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    Home»Breaking News»रांची : सच्चाई छिपा रहे हैं राजीव झवर: बीके झवर
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    रांची : सच्चाई छिपा रहे हैं राजीव झवर: बीके झवर

    azad sipahiBy azad sipahiDecember 23, 2018No Comments4 Mins Read
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    रांची। झारखंड में टाटा के बाद निजी क्षेत्र की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी उषा मार्टिन के संस्थापक बसंत कुमार झवर ने कहा है कि कंपनी के वर्तमान कर्ता-धर्ता राजीव झवर सच्चाई छिपा रहे हैं। रविवार को अपने पुत्र प्रशांत झवर के साथ मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि वह उषा मार्टिन को बचाने की मुहिम में जुट गये हैं, जिसका दो-तिहाई हिस्सा बिक चुका है।

    बसंत झवर ने कहा कि 1961 में शुरू हुई उषा मार्टिन ने एक साल बाद ही लाभांश देना शुरू किया था, जो पांच दशक तक लगातार जारी रहा। पिछले पांच साल से कंपनी ने कोई लाभांश नहीं दिया है। उन्होंने उषा मार्टिन की विकास यात्रा का विवरण दिया और कहा कि पांच दशकों से अधिक समय तक मुनाफा कमानेवाले इस विश्वविख्यात संस्थान को राजीव झवर को उन्होंने इस भरोसे से सौंपा था कि वह इस संस्था को स्थापित मूल्यों और नैतिकता के साथ आगे ले जायेंगे। लेकिन दुर्भाग्य से निजी लोभ और स्वार्थ के कारण राजीव ने उन मूल्यों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया, जिन्हें वर्षों तक माना गया था। राजीव के नेतृत्व में कंपनी के भ्रष्ट और नाकाबिल प्रबंधन ने कड़ी मेहनत और ईमानदारी से बनाये गये संस्थान को नष्ट कर दिया।

    बीके झवर ने कहा कि अपने द्वारा स्थापित संस्थान की दयनीय अवस्था को देखते हुए 85 वर्ष की इस उम्र में वह इसे बचाने के लिए आगे आये हैं। उनके एकमात्र पुत्र प्रशांत झवर उनकी पूरी सहायता कर रहे हैं। बसंत झवर ने कहा कि हाल के दिनों में कुछ इस्पात कंपनियां बिकने या बंद होने के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में गयी हैं, लेकिन ये सभी कंपनियां वैसे प्रमोटरों की हैं, जो येन-केन-प्रकारेण लाभ कमाना चाहते हैं और वे व्यापार के इसी मॉडल को अपनाते हैं। इसके विपरीत टाटा स्टील, मुकुंद, जिंदल स्टील वर्क्स, कल्याणी स्टील, सनफ्लैग आयरन एंड स्टील जैसी कंपनियां आज भी शान से चल रही हैं और लाभ कमा रही हैं, क्योंकि इनके प्रमोटर उच्च नैतिक मूल्य अपनाते हैं। उन्होंने कहा कि उतार-चढ़ाव तो हरेक उद्योग का हिस्सा है। इससे घबड़ाने की जरूरत नहीं है।

    बसंत बाबू ने कहा कि बिना नैतिक मूल्यों और अनैतिक तरीके से व्यापार चलानेवाली कंपनियों के प्रमोटरों द्वारा बिना मतलब के कर्ज लेने के कारण कर्जदाता संस्थानों और बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। राजीव झवर ने भी जनवरी 2018 में भारतीय रिजर्व बैंक की एस4ए योजना का लाभ उठा कर उषा मार्टिन इंडस्ट्रीज लिमिटेड को कर्ज देनेवालों और बैंकों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। उनकी मंशा उषा मार्टिन लिमिटेड की देनदारियों को नये सिरे से परिभाषित करना था, जिससे कर्ज देनेवालों और बैंकों को नुकसान होता।

    उन्होंने कहा कि बाध्य होकर वह 31 जनवरी 2018 को एनसीएलटी में गये और अपना विरोध दर्ज कराया, क्योंकि हमारी मंशा हमेशा ही उन वित्तीय संस्थानों और बैंकों का एक-एक पैसा लौटाने की रही, जिन्होंने हमारा साथ दिया। बसंत झवर ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 12 फरवरी, 2018 को एस4ए स्कीम बंद कर दिये जाने के कारण कर्ज देनेवालों और बैंकों को नुकसान पहुंचाने का राजीव झवर का प्रयास विफल हो गया। यदि वह सफल हो जाते, तो इस्पात डिविजन से रकम बाहर निकालने का सिलसिला कई वर्षों तक जारी रहता।

    बसंत झवर ने कहा कि कंपनी की शुद्ध संपत्ति 1500 करोड़ तक कम हो चुकी थी। वर्ष 2010 से कंपनी का प्रदर्शन लगातार गिरता गया। यह गिरावट मुख्य रूप से राजीव झवर द्वारा की गयी धोखाधड़ी और पूंजी बाहर खींचे जाने के कारण आयी। कंपनी अपना कर्ज चुकाने और दूसरी वित्तीय आश्वासनों को पूरा करने में सक्षम नहीं रह गयी।

    बसंत झवर ने कहा कि उषा मार्टिन को कर्ज देनेवालों ने दिवालिया अदालतों में अपनी मांगों से संबंधित मुकदमे कर दिये हैं। शापूरजी पालोनजी ने उषा मार्टिन से 2.75 करोड़ रुपये के मूलधन पर ब्याज समेत 4.5 करोड़ का दावा कर रखा है। यह रकम 2011 में जमशेदपुर संयंत्र के निर्माण की है। डोलोमाइट माइनिंग कॉरपोरेशन का 1.42 करोड़ का दावा भी है। कई ऐसे दावे भी हैं, जिनका अब तक पता नहीं है, क्योंकि राजीव कुछ बता ही नहीं रहे।

    राजीव झवर ने निजी स्वार्थ को महत्व दिया
    बसंत झवर ने कहा कि राजीव झवर के नेतृत्व में कुप्रबंधन और वित्तीय गड़बड़ियों के कारण उषा मार्टिन इंडस्ट्रीज लिमिटेड को आज अपने व्यापार का दो-तिहाई हिस्सा टाटा को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा है। राजीव 2011 से इस कंपनी को देख रहे हैं। उन्होंने कंपनी हितों की बजाय निजी स्वार्थ को महत्व दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि कर्ज का बोझ महज 1.2 की जगह सात वर्ष में ही 20 गुणा तक पहुंच गया। राजीव ने अनैतिक ढंग से कंपनी को चलाया, इसलिए इस पर कर्ज का बोझ बढ़ता गया, साख कम होती गयी। हालत यह हो गयी कि इसके लिए खरीदार भी नहीं मिला।

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