बहुत पुरानी कहावत है कि यदि जीवन के किसी क्षेत्र में ठहराव आ जाता है, तो फिर वह क्षेत्र नीरस हो जाता है। बिना किसी रोमांच के जीवन चलता तो रहता है, लेकिन उसका मजा नहीं आता। राजनीति में भी यह कहावत लागू होती है। झारखंड में अभी का राजनीतिक माहौल पूरी तरह चुनावी है। इसलिए आज ऐसी सीटों की बात , जो पिछले डेढ़ दशक से एक ही पार्टी के उम्मीदवार को विधानसभा में भेजती आयी है। झारखंड गठन के बाद अब तक तीन बार विधानसभा चुनाव हुए हैं। राज्य की 81 विधानसभा सीटों मे 15 सीटें ऐसी हैं, जहां लगातार एक ही दल का कब्जा रहा है। 2019 में बीजेपी, जेएमएम, जेवीएम, आजसू और वाम दल एक-दूसरे के इस किले को भेदने का प्रयास करेंगे। 2019 के विधानसभा चुनाव में इन 15 सीटों पर लोगों की खास नजर होगी। साथ ही दूसरे दलों के लिए इन किलों को भेदना भी बड़ी चुनौती होगी।
भाजपा और झामुमो के 5-5 अभेद्य किले
झारखंड बनने के बाद विधानसभा के तीन चुनाव हुए। 2005, 2009 और 2014 में। राज्य की पंद्रह सीटें ऐसी हैं, जहां एक ही राजनीतिक दल का कब्जा पंद्रह सालों से बरकरार है। संथाल परगना के बरहेट, लिट्टीपाड़ा और शिकारीपाड़ा में झामुमो का लगातार तीन चुनाव से कब्जा रहा है। इसी तरह सरायकेला और डुमरी में भी झारखंड मुक्ति मोर्चा कभी नहीं हारा। रांची, पूर्वी सिंहभूम, खूंटी, झरिया और कांके से बीजेपी लगातार चुनाव जीत रही है।
पूर्वी सिंहभूम से रघुवर दास, रांची से सीपी सिंह और खूंटी से नीलकंठ सिंह मुंडा ने जीत की हैट्रिक लगायी है। वहीं, कोयलांचल की झरिया सीट बीजेपी के कब्जे में रही है। यहां पर सिंह मेंशन का दबदबा रहा है। दो बार कुंती सिंह और एक बार संजीव सिंह यहां से विधायक रहे हैं। इस बार झरिया में सिंह मेंशन और रघुकुल के बीच नाक की लड़ाई है। एक तरफ हैं रागिनी सिंह, जो झरिया के वर्तमान विधायक संजीव सिंह के जेल में रहने की वजह से मैदान में उतरी हैं, तो दूसरी तरफ हैं रागिनी सिंह जिनके पति नीरज सिंह की हत्या के आरोप में वर्तमान विधायक संजीव जेल में हैं।
आजसू का अभेद्य किला है रामगढ़
रामगढ़ सीट पर लगातार आजसू का कब्जा बरकरार है। यहां से चंद्रप्रकाश चौधरी पिछले तीन चुनाव जीत चुके हैं। लोकसभा चुनाव में चंद्रप्रकाश चौधरी गिरिडीह से चुनाव लड़े और सांसद बने। अब अपनी सीट पर कब्जा बरकरार रखने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी सुनीता चौधरी को मैदान में उतारा है।
रेस में वामदल भी पीछे नहीं
पिछले तीन चुनाव से लगातार कब्जा करने में वामदल भी पीछे नहीं हैं। निरसा सीट लगातार वामदलों के कब्जे में रही है। 2005 में अर्पणा सेन गुप्ता ने चुनाव जीता था, इसके बाद पिछले दो चुनाव से अरूप चटर्जी चुनाव जीत रहे हैं।
पोड़ैयाहाट बना झाविमो का किला
झारखंड विकास मोर्चा ने भी किलों की कब्जेदारी में अपना नाम शामिल रखा है। पिछले तीन चुनाव से पोड़ैयाहाट विधानसभा सीट से झाविमो के प्रदीप यादव चुनाव जीतते रहे हैं। एक बार फिर वह यहां से चुनाव मैदान में है और विरोधियों को पछाड़ने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं।
कांके और रांची में में तीन दशक से भाजपा का कब्जा
राजधानी की दो सीटों रांची और कांके पर लंबे समय से भाजपा का दबदबा रहा है। रांची सीट पर पिछले चार चुनाव से लगातार वर्तमान विधायक सीपी सिंह का यहां कब्जा है। इससे पहले गुलशन अजमानी और यशवंत सिन्हा भी यहां से विधायक रह चुके हैं। रांची और कांके भाजपा के लिए सबसे सेफ सीटें मानी जाती रही हैं।
