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    Home»विशेष»जब अटल बिहार वाजपेयी ने कहा था ‘आज हम संख्या बल में कम हो सकते हैं, लेकिन हमारे हौसले कम नहीं हैं’
    विशेष

    जब अटल बिहार वाजपेयी ने कहा था ‘आज हम संख्या बल में कम हो सकते हैं, लेकिन हमारे हौसले कम नहीं हैं’

    shivam kumarBy shivam kumarApril 8, 2026Updated:April 8, 2026No Comments15 Mins Read
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    विशेष
    ‘हम फिर से उठेंगे, फिर से लड़ेंगे और फिर से जीतेंगे’ और शुरू हुई भाजपा की 2 सीटों से दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनने का सफर
    भारतीय जनता पार्टी का 1980 से लेकर 2026 तक का सफर केवल एक राजनीतिक दल के उत्थान की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के वैचारिक और राजनीतिक परिदृश्य के पूरी तरह बदलने की दास्तां है। 6 अप्रैल 1980 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में दो सीटों से शुरू हुआ यह सफर आज दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनने तक पहुंच चुका है।

    वैचारिक पृष्ठभूमि, जनसंघ की स्थापना और आरएसएस की इंट्री
    भारतीय जनता पार्टी की जड़ें भारतीय जनसंघ में निहित हैं, जिसकी स्थापना 1951 में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी। जनसंघ का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीतियों का विरोध करना और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना था। आजादी के बाद भारतीय राजनीति पर कांग्रेस का पूर्ण वर्चस्व था। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री थे, लेकिन दो मुख्य मुद्दों पर उनके मतभेद इतने गहरे हो गये कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया। नेहरू-लियाकत 1950 के समझौते को डॉ मुखर्जी ने बंगाल के हिंदुओं के साथ विश्वासघात माना।
    वहीं डॉ मुखर्जी कश्मीर को विशेष दर्जा (अनुच्छेद 370) देने के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे विपक्षी दल की जरूरत है, जो भारतीय मूल्यों और सांस्कृतिक गौरव पर आधारित हो। इसी सोच के साथ 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। जनसंघ ने कांग्रेस के कॉस्मोपॉलिटन राष्ट्रवाद के जवाब में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विचार रखा। एक राष्ट्र, एक संस्कृति, अखंड भारत और हिंदी को बढ़ावा। विभाजन को जनसंघ ने एक भूल माना और अखंड भारत की पुनर्स्थापना को अपना

    दीर्घकालिक लक्ष्य बनाया।
    अंग्रेजी के वर्चस्व को खत्म कर भारतीय भाषाओं (विशेषकर हिंदी) को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना उनका प्रमुख एजेंडा था। 1960 के दशक में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने जनसंघ को एक ठोस दार्शनिक आधार दिया, जिसे एकात्म मानववाद कहा गया। यह विचार पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों को खारिज करता था। इसका लक्ष्य अंत्योदय था, यानी समाज की पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति का उत्थान। आज भी भाजपा की कई योजनाएं इसी दर्शन से प्रेरित हैं। जनसंघ को वैचारिक और सांगठनिक शक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मिली। डॉ मुखर्जी के पास राजनीतिक दृष्टि थी, लेकिन उनके पास कार्यकर्ताओं का बड़ा नेटवर्क नहीं था। आरएसएस ने अपने प्रचारक (जैसे अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, और सुंदर सिंह भंडारी) जनसंघ को सौंपे, जिससे पार्टी को एक अनुशासित कैडर मिला।

    आपातकाल (1975-77) और जनता पार्टी (विवाद और अलगाव)
    जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया, तो जनसंघ ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपना विलय जनता पार्टी में कर दिया। 1980 में दोहरी सदस्यता (कि आप पार्टी के सदस्य भी रहेंगे और आरएसएस के भी) के मुद्दे पर विवाद हुआ। समाजवादी नेताओं ने मांग की कि पार्टी के सदस्य आरएसएस के सदस्य नहीं रह सकते। इस पर जनसंघ धड़े ने समझौता करने के बजाय अलग होने का रास्ता चुना। पूर्व जनसंघी नेताओं ने जनता पार्टी छोड़ दी और 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी के रूप में नये नाम के साथ सामने आये।

