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    Home»विशेष»एक बार फिर बेनकाब हुआ विपक्षी कुनबे का मतभेद
    विशेष

    एक बार फिर बेनकाब हुआ विपक्षी कुनबे का मतभेद

    adminBy adminDecember 23, 2023No Comments9 Mins Read
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    -ममता की एक चाल से राहुल-प्रियंका से लेकर नीतीश तक का पत्ता हुआ साफ
    -अब ‘खिसियानी बिल्ली’ की तरह खंभा नोच रहे हैं लालू के साथ सुशासन बाबू

    2024 में होनेवाले लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को हराने के लिए बने 28 दलों के विपक्षी गठबंधन, यानी इंडी अलायंस के घटक दलों की चौथी बैठक के बाद वैसे तो कई प्रस्तावों पर सहमति का एलान किया गया, लेकिन अंदरूनी मामला इतना सुलझा हुआ नहीं है। सीट शेयरिंग और दूसरे मामूली मुद्दों पर घटक दलों ने सहमति जतायी, लेकिन नेता पद के उम्मीदवार को लेकर मामला पूरी तरह बिगड़ गया। यह मुद्दा इतना उलझ गया कि अब गठबंधन के भीतर के मतभेद पूरी तरह बेनकाब हो गये हैं। यह मतभेद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की एक चाल के कारण सामने आया, जिसकी मदद से उन्होंने न केवल राहुल गांधी-प्रियंका गांधी, बल्कि नीतीश कुमार का भी पत्ता साफ कर दिया। बैठक में ममता ने नेता पद के लिए मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम का प्रस्ताव किया, जिसका समर्थन अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे ने भी किया। ममता के इस प्रस्ताव के बाद नीतीश कुमार और लालू यादव बेहद नाराज हैं। उनकी नाराजगी तब सामने आयी, जब बैठक के बाद मीडिया से बातचीत करने नीतीश नहीं आये और उन्होंने जदयू के सांसदों के साथ अलग-अलग बैठक कर स्थिति का आकलन किया। राजद सुप्रीमो तो खैर स्वास्थ्य का बहाना बना कर बैठक के फौरन बाद ही निकल गये। बैठक खत्म होने के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी बाहर निकल गये और उन्होंने मीडिया से बात तक करने से इनकार कर दिया। इन घटनाक्रमों को इंडी अलायंस के भीतर चल रहे विवाद से जोड़ा जा रहा है, जो कहीं से भी गलत नहीं है। दिल्ली की बैठक में क्या हुआ और इंडी अलायंस का भविष्य एक बार फिर कैसे अधर में लटक गया है, बता रहे हैं आजाद सिपाही के विशेष संवाददाता राकेश सिंह।

