दयानंद राय
रांची। आदिवासी समुदाय के पवित्र प्रतीकों में शामिल तीर-धनुष के मुद्दे पर झारखंड का माहौल गरमाने लगा है। सबसे पहले दुमका के एक युवा ने यह मुद्दा उठाया और उसके बाद झामुमो विधायक के अलावा दूसरे लोगों ने इसका समर्थन कर इसे मुद्दा बना दिया है। सच्चिदानंद सोरेन नामक युवक ने 30 नवंबर को एक ट्वीट कर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मांग की है कि 2016 में दुमका के संताल परगना कॉलेज के हॉस्टल से जब्त तीर-धनुष को वापस किया जाये। चार साल पुराना मामला उठने के बाद पुलिस प्रशासन की कार्रवाई भी कठघरे में खड़ी हो गयी है।
क्या है मामला
चार साल पहले 2016 में सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन के खिलाफ राज्य भर में आदिवासी संगठन आंदोलन चला रहे थे। उसी दौरान 25 नवंबर को आंदोलनकारियों ने आधा दर्जन वाहन जला दिये थे। प्रशासन को सूचना मिली कि संथाल परगना कॉलेज, दुमका के हॉस्टलों में हथियार आदि जमा किये गये हैं, जिनका इस्तेमाल आंदोलन में किया जा सकता है। 28 नवंबर को पुलिस ने आठ हॉस्टलों में छापामारी की और 25 हजार से अधिक तीर-धनुष जब्त किये। मौके से छह लोगों को हिरासत में लिया गया था। उनमें से चार को जेल भेज दिया गया था। यह मामला अब भी अदालत में लंबित है, हालांकि सभी आरोपी जमानत पा चुके हैं। हास्टल से जब्त तीर-धनुष को अब तक वापस नहीं किया गया है।
क्या है वैधानिक स्थिति
झारखंड में तीर-धनुष रखने के लिए किसी लाइसेंस की जरूरत नहीं है। हालांकि स्कूल-कॉलेजों और सार्वजनिक स्थानों पर इसे लेकर जाना प्रतिबंधित है। इसलिए आम तौर पर तीर-धनुष को घरों में ही रखा जाता है। पुलिस के अनुसार, तीर-धनुष को बड़ी संख्या में जमा करना गैर-कानूनी है।
छत्तीसगढ़ में हो चुका है विवाद
पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में तीर-धनुष रखने के मुद्दे पर विवाद हो चुका है। राज्य सरकार ने 2016 में एक आदेश जारी किया था, जिसमें जंगलों में तीर-धनुष लेकर जाने पर रोक लगा दी गयी थी। इस आदेश का जबरदस्त विरोध हुआ और बाद में इसमें संशोधन किया गया। अभी वहां अभ्यारण्यों में तीर-धनुष लेकर चलने पर रोक है।
जनजातीय जीवन का प्रमुख आधार है तीर-धनुष
भारत के जनजातीय समुदाय में तीर-धनुष एक हथियार ही नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक पहचान है। इसका इस्तेमाल आत्मरक्षा के साथ-साथ शिकार के लिए भी किया जाता है। यदि इंसानी सभ्यता की बात करें, तो तीर-धनुष का आविष्कार प्रागैतिहासिक काल में किया गया था। दक्षिण अफ्रीका के सिबूडू गुफा में 61 हजार साल पहले बनाये गये बोन तीर अंक की खोज हुई थी। उसके बारे में कहा गया कि वे तीर 71 हजार साल पुराने हो सकते हैं। इसी तरह केन्या के नटारुक की साइट स्टोन इत्तला-ओब्सीडियन पर एक मानव कंकाल में बाण लगे हुए पाये गये हैं। इससे यह साबित होता है कि उस समय इस तरह के तीर को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। हिमनदों की अवधि के बाद आॅस्ट्रेलिया के अलावा हर बसे हुए महाद्वीप पर तीर-धनुष का इस्तेमाल किया गया था। यूरोप और एशिया में मध्य युग के माध्यम से धनुमा और तीर प्राचीन समय से प्राथमिक हथियार थे। चीन, जापान के साथ दूसरी सभ्यताओं में भी तीर-धनुष के इस्तेमाल के प्रमाण इतिहास में मिलते हैं। 11वीं सदी में बारूद के आविष्कार तक तीर-धनुष को युद्ध क्षेत्र का सबसे घातक हथियार माना जाता था।
सबूत बताते हैं कि इंसान ने अपने शरीर के आकार और मारक क्षमता के मुताबिक विभिन्न आकारों के धनुष बनाये। इसमें इस्तेमाल होनेवाली सामग्री बांस से लेकर धातु तक होती थी। इसी तरह तीर के लिए भी जानवरों के सींग और हड्डियों का इस्तेमाल होता था। तीर को नुकीला बना कर उसे जहर से बुझा दिया जाता था। झारखंड में आज भी जनी शिकार जैसे पारंपरिक जनजातीय त्योहारों में जहर बुझे तीर से शिकार किया जाता है।