    भाजपा का जन्म: अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा
    भाजपा का जन्म हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष बने। उन्होंने अपने पहले भाषण में भविष्यवाणी की थी— अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा। यह क्षण भारतीय राजनीति के इतिहास में मुंबई के समंदर किनारे एक नये युग की शुरूआत माना जाता है। 6 अप्रैल 1980 को मुंबई के बांद्रा कुर्ला कांप्लेक्स में भारतीय जनता पार्टी का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ था। उस समय का राजनीतिक माहौल भाजपा के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था। जनता पार्टी के बिखरने के बाद जनसंघ से आये नेताओं को राजनीतिक अछूत बनाने की कोशिश की जा रही थी।

    अटल बिहारी वाजपेयी ने जब मंच संभाला, तो उनके सामने वे हताश कार्यकर्ता थे, जो जनता पार्टी के प्रयोग की विफलता से दुखी थे। तब अटल जी ने अपने ओजस्वी स्वर में कहा था, भारत के पश्चिमी घाट को छूने वाले महासागर के किनारे खड़े होकर मैं यह भविष्यवाणी करने का साहस करता हूं अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा। यह केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि एक हारी हुई फौज में जान फूंकने वाला मंत्र था। उन्होंने कमल (पार्टी का चुनाव चिन्ह) को राष्ट्र की सांस्कृतिक अस्मिता और समृद्धि का प्रतीक बताया। अटल बिहारी वाजपेयी ने आपातकाल के कड़वे अनुभवों के बाद जोर दिया कि भाजपा सत्ता के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गरिमा के लिए लड़ेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा केवल विरोध की राजनीति नहीं करेगी, बल्कि देश के सामने एक बेहतर विकल्प पेश करेगी। वाजपेयी के नेतृत्व में पार्टी ने संगठन निर्माण पर जोर दिया। उन्होंने देशभर का दौरा कर पुराने जनसंघी कार्यकर्ताओं को एकजुट किया।

    जब भाजपा दो सीटों पर सिमट गयी और प्रण लिया हम फिर से उठेंगे, फिर से लड़ेंगे और फिर से जीतेंगे
    1984 का चुनाव भाजपा के इतिहास का सबसे कठिन और अंधकारमय दौर था। 1980 में बड़े उत्साह के साथ बनी पार्टी को मात्र चार साल के भीतर ही अपने अस्तित्व के संकट का सामना करना पड़ा। 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में कांग्रेस के पक्ष में एक अभूतपूर्व लहर थी। कांग्रेस ने इतिहास की सबसे बड़ी जीत (400+ सीटें) हासिल की और भाजपा मात्र दो सीटों पर सिमट गयी। खुद वाजपेयी ग्वालियर से चुनाव हार गये। संसद में जब भाजपा के केवल दो सदस्य पहुंचे, तो विपक्षी दलों और मीडिया ने भाजपा का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। कई राजनीतिक विश्लेषकों ने तो यहां तक लिख दिया कि भाजपा का अंत हो गया है। लेकिन इतनी बड़ी हार के बावजूद वाजपेयी विचलित नहीं हुए। उन्होंने संसद में कहा था, लोकतंत्र में हार-जीत गौण है, विचार मुख्य है। आज हम संख्या बल में कम हो सकते हैं, लेकिन हमारे हौसले कम नहीं हैं। हम फिर से उठेंगे, फिर से लड़ेंगे और फिर से जीतेंगे।

    जब भाजपा ने हिंदुत्व को अपना आधार बनाया
    1984 की करारी हार के बाद भाजपा ने महसूस किया कि गांधीवादी समाजवाद के नाम पर वह अपनी मूल पहचान खो रही है। 1986 में लालकृष्ण आडवाणी के अध्यक्ष बनने के साथ ही पार्टी के इतिहास का सबसे बड़ा वैचारिक मोड़ आया। इस हार के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने कमान संभाली और पार्टी ने प्रखर हिंदुत्व और पालमपुर प्रस्ताव के जरिये राम जन्मभूमि आंदोलन को अपना आधिकारिक समर्थन दिया। भाजपा ने पहली बार औपचारिक रूप से अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के आंदोलन को अपना पूर्ण समर्थन दिया।
    प्रस्ताव में कहा गया कि राम जन्मभूमि का मुद्दा अदालतों के जरिये नहीं सुलझाया जा सकता, क्योंकि यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था का विषय है। इसे केवल आपसी बातचीत या कानून (संसद) बनाकर ही सुलझाया जाना चाहिए। इस प्रस्ताव के जरिये भाजपा ने खुद को कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति के एकमात्र विकल्प के रूप में पेश किया।

