झारखंड विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, भाजपा अपनी सटीक और सुनियोजित रणनीति के तहत अपने चुनावी कार्यक्रमों को समयबद्ध तरीके से अंजाम दे रही है। पर विपक्षी दल चुनाव को लेकर बहुत तैयार नहीं लग रहे। होना तो यह चाहिए था कि विपक्षी दल सीटों का बंटवारा कर चुनावी तैयारियों में जुटते और भाजपा से मुकाबले के लिए खुद को झोंकते पर ऐसा कुछ भी होता दिख नहीं रहा। राज्य की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के कारण झामुमो भाजपा के बयानों का काउंटर करने में ही परेशान है। वहीं महागठबंधन में शामिल हर दल चुनाव में अपने लिए अधिक से अधिक सीटें चाहता है। ऐसे में प्रेशर पॉलिटिक्स करना झामुमो के लिए भी राजनीतिक मजबूरी बन गयी है। चुनाव को लेकर विपक्ष के खटराग और इससे भाजपा को होनेवाले फायदे के राजनीतिक समीकरणों की पड़ताल करती दयानंद राय की रिपोर्ट।
ईश्वर की वंदना में पंडित हरिओम शरण ने एक भजन गाया है, जिसके बोल हैं, दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया। कुछ-कुछ इसी गाने की तर्ज पर शनिवार को झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता में झारखंड में ‘दाता एक झामुमो और भिखारी सारे साथी’ जैसा बताकर किया। उनके अल्फाज अलग थे पर निहितार्थ कमोबेश यही था। शाम चार बजे आयोजित प्रेसवार्ता में उन्होंने कहा कि झामुमो झारखंड की 81 सीटों पर लड़ने में सक्षम है और जो सीटें वह स्वेच्छा से गठबंधन में शामिल रहने के कारण छोड़ देगा, वह साथी दलों पर उसका एहसान है। त्याग है। शहादत है। सुप्रियो यहीं नहीं रुके। उन्होंने साफ कहा कि पार्टी 81 सीटों पर तैयारी कर रही है। बीते लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस एक सीट इसलिए जीत सकी, क्योंकि हम वहां थे। उन्होंने यह भी कहा कि महागठबंधन में शामिल सभी दलों को त्याग के लिए तैयार रहना होगा। यहां यह बताना समीचीन रहेगा कि झामुमो की प्रेसवार्ता की मुख्य ब्रीफिंग का यह वक्तव्य हिस्सा नहीं था। प्रेसवार्ता में उपस्थित पत्रकारों के सवालों के जवाब में ये बातें सुप्रियो ने कहीं और पार्टी का महासचिव और केंद्रीय प्रवक्ता होने का अपना फर्ज निभा दिया। प्रेसवार्ता में उन्हें एक तीर से सिर्फ एक ही शिकार करना था पर एक मैच्योर राजनेता होने का परिचय देते हुए जब उन पर पत्रकारों ने सवालों के तीर छोड़े तो हर सवाल का बेहतर जवाब सुप्रियो ने दिया और एक तीर से दो शिकार करते हुए महागठबंधन में सीटों को लेकर पार्टी का रुख साफ कर दिया।
एक तीर से दो निशाने साधे
प्रेसवार्ता में सुप्रियो भट्टाचार्य ने एक तीर से दो निशाने साधे। पहला तो सीएम रघुवर दास के उस बयान को काउंटर किया जिसमें उन्होंने कहा था कि झामुमो ने दारू पिला-पिला कर आदिवासी महिलाओं को विधवा बनाने का काम किया। सुप्रियो ने कहा कि मुख्यमंत्री को यह याद रखना चाहिए कि झारखंड अलग राज्य के लिए जो आंदोलन हुआ था उसमें शराबखोरी और नशाखोरी के खिलाफ हुए आंदोलन का नेतृत्व गुरुजी ने किया था। टुंडी से यह आंदोलन शुरू हुआ था और समाज से इस कुरीति को दूर करने के लिए झामुमो ने काम किया। उन्होंने राज्य सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सरकारी की ओर से नकली दारु बेचा गया और उससे जैप के जवान की मौत हो गयी थी। उन्होंने सीएम को खुली चुनौती देते हुए कहा कि रघुवर दास या तो एक ऐसे परिवार को पेश करें जिसकी मौत झामुमो द्वारा दारू पिलाने से हुई हो या फिर माफी मांगें। यह पूरा वक्तव्य झामुमो के तीर से हुआ पहला शिकार था और सुप्रियो इसी की तैयारी करके प्रेसवार्ता