लखीसराय। बिहार के लखीसराय स्थित अशोकधाम मंदिर में सावन के तीसरे सोमवार को हुई भगदड़ ने एक बार फिर मंदिर की भीड़ व्यवस्था और सुरक्षा इंतजामों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस हादसे में अब तक सात श्रद्धालुओं की मौत की सूचना है, जबकि कई लोग घायल हुए हैं। अशोकधाम केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि अपने प्राचीन इतिहास और विशाल शिवलिंग के कारण भी खास पहचान रखता है।
इंद्रदमेश्वर महादेव के नाम से भी प्रसिद्ध है मंदिर
अशोकधाम मंदिर को इंद्रदमेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां स्थापित विशाल शिवलिंग श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है। सावन के महीने में मंदिर में जलाभिषेक करने के लिए बिहार के अलावा दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
गिल्ली-डंडा खेलते समय सामने आया था शिवलिंग
बिहार पर्यटन और लखीसराय जिला प्रशासन से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 7 अप्रैल 1977 को अशोक नाम का एक युवक गिल्ली-डंडा खेल रहा था। इसी दौरान जमीन के अंदर उसे विशाल शिवलिंग दिखाई दिया। शिवलिंग को बाहर निकालने का प्रयास किया गया, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिला। इसके बाद इसी स्थान पर मंदिर के विकास की शुरुआत हुई और आगे चलकर यह स्थान अशोकधाम के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
पाल वंश से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, अशोकधाम क्षेत्र करीब 8वीं शताब्दी से शिव उपासना का केंद्र रहा है। कहा जाता है कि पाल वंश के शासक नारायण पाल के समय यहां शिव पूजा की परंपरा शुरू हुई। इसके बाद 12वीं शताब्दी में राजा इंद्रद्युम्न द्वारा मंदिर निर्माण कराए जाने की मान्यता है। हालांकि, इन प्राचीन दावों की स्वतंत्र पुरातात्विक पुष्टि सीमित है।
1993 में हुआ मंदिर के पुनर्निर्माण का उद्घाटन
समय के साथ मंदिर परिसर का आधुनिकीकरण और पुनर्निर्माण भी किया गया। 11 फरवरी 1993 को जगन्नाथपुरी के शंकराचार्य ने मंदिर परिसर के पुनर्निर्माण कार्य का उद्घाटन किया था। सावन और महाशिवरात्रि के दौरान यहां विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। जलाभिषेक के अलावा मंदिर परिसर में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और मुंडन संस्कार भी कराए जाते हैं।
जलाभिषेक से मनोकामना पूरी होने की मान्यता
श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि अशोकधाम में भगवान शिव का जलाभिषेक करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि सावन में यहां भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। सोमवार के दिन विशेष रूप से बड़ी भीड़ उमड़ती है।
सावन में क्यों बढ़ जाता है भीड़ का दबाव?
अशोकधाम में भीड़ का दबाव अचानक बढ़ना कोई नई समस्या नहीं है। सावन के सोमवार और महाशिवरात्रि जैसे पर्वों पर आसपास के जिलों के साथ-साथ दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। सीमित समय में बड़ी संख्या में लोगों के मंदिर पहुंचने से भीड़ को नियंत्रित करना प्रशासन के लिए चुनौती बन जाता है। ऐसे में बैरिकेडिंग, प्रवेश-निकास व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन में थोड़ी सी चूक भी गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है।
2019 में भी हुई थी भगदड़
अशोकधाम मंदिर में इससे पहले भी भगदड़ की घटना हो चुकी है। 12 अगस्त 2019 को सावन के आखिरी सोमवार के दौरान मंदिर में भगदड़ मच गई थी। उस हादसे में एक श्रद्धालु की मौत हुई थी, जबकि कम से कम आठ लोग घायल हुए थे। उस समय भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ और बैरिकेडिंग टूटने को हादसे की प्रमुख वजह बताया गया था।
भीड़ प्रबंधन पर उठ रहे सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि सावन की सोमवारी पर अशोकधाम में भारी भीड़ जुटने की जानकारी प्रशासन को पहले से रहती है। ऐसे में यदि समय रहते प्रवेश, निकास, बैरिकेडिंग और सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया जाए तो हादसों की आशंका को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
स्थानीय निवासी संजीव सिंह के मुताबिक, अशोकधाम के शिवलिंग के प्रति लोगों में गहरी आस्था है। सावन में श्रद्धालु पूरी श्रद्धा के साथ जलाभिषेक करने पहुंचते हैं और समय के साथ इस आस्था के कारण भक्तों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में मंदिर की बढ़ती लोकप्रियता के साथ भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को भी उसी अनुपात में मजबूत करना जरूरी है।
