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    Home»विशेष»भाजपा के लिए खतरे की घंटी है हरियाणा का एग्जिट पोल
    विशेष

    भाजपा के लिए खतरे की घंटी है हरियाणा का एग्जिट पोल

    shivam kumarBy shivam kumarOctober 7, 2024No Comments9 Mins Read
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    विशेष
    सत्ताधारी राज्यों में लगातार कमजोर होती जा रही है दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी
    समय है मंथन का कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है
    क्या केंद्र में फुल टाइम रणनीतिकार की जरूरत है, जो संगठन पर ध्यान दे सके

    नमस्कार। आजाद सिपाही विशेष में आपका स्वागत है। मैं हूं राकेश सिंह।
    हरियाणा में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव का एग्जिट पोल बता रहा है कि यहां भाजपा हैट्रिक बनाने से चूक गयी है और उसके हाथ से यह राज्य भी निकल रहा है। जम्मू-कश्मीर की सत्ता भी भाजपा के हाथ नहीं आ रही है, ऐसा मतदान बाद के एग्जिट पोल का मानना है। दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के लिए वास्तव में ये एग्जिट पोल खतरे की घंटी बजा रहे हैं। अगले दो महीने में झारखंड और महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इन चुनावों की तैयारियों को देखते हुए इन दो एग्जिट पोल के नतीजों का पार्टी पर क्या असर हुआ है, इसे आसानी से महसूस किया जा सकता है। हरियाणा की राजनीतिक तस्वीर ने भाजपा के सामने यह सवाल पैदा कर दिया है कि आखिर वह राज्यों में अपनी सत्ता क्यों नहीं बचा पा रही है, जबकि विपक्ष शासित राज्यों में इसे जीत हासिल हो रही है। भाजपा के लिए राज्यों की सत्ता में लौटना लगातार मुश्किल होता जा रहा है और यह सवाल पार्टी आलाकमान के सामने बड़ी चुनौती बन कर खड़ा हो गया है। वास्तव में इसका एकमात्र कारण यह है कि भाजपा अपने केंद्रीय नेतृत्व पर जरूरत से अधिक निर्भर हो गयी है। जिन राज्यों में भाजपा सत्ता में है, वहां का संगठन सत्ता के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है और स्थानीय नेतृत्व पूरी तरह उपेक्षित है। वहीं जिन राज्यों में पार्टी सत्ता में नहीं है, वहां वह हमलावर है, लेकिन सत्ता मिलते ही उसका उत्साह ठंडा पड़ जा रहा है। भाजपा को इस असमंजस से उबरने की सख्त जरूरत है, आखिर कब तक पीएम मोदी के सहारे नैया पार होती रहेगी। पार्टी को समझना होगा कि पीएम मोदी केंद्र के लिए हैं और राज्यों में लोकल नेतृत्व को ही मजबूत करने की जरूरत है। ज्यादा हस्तक्षेप भी पार्टी के लिए नुकसानदायक होता है। वहीं भाजपा को केंद्र में अमित शाह सरीखे बेहतर रणनीतिकार की भी जरूरत है, जो फुल टाइम संगठन पर ध्यान दे सके। हरियाणा के एग्जिट पोल के नतीजों की पृष्ठभूमि में यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर भाजपा का संगठन राज्यों में इतना कमजोर क्यों हो गया है। भाजपा की इसी कमजोरी का आकलन कर रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

    दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी, भारतीय जनता पार्टी इस समय अजीब से द्वंद्व में फंसी हुई नजर आ रही है। हरियाणा के एग्जिट पोल के नतीजे उसकी पराजय की संभावना बता रहे हैं, तो जम्मू-कश्मीर में भी उसे सत्ता हासिल होने की संभावना खारिज कर दी गयी है। हालांकि एग्जिट पोल की विश्वसनीयता हमेशा से संदेह के घेरे में रही है, लेकिन हरियाणा के एग्जिट पोल के नतीजों ने भाजपा के लिए खतरे की घंटी जरूर बजा दी है। यह खतरा इसलिए भी बड़ा है, क्योंकि अगले दो महीने में महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा का चुनाव है और वहां भाजपा को बेहद मजबूत प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ रहा है। महाराष्ट्र में पार्टी सत्ता में तो है, लेकिन विपक्ष के निशाने पर उसके ही नेता हैं, जबकि झारखंड में पहली बार भाजपा विपक्ष में रह कर चुनाव लड़ रही है।

