राजनीतिक सीन में हलचल, दोनों पक्ष सोचने पर हो गये मजबूर

जदयू के राष्टÑीय अध्यक्ष और ‘सुशासन बाबू’ के नाम से प्रसिद्ध नीतीश कुमार अपने एकदिवसीय दौरे पर झारखंड की राजधानी आये। यहां उन्होंने साफ कर दिया कि झारखंड विधानसभा चुनाव में वह कम से कम एनडीए के खेमे में नहीं रहेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी साफ नहीं किया कि वह विपक्ष के महागठबंधन में शामिल होंगे या फिर अकेले दम पर चुनाव लड़ेंगे। शुरुआत में नीतीश की इस यात्रा को झारखंड के राजनीतिक हलकों में कोई महत्व नहीं दिया जा रहा था, लेकिन अब कहा जा रहा है कि इस यात्रा ने झारखंड और बिहार के साथ हिंदी पट्टी के प्रदेशों में नये राजनीतिक समीकरणों की जमीन तैयार कर दी है।
झारखंड में जदयू की हैसियत
राजनीतिक तौर पर देखा जाये, तो नीतीश की पार्टी जदयू का झारखंड में कोई मजबूत आधार नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि उनकी पार्टी राज्य की कम से कम दर्जन भर सीटों का चुनाव परिणाम प्रभावित करने की हैसियत रखती है। जहां तक पिछले विधानसभा चुनाव की बात है, जदयू ने कुल 11 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और उसे कुल एक लाख 33 हजार 815 वोट मिले थे। यह उन सीटों पर डाले गये वोटों का 6.62 प्रतिशत था। जदयू ने राजमहल, जरमुंडी, बरकट्ठा, मांडू, गिरिडीह, डुमरी, बोकारो, सिंदरी, बाघमारा, छतरपुर और हुसैनाबाद से उम्मीदवार उतारा था। इनमें से आधा दर्जन सीटों पर जदयू को मिले वोट जीत के अंतर से अधिक थे। यानी यदि जदयू का वोट दूसरे नंबर पर रहे प्रत्याशी को मिल जाता, तो परिणाम उलट सकता था।
इस स्थिति में जदयू को पूरी तरह नजरअंदाज करना इस बार कम से कम भाजपा को भारी पड़ सकता है, क्योंकि वह 65 प्लस के लक्ष्य को लेकर चुनाव मैदान में उतर रही है।
क्या होगा नया समीकरण
नीतीश कुमार ने कह दिया है कि वह एनडीए के साथ मिल कर झारखंड में चुनाव नहीं लड़ेंगे। इसका सीधा-सीधा मतलब होता है कि भाजपा से उनका रिश्ता अब लगभग टूटने की कगार पर पहुंच गया है। ऐसे में झारखंड में यदि जदयू विपक्षी महागठबंधन में शामिल हो जाता है, तो इसका सीधा असर एनडीए पर ही पड़ेगा। अब तक जदयू को एनडीए का वोट मिलता रहा है और नीतीश कुमार अपने वोटों को सहेज कर रखने के लिए जाने जाते हैं। नीतीश की राजनीतिक शैली ऐसी है कि वह अपनी भावी रणनीति की भनक भी किसी को नहीं लगने देते। लोकसभा चुनाव के बाद उनके कम से कम तीन फैसलों ने सभी को चौंकाया है। उनका पहला फैसला मोदी कैबिनेट में शामिल नहीं होने का था। साथ मिल कर चुनाव लड़ने और बिहार में ऐतिहासिक सफलता हासिल करने के बावजूद नीतीश ने मोदी कैबिनेट में शामिल नहीं होने के साथ ही अपनी कैबिनेट का विस्तार किया और उसमें भाजपा को शामिल नहीं किया। इसके बाद तीन तलाक और धारा 370 के मुद्दे पर भी उन्होंने भाजपा का साथ नहीं दिया। इससे पता चलता है कि नीतीश अपनी शर्तों पर राजनीति करते हैं और उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे लोग उनके बारे में क्या कहते हैं।
यदि नीतीश झारखंड में विपक्षी महागठबंधन से हाथ मिला लेते हैं, तो एक तरफ जहां विपक्षी दलों को थोड़ी अतिरिक्त ताकत मिलेगी, वहीं भाजपा की परेशानी बढ़ जायेगी।
बिहार में क्या होगा
यह तो हुई झारखंड की बात। बिहार में, जहां नीतीश कुमार सत्ता शीर्ष पर बैठे हैं, भाजपा की राह और भी कठिन हो जायेगी।
हो सकता है कि वहां नीतीश कुमार से खार खाये बैठे राजद नेता तेजस्वी यादव भी जोड़-तोड़ में लग जायें। हाल के दिनों में भाजपा के प्रति उनका सॉफ्ट कॉर्नर यह संकेत तो करता ही है। भाजपा के साथ वह स्थिति खतरनाक होगी, क्योंकि यदि वह राजद के साथ पींगे बढ़ाती है, तो बिहार समेत पूरे देश में गलत संदेश जायेगा। उधर बंगाल में नीतीश ने अपने विश्वस्त प्रशांत किशोर को ममता बनर्जी के करीब जाने की अनुमति देकर वहां भी भाजपा की राह में बाधाएं खड़ी करने में काफी हद तक सफल होते दिख रहे हैं।
झारखंड में क्या है तैयारी
जदयू ने झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए जोर-शोर से तैयारी शुरू की है। यदि वह किसी से तालमेल कर मैदान में उतरती है, तो उसकी संभावनाएं बढ़ जायेंगी। नीतीश भी यह बखूबी जानते हैं। इसलिए उन्होंने अपने विकल्प खुल रखे हैं। संसाधनों के मामले में भी जदयू ने झारखंड में पूरी ताकत झोंक रखी है। इसलिए उसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता है।
अब जदयू झारखंड के चुनावी मैदान में क्या गुल खिलाता है और नीतीश की रणनीति कितनी सफल होती है, यह तो आनेवाला समय ही बतायेगा, लेकिन फिलहाल नीतीश कुमार की रांची यात्रा ने झारखंड के राजनीतिक परिदृश्य में एक हलचल जरूर पैदा कर दी है। इस हलचल ने यहां के सभी राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर भी कर दिया है।

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