का खरा सोना, शिबू सोरेन, ‘भारत रत्न’ के असली हकदार
    विशेष

    झारखंड का खरा सोना, शिबू सोरेन, ‘भारत रत्न’ के असली हकदार

    shivam kumarBy shivam kumarAugust 31, 2025Updated:August 31, 2025No Comments17 Mins Read
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    विशेष
    आदिवासियों को मान-सम्मान के साथ जीना सिखाया, आत्मनिर्भर बनाया
    गरीबों, शोषितों और वंचितों की दबी आवाज को बुलंद किया
    बलिदान और सेवा की असली मिसाल थे दिशोम गुरु शिबू सोरेन

    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    शिबू सोरेन यानी झारखंड की ताकतवर आवाज, गरीबों, शोषितों और वंचितों की दबी आवाज को धार देने वाला, उनके हक और सम्मान की लड़ाई लड़नेवाला, उन्हें समाज में विशेष पहचान दिलानेवाला, उनके सपनों को साकार करने वाला। झारखंड अगर शिबू सोरेन को ‘भारत रत्न’ देने की मांग कर रहा है, तो उसके पीछे वजह है। वजह एक नहीं कई हैं। शिबू सोरेन को ‘भारत रत्न’ देना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं होगा, यह भारत की उस जनजातीय आत्मा का सम्मान होगा, जो सदियों से उपेक्षा का शिकार रही। यह उन तमाम लोगों को सम्मानित करेगा, जो जंगलों और पहाड़ों से उठकर अपने हक की लड़ाई लड़ते रहे हैं। शिबू सोरेन का जीवन एक अनवरत संघर्ष, बलिदान और समर्पण की गाथा है। एक महाकाव्य है। एक व्यक्तिगत त्रासदी से प्रेरित होकर उन्होंने जो आंदोलन शुरू किया, वह लाखों लोगों की आशा और पहचान का प्रतीक बन गया। उन्होंने न केवल आदिवासियों को महाजनी और सूदखोरी प्रथा के चंगुल से मुक्त कराया, बल्कि उन्हें संगठित कर एक अलग राज्य के निर्माण के सपने को साकार किया, जो भारत के इतिहास में एक मील का पत्थर है। उन्होंने आदिवासियों की शिक्षा, स्वास्थ, अधिकार और सम्मान के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। शिबू सोरेन आजादी के बाद भारत के संभवत: एकमात्र शख्सियत रहे, जिन्होंने चार दशक तक अलग झारखंड आंदोलन का नेतृत्व किया। शिबू सोरेन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के अकेले ऐसे नेता रहे, जो आक्रामक राजनीति के इस दौर में भी कभी अपने विरोधियों के खिलाफ कुछ नहीं बोलते थे। शांत, संयत और शालीन तरीके की राजनीतिक कार्यशैली ही उन्हें दूसरों से अलग करती थी और यही कारण है कि वह जननेता कहे जाते थे। सत्ता के लिए राजनीतिक खुंटचालों को चिमटे से भी नहीं छूनेवाले शिबू सोरेन, आजीवन निस्पृह तरीके से अपना काम करते रहे। राजनीतिक गहमा-गहमी से परे झारखंड की राजनीति का यह युगपुरुष रांची में अपने आवास पर निश्छल मुस्कान लिये बैठा रहता था, अपने उन लोगों के लिए, जो हर पल उसके दिलों के करीब होते थे। झारखंड का हर व्यक्ति इसीलिए गुरुजी को प्यार करता था, क्योंकि उसे पता था कि यह एक व्यक्ति उसके हर दुख-दर्द को दूर करने का माद्दा रखता है। इसलिए गुरुजी आज भी झारखंड के कण-कण में जिंदा हैं और झारखंड उनके लिए ‘भारत रत्न’ की मांग कर रहा है। आजाद सिपाही के संपादक राकेश सिंह का विशेष आलेख।