    हरियाणा के एग्जिट पोल के नतीजे से एक बात साफ हो गयी है कि भाजपा राज्यों में अपनी सत्ता बचाने में अब बुरी तरह फेल हो रही है, जबकि विपक्ष शासित राज्यों में उसकी जीत की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। मई में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा अपने बूते पर बहुमत का हैट्रिक बनाने से चूक गयी, जबकि ओड़िशा में उसने बीजद को हरा कर अपनी सरकार बना ली। इससे पहले कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में यही हो चुका है, जबकि इस मामले में केवल मध्यप्रदेश अपवाद है। उधर छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा ने कांग्रेस को हरा दिया था।

    इस सियासी माहौल में यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर 2024 में लगातार तीसरी बार देश की सत्ता में वापस आयी भाजपा का संगठन राज्यों में इतना कमजोर क्यों हो गया है। पार्टी की हालत यह है कि उसे न तो हरियाणा में सीएम पद के लिए कोई चेहरा मिला और महाराष्ट्र में भी भाजपा की कुछ ऐसी ही स्थिति है। राज्यों में सीएम पद का चेहरा सामने नहीं करने के पीछे आलाकमान जो भी तर्क दे, लेकिन इसका कितना बड़ा नुकसान पार्टी को उठाना पड़ता है, इसका अंदाजा शायद सहज नहीं है। केंद्र में नरेंद्र मोदी सबसे बड़ा चेहरा हैं, इसमें लेश मात्र भी संदेह नहीं है। लेकिन वही मोदी राज्यों में भी उतने ही मुफीद होंगे, ये लोगों के जेहन में नहीं उतरता। राज्यों में नेतृत्व का पनपना उभरना इसलिए जरूरी है कि अगर किसी को अपनी बात रखनी हो, तो वह स्थानीय नेता के पास ही तो जायेगा, सभी नरेंद्र मोदी या अमित शाह के पास तो नहीं जा सकते। राज्यों के चुनाव में स्थानीय मुद्दे ज्यादा हावी होते हैं। नली-गली की समस्या को लेकर जनता दिल्ली तो जायेगी नहीं, ऐसे में यह जरूरी है कि भाजपा हर राज्य में नेतृत्व उभारे, उसे मौका दे। पहले भाजपा में यह होता था, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। इसी का दुष्परिणाम यह हो रहा है कि जिन राज्यों में भाजपा सरकार में होती है, चुनाव होने पर वह दोबारा नहीं लौट पा रही है और जहां सत्ता में नहीं होती, वहां विपक्ष की भूमिका वह बखूबी निभाती है, जिसका लाभ उसे चुनाव में मिल जाता है। समय है, भाजपा आलाकमान को इस ओर ध्यान देना ही होगा। स्थानीय नेतृत्व को हाशिये पर डाल कर राज्यों में जनता का भरोसा जितना कठिन है।

    क्या थी देश की सियासी तस्वीर
    2018 और 2024 के बीच चार साल की अवधि में देश के 34 राज्यों में चुनाव हुए, यानी हर भारतीय राज्य में चुनाव हुआ (दिल्ली और पुड्डुचेरी में भी, क्योंकि वहां मुख्यमंत्री हैं)। हर चुनाव में भाजपा एक महत्वाकांक्षी मिशन नंबर लेकर आती रही। यदि राज्य विधानसभा में एक सौ सीटें हैं, तो भाजपा चुनाव अभियान के दौरान मिशन 65+ या कुछ ऐसी ही संख्या की घोषणा करती है, जो यह संकेत देती है कि चुनाव में वह सभी का सूपड़ा साफ कर देगी। लेकिन भारतीय राजनीति में भाजपा के प्रभुत्व को देखते हुए यह सवाल बेहद अहम हो गया लगता है कि इन 34 चुनावों में से कितने चुनाव भाजपा ने पूर्व या बाद के सहयोगियों के बिना अपने स्वयं के स्पष्ट बहुमत या बलबूते पर जीते? इनमें से कितने राज्यों में ये महत्वाकांक्षी मिशन सफल हुए? आंकड़ों के अनुसार पांच वर्षों में इन 34 में से भाजपा ने केवल 12 राज्यों में अपने बूते पर जीत हासिल की। इनमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, असम, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा शामिल हैं। इस सूची पर नजर दौड़ाने से साफ हो जाता है कि इन 12 में से आठ बड़े राज्य हैं, जिनके पास संसद के निचले सदन लोकसभा में पर्याप्त सीटें हैं। इसके अलावा भाजपा तीन बड़े राज्यों, महाराष्ट्र, बिहार और आंध्रप्रदेश में गठबंधन सरकार में सहयोगी की भूमिका में है। इसके विपरीत विपक्ष ने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, पंजाब, झारखंड, तेलंगाना, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश जीता। इन नौ राज्यों में से झारखंड को छोड़ कर हर राज्य में एकदलीय बहुमत है, जिनमें से अधिकांश बड़े राज्य हैं।