    भाजपा और नरेंद्र मोदी को लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने से रोकने के लिए विपक्षी दलों का बना गठबंधन अब असली रंग दिखा रहा है। गठबंधन के भीतर की साजिशें अब परतों से बाहर झांकने लगी हैं। दांव-पेंच चले जा रहे हैं। एक गुट दूसरे गुट को नीचा दिखा रहा है। किसी तीसरे के कंधे पर बंदूक रख कर गोली चलायी जा रही है।
    दरअसल, विपक्षी दलों के गठबंधन में शामिल सभी 28 राजनीतिक दलों की दिल्ली में बैठक हुई थी। इस बैठक में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर उछला। इसके बाद विपक्षी दलों के बीच रार ठन गयी है। जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने खड़गे का नाम प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में आगे बढ़ाये जाने पर नाराजगी व्यक्त की है। बैठक में खड़गे को नेता के रूप में सामने रखने का प्रस्ताव पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने किया। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और शिवसेना (उद्धव) के उद्धव ठाकरे ने इसका समर्थन कर दिया। इसके बाद ही गठबंधन के भीतर की दरार सामने आने लगी।
    ममता ने क्यों चली यह चाल
    दरअसल, बैठक से पहले ममता बनर्जी ने अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे के साथ अलग-अलग मुलाकात की थी। इन मुलाकातों में उन्होंने अपनी रणनीति तैयार कर ली थी। वास्तव में आम आदमी पार्टी और टीएमसी की महत्वाकांक्षा राष्ट्रीय पार्टी बनने की है। इसके लिए उन्हें गांधी परिवार को कमजोर करना होगा। इसलिए इंडी गठबंधन की चौथी बैठक में राहुल गांधी की जगह मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाने का प्रस्ताव दे दिया गया। बात यहीं तक नहीं रुकी। इससे आगे बढ़ते हुए टीएमसी ने प्रियंका गांधी को वाराणसी से चुनाव लड़ाने का प्रस्ताव भी दे दिया। यह भी एक ऐसा कदम है, जिसका उद्देश्य गांधी परिवार को कमजोर करना है। टीएमसी और ममता बनर्जी चाहती हैं कि गांधी परिवार अपना जोर मोदी को रोकने में और यूपी में कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा सीटें दिलाने में लगाये। ऐसे में पश्चिम बंगाल में वह कांग्रेस के साथ मोलभाव करने की स्थिति में रहेंगी। चूंकि एक अन्य महत्वपूर्ण नेता नीतीश कुमार को लगभग अलग-थलग ही कर दिया गया है, ऐसे में बाकी के क्षेत्रीय क्षत्रप अपने सामने आनेवाली चुनौतियों को धीरे-धीरे मिटाना चाहते हैं।
    गठबंधन में प्रधानमंत्री पद के कितने दावेदार
    गठबंधन की ओर से मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल जैसे नेता प्रधानमंत्री पद की दौड़ में हैं। ऐसे में लोकसभा चुनाव 2024 में जो पार्टी जितनी अधिक सीट हासिल करेगी, उसकी पार्टी के नेता का इस रेस में आगे निकलना उतना ही आसान रहेगा। चूंकि कांग्रेस पूरे देश में चुनाव लड़ती है, लेकिन अखिलेश यादव का 60 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान और साथ में रालोद का उसे मिलनेवाला साथ उसे इस रेस में दूसरे नंबर पर खड़ा करती है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या प्रियंका गांधी के वाराणसी सीट से उतरने पर भी कांग्रेस सपा की 60 सीटों वाली बात मान लेगी।
    नीतीश कुमार-लालू यादव हुए नाराज
    अब राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि गठबंधन के अंदरखाने इस प्रस्ताव पर विवाद छिड़ गया है। दावा किया जा रहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद अध्यक्ष लालू यादव इस प्रस्ताव से नाराज हो गये हैं। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस से पहले ही दोनों नेता होटल से निकल गये। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी नाराज बताया जा रहा है। हालांकि उन्होंने अभी चुप्पी साध रखी है।
    लालू-नीतीश क्यों हुए नाराज
    बैठक से पहले खूब बोलने वाले लालू ने कहा था कि मीटिंग में सब अच्छा होगा, लेकिन बैठक के बाद तुरंत वहां से निकल गये। कहा जा रहा है कि लालू चाहते थे कि इस बैठक में नीतीश कुमार को गठबंधन का संयोजक बनाया जाये, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उलटे ममता बनर्जी ने दलित कार्ड खेलते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रस्तावित कर दिया। वास्तव में जदयू और राजद दोनों की मंशा है कि नीतीश कुमार अब गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के ना सिर्फ उम्मीदवार बनें, बल्कि वह उस पद पर काबिज भी हों। जदयू की चाहत इसलिए है कि उसकी पार्टी के नेता प्रधानमंत्री बनेंगे, तो उसके लोग मंत्री से लेकर सत्ता के शीर्ष शिखर पर बैठ सकेंगे। वहीं लालू की चाहत है कि नीतीश अब केंद्र की राजनीति करें। वह गठबंधन को लीड करें और 2024 में प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनें।