भारत में पायी जानेवाली जारवा जनजाति आज भी तीर-धनुष का इस्तेमाल करती है। यह जनजाति पिछले 55 हजार साल से हिंद महासागर के टापुओं पर रहती है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर रहनेवाली इस जनजाति से किसी भी बाहरी व्यक्ति के मिलने पर रोक है। दूसरी जनजातियों में भी तीर-धनुष का इस्तेमाल होता है। हालांकि इसके साथ भाला और दूसरे पारंपरिक हथियारों का भी प्रयोग किया जाता है।
बाबा तिलका मांझी ने की थी कलक्टर की हत्या
वर्ष 1784 में बाबा तिलका मांझी द्वारा भागलपुर के तत्कालीन कलक्टर अगस्टस क्लीवलैंड की तीर-धनुष से हत्या कर दी गयी थी। बाबा तिलका मांझी ताड़ के पेड़ पर चढ़ गये थे और अंग्रेज कलक्टर घोड़े पर सवार होकर अपने बंगले से निकला था। तभी बाबा तिलका मांझी ने जहर बुझे तीर से उसे मार गिराया। आधुनिक भारतीय इतिहास में तीर-धनुष के घातक इस्तेमाल का यह पहला वाकया दर्ज है। इसके बाद 1855 में संथाल हूल क्रांति के दौरान सिदो-कान्हू ने भी तीर-धनुष का जम कर इस्तेमाल किया। फिर भगवान बिरसा मुंडा ने तीर-धनुष की ताकत से अंग्रेज सैनिकों के छक्के छुड़ा दिये।
आदिवासी साहित्य में भी तीर-धनुष की है चर्चा
प्रसिद्ध साहित्यकार महाश्वेता देवी ने ‘चोट्टि मुंडा के तीर’ नामक उपन्यास में जनजातीय समाज द्वारा तीर-धनुष के व्यापक इस्तेमाल का विस्तार से जिक्र किया है। चोट्टि मुंडा ऐसा तीरंदाज है, जो निशाने के बारे में सोच कर तीर चलाता है और वह ठीक निशाने पर लग जाता है। उपन्यास में बताया गया है कि तीर-धनुष जनजातीय समाज की दैवी शक्ति है।
शिबू सोरेन कर चुके हैं समर्थन
दिशोम गुरु शिबू सोरेन भी आदिवासियों द्वारा तीर-धनुष साथ रखने का समर्थन कर चुके हैं। इसी साल जनवरी में उन्होंने दुमका में कहा था कि तीर-धनुष आदिवासियों की पहचान से जुड़ा है। इसलिए आदिवासी तीर-धनुष हमेशा अपने साथ रखें। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार सिख कृपाण रखते हैं। बकौल गुरुजी, सामाजिक नियम में बहुत शक्ति है और आदिवासी अपनी परंपरा, पहचान और संस्कृति को कायम रखें।
क्या है सच्चिदानंद सोरेन का ट्वीट
सच्चिदानंद सोरेन ने अपने ट्वीट में कहा है, क्या अबुआ दिशोम अबुआ राज में संताल परगना कॉलेज हॉस्टल से 2016 में जब्त किये गये आदिवासियों के तीर-धनुष वापस हो सकते हैं? जब छात्र हॉस्टल में प्रथम बार आते हैं, तो वे तीर-धनुष अपने साथ लाते हैं। यह यहां की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा रही है। इस ट्वीट से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, सांसद विजय हांसदा, विधायक सीता सोरेन और बसंत सोरेन तथा अन्य को टैग किया गया है।
झामुमो विधायक ने किया समर्थन
झामुमो विधायक सीता सोरेन ने सच्चिदानंद का समर्थन करते हुए ट्वीट किया। इसमें उन्होंने लिखा, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जी, झारखंड की संस्कृति, सभ्यता, पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार तीर-धनुष सर्वसुलभ रखने की मान्यता दी जाये। तीर-धनुष हमारे झारखंड के गौरव-अस्मिता का पूज्यनीय प्रतीक है। सिख समाज के कृपाण की तरह आदिवासी समाज को भी तीर-धनुष रखने का पूरा अधिकार है। उनके इस ट्वीट का ट्राइबल आर्मी के संस्थापक हंसराज मीणा ने समर्थन किया। उन्होंने विधायक के ट्वीट को अपने
हैंडल से ट्वीट किया और अंत में लिखा, मैं सीता सोरेन का समर्थन करता हूं। इन तीनों ट्वीट के बाद यह मुद्दा गरम हो गया। करीब तीन सौ लोगों ने इस मांग का समर्थन करते हुए जब्त तीर-धनुष को वापस करने की मांग कर दी है।