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    Home»राजनीति»चुनाव आयोग का यू-टर्न, कहा- दोषी नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगना चाहिए
    राजनीति

    चुनाव आयोग का यू-टर्न, कहा- दोषी नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगना चाहिए

    आजाद सिपाहीBy आजाद सिपाहीNovember 1, 2017No Comments2 Mins Read
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    जुलाई में चुनाव आयोग भ्रष्टाचार और गंभीर अपराधों में दोषी सांसदों और विधायकों के चुनाव लड़ने पर आजीवन पाबंदी लगाने की अपनी पहले की राय से पलट गया था

    चुनाव आयोग ने एक बार फिर दोषी सांसदों और विधायकों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने का समर्थन किया है. समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को सौंपे हलफनामे में चुनाव आयोग ने यह बात कही है. इससे पहले जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा था, क्योंकि चुनाव आयोग दोषी नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की अपनी पहले की राय से पलट गया था.

    सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों और विधायकों के खिलाफ भ्रष्टाचार और गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई एक साल में पूरी करने के अपने तीन साल पुराने आदेश की समीक्षा करने की भी बात कही है. द टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबकि जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस नवीन सिन्हा की बेंच ने कहा, ‘हम जानना चाहेंगे कि सजा की दर क्या रही? इससे एक नया पक्ष सामने आएगा. हम जान पाएंगे कि नेताओं के खिलाफ आपराधिक मामले सजा तक पहुंचे या नहीं? अगर नहीं तो क्यों, इसकी क्या वजह रही.’ सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से 2014 के अपने आदेश के बाद अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराए गए राजनेताओं की सूची मांगी है. इसके अलावा केंद्र से फास्ट ट्रैक कोर्ट की तर्ज पर राजनेताओं से जुड़े मामलों की सुनवाई करने के लिए अलग से अदालत बनाने के खर्च का ब्यौरा भी मांगा है. इसकी अगली सुनवाई 13 दिसंबर को होगी.

    सुप्रीम कोर्ट जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार या अन्य अपराध साबित होने पर छह साल के बजाए आजीवन प्रतिबंध की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है. याचिकाकर्ताओं के मुताबिक यह प्रावधान भेदभावपूर्ण होने के नाते असंवैधानिक हैं, क्योंकि ऐसे अपराध साबित होने पर न्यायपालिका और सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों पर हमेशा के लिए पाबंदी लगा दी जाती है. हालांकि, केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इस याचिका का विरोध किया है. उसका कहना है कि यह संसद का विषय है, इसलिए इस बारे में अदालत को आदेश नहीं देना चाहिए.

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