    नीतीश को पीएम बनाने की चाहत लालू को क्यों
    ऐसा कर लालू एक तीर से दो निशाना साधना चाहते हैं। पहली तो यह कि नीतीश कुमार को केंद्र की राजनीति में भेज कर बेटे तेजस्वी यादव के लिए बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी और एक अणे मार्ग दिलाना चाहते हैं और दूसरा वह पिछड़ी जाति के मसीहा के रूप में नीतीश के साथ एक मशहूर जोड़ी बनना चाहते हैं। दोनों नेताओं ने जब से हाथ मिलाया है, तब से बिहार में ना केवल जातीय जनगणना हुई, बल्कि उसके आंकड़ों के आधार पर राज्य में नयी आरक्षण नीति भी मंजूर कर ली गयी है। इससे कई राज्यों, खासकर बिहार से सटे उत्तरप्रदेश, झारखंड, ओड़िशा में पिछड़े वर्ग का आंदोलन फिर से तेज होने लगा है। राष्ट्रीय फलक पर भी कांग्रेस जाति जनगणना की मांग करने लगी है और वादे करने लगी है कि उसकी सरकार बनने पर जाति जनगणना होगी और उसके अनुसार आरक्षण की सीमा बढ़ायी जा सकेगी।
    गठबंधन में शुरू से ही पड़ी है दरार
    वैसे गठबंधन के गठन के बाद से ही नेता पद को लेकर खींचतान शुरू हो गयी थी। यह खींचतान इतनी बढ़ गयी कि गठबंधन में शामिल पार्टियों के बीच एक-दूसरे को कमजोर करने की कोशिशें तक चलने लगीं। सबसे अधिक निशाने पर नीतीश कुमार और गांधी परिवार हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तड़प सामने आ चुकी है, तो मध्यप्रदेश में कांग्रेस-सपा की तू-तू-मैं-मैं किसी से नहीं छिपी है। एक तरफ दिल्ली से लेकर पंजाब तक आम आदमी पार्टी कांग्रेस को चुनौती दे रही है, तो दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अड़ी हुई हैं। बिहार में राजद चुप है, क्योंकि नीतीश कुमार फ्रंट पर हैं, लेकिन सीट बंटवारे की बात आयेगी, तो अदावत यहां भी होगी। झारखंड में झामुमो को भी सम्मान देना होगा, वह आठ सीटें मांग चुका है, तो तमिलनाडु में द्रमुक-अन्नाद्रमुक के साथ भी संबंधों में पेंच फंसेगा। अन्नाद्रमुक एनडीए से निकल चुका है। उसे भी साथी की तलाश है। महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव) को भाव दिया जाये या एनसीपी (शरद पवार गुट) को, इसको लेकर भी मामला फंसने वाला है। सीट शेयरिंग को लेकर भी मामला फंस सकता है। गठबंधन का सबसे बड़ा दल यानी कांग्रेस, जो खुद कई राज्यों में छोटे दलों से कमजोर है, अपनी गुफा में गुर्राता है, तो पलट कर छोटा दल भी दहाड़ता है कि यहां से निकल कर ‘मेरी गली’ में आओ, फिर बताते हैं। अब यह ‘गली वॉर’ पूरे राज्य में फैल चुका है। दूसरे की मांद में घुसा वह साथी कह रहा है कि इस मांद में अब मत आ जाना। आना भी तो एक कोने में। जगह भी हमारी होगी, कोना भी हमारा होगा। वहां जमीन कितनी देंगे, इसका फैसला भी हमारा होगा। हम बात कर रहे हैं विपक्षी गठबंधन के सबसे बड़े दल कांग्रेस की और दूसरे सबसे बड़े दल (सीटों पर चुनाव लड़ने की संख्या के मामले में) समाजवादी पार्टी की। बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ, जब मध्यप्रदेश के अपने गढ़ में कांग्रेस के कमलनाथ ने मीडिया से बातचीत में बड़े उखड़े मूड़ में कह दिया था कि छोड़िए अखिलेश-वखिलेश को। इसके बाद समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव यूपी में कांग्रेस को खास भाव देने के मूड में नहीं हैं।
    ताबूत की अंतिम कील साबित होगी ममता की चाल
    तमाम मतभेदों और दरारों को देखते हुए अब कहा जा सकता है कि गठबंधन की चौथी बैठक में ममता बनर्जी की एक चाल ने घटक दलों के नेताओं की तमाम खुंटचालों और महत्वाकांक्षाओं को एक झटके में धूल में मिला दिया है। खड़गे ने कह तो दिया है कि पीएम पद का फैसला चुनाव बाद किया जायेगा, लेकिन उनके समर्थकों ने ममता बनर्जी के प्रस्ताव पर जो प्रतिक्रिया दी है, वह गौर करनेवाली है। इधर राहुल-प्रियंका खेमा इस झटके से उबरने की कोशिश में खीसें निपोर रहा है, तो नीतीश-लालू खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोचने लगे हैं। ऐसे में विपक्षी गठबंधन के अधिक दूर तक चलने की उम्मीद नहीं दिखायी दे रही है।

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