    शुरूआती जीवन त्रासदी और गहरे सामाजिक-आर्थिक संघर्षों से भरा रहा
    रांची से लगभग 70 किलोमीटर दूर रामगढ़ जिले के गोला से एक पतली-सी सड़क पहाड़ों पर नागिन की तरह डोलती जाती है। यह सड़क जहां खत्म होती है, वहीं एक गांव है नेमरा। वहीं एक छोटा-सा रेलवे स्टेशन है, जिसका नाम है बरलंगा। नेमरा गांव विशालकाय चंदू पहाड़ के बीच बसा हुआ है। गांव के आसपास महाजनों-बनियों की अजगर सी कतारें फैली हुई हैं। इसी नेमरा में सोबरन मांझी और सोनामुनी मांझी रहते थे। संथाल आदिवासी परिवार के घर 11 जनवरी, 1944 को एक बच्चे का जन्म हुआ, जिसका नाम शिवलाल रखा गया। यही शिवलाल बाद में शिबू सोरेन बने। सोबरन मांझी शिक्षक थे। शिबू सोरेन का प्रारंभिक जीवन व्यक्तिगत त्रासदी और गहरे सामाजिक-आर्थिक संघर्षों से भरा रहा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नेमरा के सरकारी स्कूल और गोला हाइ स्कूल से हुई। उस दौर में अविभाजित बिहार के आदिवासी इलाकों में महाजनों का आतंक था। आदिवासी सूदखोरी के चक्र में फंसे हुए थे। 13 साल के लड़के की जिंदगी उस वक्त बदल गयी, जब उनके गांधीवादी पिता सोबरन सोरेन की 27 नवंबर, 1957 को गोला प्रखंड मुख्यालय से लगभग 16 किलोमीटर दूर लुकैयाटांड़ जंगल में साहूकारों द्वारा हत्या कर दी गयी। इसने उन पर गहरा प्रभाव डाला। उनके पिता सूदखोरी और शराबबंदी जैसी कुप्रथाओं का विरोध करते थे।

    शिबू सोरेन के जीवन में कहानियां ही कहानियां थीं। किसी की समझ में नहीं आता था कि वह कहां से शुरू करे और कहां खत्म करे। उनके जीवन का हर दिन नयी कहानी लिखता था। जिस तरह से चट्टानें हजारों साल का इतिहास अपने सीने में संजोये रखती हैं, उसी तरह दिशोम गुरु का जीवन किस्सों-कहानियों और असंख्य दुखों से रंगा हुआ था। वह संघर्ष और आंदोलन की जीती-जागती मिसाल थे।
    चादर में बच्चे को
    पीठ पर लटकाये
    धान रोपती पहाड़ी स्त्री
    रोप रही है अपना पहाड़ सा दुख
    सुख की एक लहलहाती फसल के लिए
    प्रसिद्ध कवियित्री निर्मला पुतुल की ये पंक्तियां झारखंड की चर्चा होते ही जेहन को ऐसे कुतरने लगती हैं, जैसे भूख से व्याकुल चुहिया किसी सड़ते चमरौधे जूते को कुतरने लगती है। कविता की बांह पकड़े सैकड़ों संघर्ष याद आने लगते हैं, जो अपनी माटी, पहाड़, पेड़, पानी और जिंदगी की हिफाजत में लड़े गये। हजारों कविताएं बादल बन कर आकाश को ढंक लेती हैं। याद आने लगते हैं सिदो-कान्हू, तिलका मांझी, बिरसा और तानाजी भगत और याद आने लगती हैं सिनगी दई। अपनी धरती की हिफाजत के लिए आदिवासियों की अनगिनत शहादतों से मस्तिष्क में उजास फैलने लगता है।

    13 साल में बचपन खत्म
    पिता का साया सिर से उठ गया और अचानक शिबू सोरेन का बचपन खत्म हो गया। पिता की हत्या और परिवार की आर्थिक तंगी के कारण वह दसवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ पाये। उस 13 साल के लड़के ने एक प्रण के साथ संघर्ष का रास्ता चुना और गरीबों की आवाज बन गया। परिवार की जीविका के लिए उस लड़के ने रेल लाइन निर्माण परियोजना आदि में मजदूरी भी की। खेती भी करते। शिबू सोरेन ने धीरे-धीरे गोला के आसपास महाजनों के खिलाफ युवाओं को एकजुट कर संघर्ष शुरू किया। शिबू सोरेन ने 18 वर्ष की आयु में 1962 में ‘संथाल नवयुवक संघ’ की स्थापना की। इसका उद्देश्य आदिवासी युवाओं को सामाजिक परिवर्तन के लिए एकजुट करना था। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘सनोत संथाल समाज’ की भी स्थापना की, जिसके माध्यम से उन्होंने आदिवासियों को संगठित किया और उनके हितों के लिए संघर्ष की रणनीति तैयार की। यह शुरूआती प्रयास उनके जीवन की दिशा को स्पष्ट करता है, जहां उनका लक्ष्य आदिवासियों के शोषण के विरुद्ध एक मजबूत सामाजिक चेतना का निर्माण करना था।

