प्रभु जोशी: यह साहित्य के आगत का बहुत दरिद्र-दृश्य है कि एक कमजोर बौद्धिक आधार वाले भारतीय समाज में, उसकी समझ की चकरी कभी भी और किसी भी दिशा में घूमती रह सकती है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि उसकी डोर अब सोशल मीडिया के हाथ में है, जो पल-प्रतिपल करवटें बदलता रहता है। जैसे ही अमेरिकी पॉपुलर गायक बॉब डायलन को साहित्य का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई, हमारे यहां लगे हाथ देसी बॉब डायलन ढूंढ़े जाने लगे। यहां तक कि कुछेक की तो कब्रें खोदकर उन्हें माला पहनाने की तैयारी होने लगी तो मंच के कुछ जीवित-महानों को, सोशल मीडिया के घोड़े की पीठ पर बैठाकर अश्वमेघ की ध्वजा पकड़ाकर संसार भर में चक्कर काटने भेज दिया गया। तीसरे-चौथे दर्जे के तुक्कड़ गलेबाजों ने तो स्वयं ही कंठहार अपने गले में डाल लिया। यह सच है कि बॉब डायलन विकसित राष्ट्र व समाज के एक बहुत लोकप्रिय गायक एवं गीत लेखक हैं।

बेशक उन्होंने खासकर साठ के दशक में वामपंथी रुझान के व युद्धविरोधी गीत लिखे और गाए हैं, तथा वे अधिकतम लोगों तक अपनी अधिकतम संप्रेषणीयता भी रखते हैं, लेकिन इसे क्या टेंडिशियस-राइटिंग से ऊपर का दर्जा दिया जा सकता है? कहना ना होगा कि बॉब डायलन तो स्वयं को गायक व डांसमैन कहते रहे हैं। उन्हें अपनी पॉपुलर गायन-विधा के लिए 1991 ग्रैमी अवार्ड दिया जा चुका है। वे आॅस्कर भी प्राप्त कर चुके हैं तथा रॉक एंड रोल हाल आॅफ फेम में वे 1988 में ही शामिल कर दिये गये थे। लेकिन वह अपने समूचे गाये और लिखे हुए से केवल पॉपुलर में पूजनीय हो सकते हैं, साहित्य में नहीं। उन्हें साहित्य का नोबेल दिया जाना ऐसी घटना है, जिससे कई सवाल उठते हैं। बहरहाल, हमें नहीं भूलना चाहिए कि बॉब डायलन प्रथमत: तो गायक हैं और उनकी इस मेधा ने ही उन्हें गीत लेखक भी बनाया। इसलिए उन्हें साहित्य के सम्मान के दायरे में शामिल करने में कुछ अहम बातों पर विचार करना जरूरी होगा।

मसलन, ये स्पष्ट है कि अब संगीत तकनीक के प्रवेश के बाद मात्र संयोजन में बदल गया है और उसने सृजन का वह सम्मान खो दिया है। वह बुनियादी रूप से टेलीविजन माध्यम के बढ़ते वर्चस्व के बाद एक देखी और सुनी जा सकने वाली विधा है, जो व्यवसाय के शिखर की सीढ़ियां चढ़ती हुई पॉपुलर की प्रतिमा की गढ़ंत अर्जित कर लेती है। एंड्रयू रस ने अपनी पुस्तक नो रिस्पेक्ट में पॉपुलर के समक्ष, जेन्युइन की अवमानना के जख्मों पर उंगली रखकर चेताया था कि हम एक नयी रुग्णता के निकट हैं और हमारे उत्कृष्ट साहित्यिक मूल्य ‘मास कल्ट और मिड-कल्ट के बीच मार दिए जाएंगे। साहित्य एक दिन घुटकर अपना दम तोड़ देगा।
दुनिया का इकलौता यही पुरस्कार है, जो साहित्य के लिए सम्मानजनक सार्वदेशीय स्वीकृति बनाने वाला रहा है, किंतु वह इस घटना के बाद से ‘पॉपुलर कल्चर की करंसी” में बदल गया है। यह मनोरंजनमुखी दृष्टि के समक्ष साहित्य की सबसे लज्जास्पद पराजय है। क्या नोबेल के निर्णायकों के समक्ष संसारभर की साहित्यिक बिरादरी में एक भी ऐसा वास्तविक लेखक-कवि नहीं था, जो वे एक पॉपुलर की विधा के व्यक्ति को चुनने हेतु विवश हो गए? क्या समिति को अपनी दृष्टि ‘तीसरी दुनिया” के लेखकों की तरफ नहीं डालनी चाहिए थी, जिनका प्रतिनिधित्व नोबेल-पुरस्कार के लिए हमेशा न्यूनतम ही रहा है? नोबेल समिति को सोचना चाहिए था कि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित बॉब को साहित्य के नोबेल सम्मान की जरूरत नहीं है। लेकिन ‘साहित्य” को नोबेल की बहुत जरूरत है, क्योंकि वह धीरे-धीरे हाशिए पर धकेला जा रहा है और उसने इस वर्ष से तो इस पर से अपने दावे को खोने की शुरूआत कर ही दी है। हिंदी में एक कहावत है – बुढ़िया मर गई, कोई बात नहीं, लेकिन मौत ने घर देख लिया है।

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