में पत्रकारों के समक्ष बैठे थे पर वे यह भी जानते थे कि चुनाव नजदीक होने के कारण उनसे महागठबंधन, महाबदलाव रैली, कितनी सीटों पर झामुमो चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है ऐसे सवाल पूछे जा सकते हैं और इसकी भी तैयारी वे करके आये थे। जैसे ही उनसे इनमें से एक सवाल पूछा गया उन्होंने साफ कर दिया कि महागठबंधन में झामुमो बड़े भाई की भूमिका में है और उसकी तैयारी सभी सीटों पर है पर कुछ सीटें वह छोड़ देगा। यह झामुमो का एक तीर से दूसरा शिकार था।
डिफेंसिव मोड में आ गया है झामुमो
विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी सत्तारूढ़ भाजपा झारखंड में 65 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है। पार्टी यह अच्छी तरह से जानती है कि उसके इस लक्ष्य में झारखंड में कोई पार्टी बाधक बन सकती है तो वह निश्चत रूप से झामुमो है। इसलिए भाजपा ने अपनी चुनाव की रणनीति को इस तरह से डिजाइन किया है जिससे झामुमो को डिफेंसिव मोड में रखा जा सके। पार्टी की इसी रणनीति के तहत भाजपा के प्रवक्ता हों या मुख्यमंत्री रघुवर दास सब आॅफेंसिव मोड में झामुमो पर हमलावर हो रहे हैं और झामुमो को डिफेंसिव मोड में आकर उसका जवाब देना पड़ रहा है। इससे पार्टी चुनावी रणनीति में बढ़त बनाने में सफल हो रही है। झामुमो की दूसरी परेशानी यह है कि महागठबंधन में शामिल सभी दल सीटों को लेकर प्रेशर पॉलिटिक्स कर रहे हैं। कांग्रेस जहां 25 सीटों की मांग कर रही है वहीं झाविमो 81 सीटों पर खुद को चुनाव लड़ने के लिए तैयार बता रहा है। वाम दल 19 सीटों पर दावा कर रहे हैं। राजद की अपनी अलग दावेदारी है। झामुमो असल में राज्य में 40 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहता है। बीते विधानसभा चुनाव में उसने 21 सीटों पर अपना कब्जा जमाया था और उससे पहले के चुनाव में पार्टी को 20 सीटें मिली थीं। इसलिए पार्टी के महासचिव सुप्रियो भी 80 सीटों पर दावेदारी कर रहे हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि झारखंड में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी तो झामुमो ही है। झामुमो के लिए राहत की बात यह है कि कांग्रेस ने उसका नेतृत्व स्वीकार कर लिया है। हालांकि होटल रैडिशन ब्लू में आयोजित पूर्वोदय कार्यक्रम से पहले कांग्रेस यह मानने को भी तैयार नहीं थी पर बाद में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने हेमंत को महागठबंधन का नेता स्वीकार कर लिया। उनके पास ऐसा करने के अलावा और कोई चारा नहीं था क्योंकि लोकसभा चुनावों के दौरान जो महागठबंधन बना था उसमें झामुमो और कांग्रेस के बीच लिखित समझौता हुआ था। इस समझौते में यह स्पष्ट था कि लोकसभा में कांग्रेस और विधानसभा में झामुमो महागठबंधन का नेतृत्व करेगा। अब जब विधानसभा चुनाव में बहुत कम वक्त बचा रह गया है तब महागठबंधन में शामिल सभी दलों में सीटों को लेकर जो खटराग चल रहा है उससे सत्तारूढ़ भाजपा को ही फायदा होगा। भाजपा तो असल में यह चाहती है कि झारखंड में महागठबंधन आकार ही नहीं ले पाये और बिखरे विपक्ष का फायदा उठाकर वह अधिक से अधिक सीटें जीत सके। संयोग से यही स्थिति महागठबंधन को लेकर झारखंड में बन रही है और महागठबंधन में शामिल दलों में सीटों को लेकर एका नहीं बन पा रही है। यह भाजपा के लिए शुभ संकेत है। यदि विपक्षी दल समय रहते नहीं चेते और महागठबंधन किसी कारणवश झारखंड में आकार नहीं ले सका तो भाजपा के लिए यह स्थिति बिल्ली के भाग्य से छींका फूटने जैसी होगी। यानि भाजपा के दोनों हाथों में लड्डू होंगे और सिर कड़ाही में होगा।