    धान लगाने वाला ही धान काटेगा, आत्मनिर्भरता की नींव को स्थापित किया
    महाजनी प्रथा को खत्म करने के लिए शिबू सोरेन ने धनकटनी आंदोलन चलाया। उन्होंने आदिवासियों को जागरूक किया कि धान लगाने वाला ही धान काटेगा और इस पर महाजनों का कोई अधिकार नहीं। शिबू सोरेन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन पर उनके अधिकारों की लड़ाई थी। 1960 और 1970 के दशक में झारखंड में महाजनी और सूदखोरी प्रथा अपने चरम पर थी, जिससे आदिवासियों की जमीन धोखे से हड़पी जा रही थी। यह आंदोलन एक अद्वितीय रणनीति पर आधारित था, जिसमें महिलाएं हसिया लेकर जमींदारों के खेतों से फसलें काटती थीं, जबकि पुरुष तीर-कमान के साथ उनकी सुरक्षा करते थे। यह सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि आदिवासी पहचान, आत्म-सम्मान और भूमि पर उनके अधिकार की पुनर्स्थापना थी। इस आंदोलन ने आदिवासियों को शोषण के खिलाफ लड़ने का साहस दिया और उनकी सामूहिक शक्ति का प्रदर्शन किया। यह संघर्ष विनोबा भावे के भूदान आंदोलन और जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन जैसे अन्य भारत रत्न प्राप्तकर्ताओं के सामाजिक सुधार आंदोलनों के समान है। यह शिबू सोरेन के संघर्ष को एक व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ प्रदान करता है, जहां उनका योगदान केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता के बाद भारत में सामाजिक न्याय की सबसे मजबूत लड़ाइयों में से एक था। उन्होंने आदिवासियों को आर्थिक और सामाजिक गुलामी से बाहर निकालने का प्रयास किया और एक ऐसी ग्रामीण-आधारित अर्थव्यवस्था का मॉडल समझाया जो लोगों को आत्मनिर्भर बना सके।

    नशा बंद हो
    शिबू सोरेन ने 1969-70 में नशाबंदी, साहूकारी और जमीन बेदखली के खिलाफ जनांदोलन शुरू किया, जिसने उन्हें आदिवासी समाज का नायक बना दिया। 70 से 80 के दशक में धनकटनी आंदोलन बहुत बड़ा हो गया। उन्होंने झारखंड के किसानों, कामगारों और काश्तकारों को एकजुट किया और आदिवासियों को शोषण से मुक्त करवाने में अहम भूमिका निभायी। यही वजह है कि शिबू सोरेन को झारखंड के लोगों ने दिशोम गुरु की उपाधि दी। दिशोम का मतलब देश को दिशा देने वाला होता है और यहां देश का मतलब आदिवासी क्षेत्र से है।

    रात्रि पाठशाला चलायी
    1970 से 1975 के बीच शिबू सोरेन रात्रि पाठशाला चलाते थे, ताकि दिन भर अपना काम निपटाने के बाद आदिवासी लोग पढ़ पायें। शिबू सोरेन का मानना था कि शादी और त्योहारों पर खर्च कम करना चाहिए और पैसा बचाकर उसे शिक्षा पर लगाना चाहिए। उन्होंने आदिवासियों के उत्थान के लिए सामूहिक खेती, पशुपालन, रात्रि पाठशाला पर जोर दिया। शिबू सोरेन को पता था कि उनका समाज शिक्षा की रौशनी से ही आगे बढ़ सकता है। उनका समाज पढ़ेगा, तभी अन्याय के खिलाफ लड़ेगा। उन्होंने गरीब छात्रों को लालटेन तक बांटे, ताकि वे रात में पढ़ सकें। जीवन का बड़ा हिस्सा उन्होंने जंगलों, पहाड़ों और गांवों में लोगों को एकजुट करने में बिताया। आदिवासी समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए सामाजिक आंदोलन को धार दी।