    भाजपा की संगठनात्मक स्थिति
    अब राज्यों में भाजपा की संगठनात्मक स्थिति पर नजर डालते हैं। जिन राज्यों में भाजपा सत्ता में है, वहां पार्टी का संगठन पूरी तरह सत्ता के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है। यहां तक कि इन राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष भी ऐसे हैं, जिनकी पहचान उनके अपने राज्य में भी नहीं है। झारखंड जैसे राज्य इसके अपवाद हैं। क्योंकि झारखंड में बाबूलाल मरांडी बहुत एक्टिव हैं। वह जमीनी नेता हैं। खैर इन राज्यों में भाजपा संगठन केवल पोस्ट आॅफिस बन कर रह गया है। उसके पास न कोई राजनीतिक कार्यक्रम है और न ही किसी आंदोलन में शामिल होने का माद्दा। पार्टी संगठन इन राज्यों में या तो वहां के सीएम या फिर पीएम मोदी के नाम से चल रहा है और इन दो नेताओं द्वारा दिखाये गये रास्ते पर चल रहा है। जिन राज्यों में भाजपा विपक्ष में है, वहां भी संगठन का स्थानीय नेतृत्व लगभग निष्क्रिय है। झारखंड शायद अकेला ऐसा राज्य है, जहां भाजपा के भीतर हचलच दिखाई पड़ रही है, और इस विधानसभा चुनाव की तैयारी में पूरा दम लगाया है। बाकी बिहार हो या पश्चिम बंगाल या कोई अन्य राज्य, पार्टी की प्रदेश इकाइयां एकदम निष्क्रिय हैं।

    भाजपा की कमजोरी के कारण
    यूपी, असम और गुजरात के बाहर राज्यों के चुनावों को एकतरफा बनाने में भाजपा की अक्षमता भी सवाल उठाती है। अगर आंकड़ों पर गौर करें, तो साल 2014 में जब भाजपा बहुमत के साथ सत्ता में आयी थी, तो उसी के साथ राज्यों में भी उसने बेहतर प्रदर्शन किया था। इसकी एक बड़ी वजह यह मानी जा सकती है कि लोकसभा चुनाव में जीत के बाद भाजपा पूरे देश का माहौल बदलने में कामयाब रही थी। मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व ने इसमें बड़ी भूमिका अदा की थी। फिर साल 2019 के आम चुनावों में पार्टी और ज्यादा सीटों के साथ सत्ता में आयी, लेकिन इन चुनावों के महज छह महीने के बाद जो विधानसभा चुनाव हुए, उसमें पार्टी पहले जैसा प्रदर्शन करने में नाकामयाब रही। इसके पीछे कारण यही रहा कि राज्यों में भी पार्टी मोदी के जादुई व्यक्तित्व को भुनाने में लग गयी। इसका परिणाम यह हुआ कि पार्टी में दूसरी पंक्ति के नेताओं का अभाव होने लगा। योगी आदित्यनाथ, पुष्कर सिंह धामी, शिवराज सिंह चौहान और हिमंत बिस्वा सरमा को छोड़ भाजपा का कोई भी मुख्यमंत्री इस स्थिति में नहीं रह गया कि राज्य के लोगों को अपनी उपलब्धि बता सके। भाजपा को समझना होगा कि अब मतदाता देश और राज्य के आधार पर अलग-अलग सोच कर वोट करता है। वह वोट करने से पहले सोचता है कि वह राज्य की सरकार चुन रहा है या फिर केंद्र की सरकार।

    इसलिए अब भाजपा को सोचना होगा कि राज्यों में होनेवाले चुनाव के दौरान उसकी रणनीति क्या होनी चाहिए। पार्टी हर चुनाव में यदि मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व को ही सामने रखेगी, तो फिर लोग उसमें दाग भी खोजने लगेंगे और तब भाजपा को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।

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