वहीं, तीन दशक से कांके सीट पर भाजपा के प्रत्याशी ही जीतते रहे हैं। इस विधानसभा से भाजपा के रामचंद्र बैठा चार बार विधायक रहे। रामचंद्र नायक और डॉ जीतू चरण राम एक-एक बार जीते हैं। अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी भी मजबूत दावेदारी पेश करते रहे हैं। भाजपा के मौजूदा प्रत्याशी समरीलाल भी यहां राजद, झामुमो और संजय विचार मंच के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं। रामटहल चौधरी भी कांके विधानसभा क्षेत्र के विधायक रहे हैं। रामटहल चौधरी के दो बार विधायक होने के बाद इस सीट को 1977 में आरक्षित कर दिया गया था। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने के बाद इस सीट से कांग्रेस के हीराराम तूफानी, हरि राम बाबू और रामरतन राम भी विधायक रहे। इन तीनों के विधायक होने के बाद से लगातार भाजपा ही इस सीट से जीतती आ रही है।
जगन्नाथपुर में कोड़ा परिवार का दबदबा
पश्चिमी सिंहभूम की जगन्नाथपुर विधानसभा सीट पर मधु कोड़ा और उनकी पत्नी गीता कोड़ा का दबदबा रहा है। इन्होंने पिछले तीनों चुनाव जीते हैं। यहां पहली बार दोनों पति-पत्नी विधानसभा चुनाव से अलग हैं। इस बार मगठबंधन की ओर से झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपना प्रत्याशी दिया है। कोड़ा दंपति गठबंधन के प्रत्याशी को समर्थन दे रही है, क्योंकि गीता कोड़ा कांग्रेस की सांसद हैं।
कोलेबिरा में हैट्रिक बना चुके हैं एनोस
सिमडेगा जिला के इसाई बहुल कोलेबिरा सीट पर झारखंड पार्टी के एनोस एक्का जीत की हैट्रिक बना चुके हैं। हालांकि एनोस एक्का को सजा होने के बाद हुए उपचुनाव में एनोस की पत्नी मेनन एक्का हार गयी है और कांग्रेस के नमन विक्सल कोनगाड़ी ने कब्जा जमाया है। अब एक बार फिर एनोस एक्का अपनी बेटी को चुनाव लड़ाकर अपनी सीट वापस पाने की जुगत में हैं।
संथाल की तीन सीटों पर झामुमो का कब्जा
वैसे तो पूरा संथाल परगना ही झारखंड मुक्ति मोर्चा का गढ़ माना जाता रहा है। पर यहां की तीन सीटें बरहेट, लिट्टीपाड़ा और शिकारीपाड़ा तो झामुमो का अभेद्य किला बन गये है। बरहेट विधानसभा सीट से फिलहाल हेमंत सोरेन विधायक हैं और वह एक बार फिर इस सीट से चुनाव मैदान में हैं। यह अलग बात है कि वह यहां के अलावा दुमका से भी चुनाव लड़ रहे हैं। इससे पहले बरहेट से तब के झामुमो नेता हेमलाल मुर्मू दो बार विधायक रहे। हालांकि अब वह भाजपा में है।
लिट्टीपाड़ा सीट पर भी झामुमो का कब्जा रहा है। अभी साइमन मरांडी वहां के विधायक हैं। इससे पहले 2005 और 2009 में भी वह यहां से विधायक रह चुके हैं।
2014 में झामुमो के अनिल मुर्मू ने यहां चुनाव जीता था। पर 2017 में उनका आकस्मिक निधन होने के बाद हुए उप चुनाव में पुन: साइमन मरांडी यहां से विधायक बने। वहीं, शिकारीपाड़ा सीट पर झामुमो के कद्दावर नेता नलिन सोरेन का एकछत्र राज रहा है। वह पिछले तीन चुनाव से यहां लगातार जीतते आ रहे हैं। इसी प्रकार संथाल परगना से सटे गिरिडीह जिला के डुमरी सीट पर भी अब तक झामुमो का कब्जा रहा है। यहां जगरनाथ महतो पिछले तीन चुनाव से लगातार जीतते आ रहे हैं। हालांकि इस बार इस सीट से आजसू ने भी पूरी तैयारी के साथ अपना उम्मीदवार उतारा है। इधर, कोल्हान की सरायकेला सीट पर भी झामुमो ने पिछले तीन चुनावों में लगातार जीत दर्ज की है। यहां झामुमो के वरीय नेता चंपई सोरेन ने अपना दबदबा बरकरार रखा है।