    पोखरिया आश्रम की खामोशी आज भी बुलाती है
    पहाड़ पर गुमसुम बैठे
    पहाड़ी आदमी के चेहरे पर दिख रहा है
    पहाड़ का भूगोल
    उसके भीतर चुप्पी साधे बैठा है
    पहाड़ का इतिहास
    अगर कभी आपका चंदू या कभी टुंडी जाना हुआ, तो निर्मला पुतुल की ये पंक्तियां जरूर आपके साथ हो लेंगी। आप जब टुंडी जायेंगे, तो हो सकता है कि राजमहल की पहाड़ियों पर बैठा आदिवासी आपको इस कविता का नायक लगने लगे, क्योंकि यही वह जमीन है, जहां से झारखंड मुक्ति मोर्चा की शुरूआत हुई और शिबू सोरेन जन नायक के रूप में उभरे। इतना ही नहीं, इसी मिट्टी ने उन्हें दिशोम गुरु बनाया। 1972 के पहले यह पूरा क्षेत्र महाजनों के चंगुल में कराह रहा था। आदिवासियों और खेतिहर कुर्मियों-कोयरियों की हालत खराब थी। भूख और रोग की फसल पूरे क्षेत्र में लहलहा रही थी। इन परिस्थितियों के बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ था। दिशोम गुरु पार्टी के महासचिव बनाये गये थे।

    झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना
    गोला, पेटरवार, जैनामोड़, बोकारो में आंदोलन को मजबूत करने के बाद विनोद बिहारी महतो से मुलाकात हुई। फिर धनबाद गये। वहां कुछ दिनों तक विनोद बाबू के घर पर ही रहे थे। साल 1973 में सोरेन ने गोल्फ ग्राउंड, धनबाद में एक जनसभा के दौरान बंगाली मार्क्सवादी ट्रेड यूनियनिस्ट एके रॉय और कुर्मी-महतो नेता बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। यह संगठन आदिवासियों की लड़ाई का प्रतीक बना। संघर्ष करते हुए बात भारत में एक नये राज्य की मांग तक पहुंच गयी। राह आसान नहीं थी। अविभाजित बिहार में दक्षिण के क्षेत्र में 26 जिलों को मिलाकर एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में शिबू सोरेन ने झारखंड राज्य की कल्पना की थी। 80 के दशक में शिबू सोरेन की रैलियों में जनसैलाब उमड़ता था। उन्हें सुनने के लिए लोग 50-60 किलोमीटर दूर पैदल चल कर आते थे।

    पहला सार्वजनिक भाषण
    झामुमो के स्थापना के मौके पर अपने संबोधन में गुरुजी ने कहा था, मुझे झारखंड मुक्ति मोर्चा का महासचिव बनाया गया है। पता नहीं मैं इस योग्य हूं भी या नहीं। लेकिन मैं अपने मृत पिता की सौगंध खाकर कहता हूं कि शोषणमुक्त झारखंड के लिए अनवरत संघर्ष करता रहूंगा। हम लोग दुनिया के सताये हुए लोग हैं। अपने अस्तित्व के लिए हमें लगातार संघर्ष करते रहना पड़ा है। हमें बार-बार अपने घरों से, जंगल से और जमीन से उजाड़ा जाता है। हमारे साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया जाता है। हमारी बहू-बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ किया जाता है। दिकुओं के शोषण, उत्पीड़न से परेशान होकर हमारे लोगों को घर-बार छोड़कर परदेस में मजूरी करने जाना पड़ता है। हरियाणा-पंजाब के ईंट के भट्ठों में, असम के चाय के बागानों में, पश्चिम बंगाल के खलिहानों में मांझी, संथाली औरतें, मरद मजूरी करने जाते हैं। वहां भी उनके साथ बंधुआ मजदूरों जैसा व्यवहार किया जाता है। यह बात नहीं कि हमारे घर, गांव में जीवन यापन करने के साधन नहीं, लेकिन उन पर बाहर वालों का कब्जा है। झारखंड की धरती का, यहां की खदानों का दोहन कर, उनकी लूट-खसोट कर नये शहर बन रहे हैं। जगमग आवासीय कॉलोनियां बन रही हैं और हम सब गरीबी-भुखमरी के अंधकार में धंसे हुए हैं। लेकिन अब यह सब नहीं चलेगा। हम इस अंधेरगर्दी के खिलाफ संघर्ष करेंगे।

    पहली बार संसद में गूंजी आदिवासियों की आवाज
    शिबू सोरेन जब जेएमएम के पहले सांसद बने, तो आदिवासियों की आवाज संसद तक सुनाई देने लगी। पहली बार सांसद बनने के बाद जब उन्होंने संसद में भाषण दिया, तो वह शराब के खिलाफ बोले। शिबू सोरेन का मानना था कि आदिवासियों का विकास तब तक नहीं होगा, जब तक वे इससे दूर नहीं होंगे।

    शायद ही ऐसा कोई नेता हो, जिनके भाषण को सुनने लोग दो-तीन बजे रात तक इकट्ठा रहते हों
    1980 के जून महीने में हुए बिहार विधानसभा के चुनाव में खास कर संथाल परगना की 18 सीटों में से आठ सीटों पर झामुमो ने जीत का परचम लहराया था। इस जीत ने क्षेत्र की जनता के करीब चार दशक से शिथिल पड़े झारखंड अलग राज्य की मांग पर मुहर लगा दी। इसी समय झारखंड के गांधी कहे जाने वाले शिबू सोरेन के नेतृत्व में अलग झारखंड राज्य के आंदोलन ने जोर पकड़ लिया। कंपकंपाती ठंडी रात में भी भारी तादाद में इस क्षेत्र के लोग शिबू सोरेन की एक झलक पाने और उनके भाषण को सुनने के लिए रात भर सभा स्थल पर जमे रहते थे। देश में शायद ही ऐसा कोई नेता हो, जिनके भाषण को सुनने के लिए लोग दो-तीन बजे रात तक इकट्ठा रहते हों। उनकी राजनीति में प्रविष्टि किसी पारंपरिक राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित नहीं थीं, बल्कि एक व्यक्तिगत अन्याय के खिलाफ उपजे आक्रोश और अपने समुदाय के लिए न्याय की गहन प्रतिबद्धता का परिणाम थी। यह कारक उन्हें उन नेताओं की श्रेणी में रखता, जिनका उदय व्यक्तिगत बलिदान और सार्वजनिक सेवा के एक गहरे नैतिक भाव से हुआ था। इस प्रकार उनका संघर्ष केवल सत्ता प्राप्ति का नहीं था, बल्कि अपने समाज के उत्थान और उसके लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का था।

    भूमिगत भी रहे
    1970 के दशक में शिबू सोरेन ने कई रातें गिरिडीह, पारसनाथ और धनबाद के जंगल और पहाड़ों में गुजारी। यह वह दौर था, जब एक ओर आंदोलन से परेशान महाजन और शराब कारोबारी, शिबू सोरेन के खिलाफ किसी भी हद को पार कर सकते थे। वहीं विभिन्न आंदोलनों के कारण भी पुलिस को उनकी तलाश में रहती। जंगल और पहाड़ों में समय गुजराने वाले शिबू सोरेन हर रात तीन बार जगह बदलते थे। वे इतने घने और गुप्त स्थानों पर रहते थे, जहां उस वक्त पुलिस को भी जाने में भी डर लगता था। पुलिस से बचने के लिए शिबू सोरेन ने पारसनाथ की पहाड़ियों के बीच पलमा गांव को अपना केंद्र बनाया। फिर टुंडी के पास पोखरिया में आश्रम बनाया। उन्होंने टुंडी के आसपास महाजनों के कब्जे से संतालों की जमीन को मुक्त कराया। सामाजिक और आर्थिक सुधार के साथ-साथ, शिबू सोरेन ने आदिवासियों के बीच त्वरित न्याय की अदालतें स्थापित कीं। ये अदालतें शोषित आदिवासियों को जमींदारों और सूदखोरों के खिलाफ त्वरित न्याय प्रदान करती थीं, जो उस समय की कानूनी प्रक्रिया में संभव नहीं था। टुंडी और उसके आसपास शिबू सोरेन की समानांतर सरकार चलती। उनकी अपनी न्याय व्यवस्था थी, कोर्ट लगाते थे और फैसला भी सुनाया जाता।

    आपातकाल में जेल
    1975 में आपातकाल के दौरान शिबू सोरेन को समर्पण के लिए तैयार किया गया। उन्हें धनबाद जेल में रखा गया था। झगड़ू पंडित उनके साथ थे। वह डीसी-एसपी से बहस कर जबरन जेल गये थे, पुलिस उन्हें जेल ले जाने को तैयार नहीं थी। पिपरासोल निवासी झगड़ू पंडित ने ही शिबू सोरेन की राजनीतिक जमीन संथाल में तैयार की थी। दोनों साथ ही काम करते थे और शिबू को अपने घर पर ही रखते थे। किसानों के हक और सूदखोरों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। गुरुजी का कद जब धीरे-धीरे बढ़ने लगा, तो सबसे ज्यादा खुशी झगड़ू पंडित को ही हुई थी। बोकारो की एक सभा में गुरुजी से पहली बार भेंट हुई, तभी निमंत्रण देकर पंडित ने कहा था कि गुरुजी संथाल आइए, संथाल को आपके नेतृत्व का इंतजार है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्र ने शिबू सोरेन की रिहाई का रास्ता साफ किया था।

    झारखंड अलग राज्य आंदोलन को धार
    झारखंड राज्य आंदोलन के सशक्त नेता के रूप में शिबू सोरेन ने दशकों तक इस लड़ाई का नेतृत्व किया। इस आंदोलन के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का एक बड़ा प्रमाण वह था, जब उन्होंने अलग राज्य के विरोध के कारण लालू प्रसाद यादव के साथ अपने राजनीतिक संबंध तोड़ लिये। यह निर्णय उनके लिए राजनीतिक रूप से जोखिम भरा था, लेकिन उन्होंने आदिवासियों की आकांक्षाओं को सर्वोपरि रखा। अलग राज्य के गठन से पहले झारखंड क्षेत्रीय स्वायत्त परिषद (जैक) का गठन एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी, जिसके लिए शिबू सोरेन ने अथक प्रयास किया। यह परिषद झारखंड के लोगों को उनकी प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकार और भागीदारी देने वाली पहली संस्था थी। यह परिषद सीधे तौर पर राज्य गठन के मार्ग को प्रशस्त करने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी थी। झारखंड राज्य का गठन सिर्फ एक भौगोलिक विभाजन नहीं था, बल्कि यह दशकों से चल रहे आदिवासी पहचान, संस्कृति और स्वायत्तता के संघर्ष की परिणति थी।

    शिबू सोरेन किसी पद के मोहताज नहीं थे, वह खुद में सुशोभित थे
    शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर लंबा और उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने अपने जीवनकाल में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत जनता के बीच उनकी लोकप्रियता और स्वीकृति रही। उनके राजनीतिक करियर की एक दिलचस्प विशेषता यह है कि वे तीन बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनका कोई भी कार्यकाल पूरा नहीं हो सका। कुछ लोग इसे उनकी राजनीतिक अस्थिरता के रूप में देख सकते हैं, लेकिन यह उनके जन-नेता के रूप में उनकी छवि को और मजबूत करता है। यह दर्शाता है कि उनकी असली ताकत राजनीतिक पद में नहीं, बल्कि जनता के बीच थी, जिसने उन्हें बार-बार संसद तक पहुंचाया। वे एक पारंपरिक राजनेता से अधिक एक आंदोलनकारी और प्रतीक थे, जिनकी उपस्थिति ही झारखंड की राजनीति को आकार देने के लिए पर्याप्त थी। उनके छोटे-छोटे कार्यकाल भी झारखंड की राजनीतिक चेतना और उसके भविष्य को आकार देने में निर्णायक थे।

    शिबू सोरेन का संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक था
    एक जननायक के रूप में शिबू सोरेन का जीवन भी विवादों से घिरा रहा। उनके जीवन के दो प्रमुख न्यायिक मामले चिरुडीह नरसंहार और निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या से संबंधित थे। इन मामलों के अलावा, 1993 में नरसिंह राव सरकार को बचाने के लिए कथित कैश फॉर वोट मामले में भी उनका नाम आया। लेकिन इन सभी प्रमुख मामलों में उन्हें न्यायिक प्रक्रिया द्वारा बरी कर दिया गया। एक हिंसक और कठिन आंदोलन का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति पर ऐसे आरोप लगना स्वाभाविक है। भारत की न्यायपालिका द्वारा उन्हें दोषमुक्त किया जाना उनकी शुचिता को स्थापित करता है। शिबू सोरेन का संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक था। उन्होंने एक पूरी सभ्यता और पहचान को शोषण से बचाने और उसे राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने का काम किया। यह एक ऐसा योगदान है, जो भारत के संघीय ढांचे को अधिक समावेशी बनाता है और हाशिये पर पड़े समुदायों को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में लाने का मार्ग प्रशस्त करता है। शिबू सोरेन भारत रत्न के हकदार हैं। यही झारखंड की भी मांग है। आज गुरुजी हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनकी सोच, उनके विचार झारखंड की हवाओं में तैर रहे हैं।

     

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