    भाजपा का उदय, निर्णायक मोड़ और कांग्रेस को सत्ता से बेदखल
    1989 का चुनाव भारतीय राजनीति के इतिहास में एक वॉटरशेड मोमेंट (निर्णायक मोड़) था। जिस पार्टी को 1984 में राजनीतिक रूप से समाप्त मान लिया गया था, उसने मात्र पांच साल में 4200% की वृद्धि दर्ज की। यह दो से 86 सीटों का सफर कोई इत्तेफाक नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक और वैचारिक जीत थी। शाह बानो केस और बोफोर्स घोटाले के बीच भाजपा ने राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन दिया और इसकी सीटें दो से बढ़कर 86 हो गयीं। राजीव गांधी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार (विशेषकर बोफोर्स तोप सौदा) एक बड़ा मुद्दा बन चुका था। विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस छोड़कर बाहर आये और विपक्षी एकता का चेहरा बने। भाजपा ने बड़ी चतुराई से कांग्रेस विरोधी वोटों के बिखराव को रोकने के लिए वीपी सिंह के साथ सीटों का तालमेल किया। 1989 के चुनाव से ठीक पहले, नवंबर में अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास हुआ। भाजपा ने इसे अपना पूर्ण समर्थन दिया। भाजपा ने हिंदू कार्ड को मजबूती से खेला, जिससे उत्तर भारत (विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार) के मतदाताओं में पार्टी के प्रति जबरदस्त आकर्षण पैदा हुआ। विश्व हिंदू परिषद के जमीनी कार्यकर्ताओं ने भाजपा के लिए एक मजबूत मशीनरी का काम किया। जब 1989 के चुनाव परिणाम आये, तो कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बहुमत से दूर थी।
    भाजपा 86 सीटों के साथ तीसरी सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी। भारतीय राजनीति में पहली बार ऐसा हुआ, जब धुर विरोधी भाजपा और वामपंथियों ने मिलकर एक ही सरकार (वीपी सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार) को बाहर से समर्थन दिया। इसका एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस को सत्ता से दूर रखना था।

    मंडल बनाम कमंडल की शुरूआत और मैसेज बलिदान
    वीपी सिंह की सरकार ने जब मंडल आयोग की सिफारिशें (ओबीसी आरक्षण) लागू करने की घोषणा की, तो देश की राजनीति में एक नया मोड़ आया। मंडल राजनीति ने हिंदू समाज को जातियों में बांटने का खतरा पैदा किया। इसी मंडल की काट के लिए लालकृष्ण आडवाणी ने कमंडल (राम रथ यात्रा) की राजनीति को तेज कर दिया, ताकि हिंदू समाज को एक छतरी के नीचे लाया जा सके। अक्टूबर 1990 में जब आडवाणी की रथ यात्रा को बिहार के समस्तीपुर में रोका गया और उन्हें गिरफ्तार किया गया, तो भाजपा ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया। नतीजा सरकार गिर गयी, लेकिन भाजपा ने जनता के बीच यह संदेश दिया कि वह अपनी विचारधारा (राम मंदिर) के लिए सत्ता का बलिदान दे सकती है।

    जब भाजपा पहली बार मुख्य विपक्षी दल बनी
    1989 की जीत के बाद भाजपा ने राम मंदिर आंदोलन को और तेज करने का फैसला किया। 25 सितंबर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा शुरू की। उद्देश्य था जनता को मंदिर निर्माण के लिए जागरूक करना और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रसार। इस यात्रा ने पूरे उत्तर और मध्य भारत को मथ कर रख दिया। गांव-गांव में राम ज्योति और कार सेवा की चर्चा होने लगी। जब 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी को गिरफ्तार किया, तो भाजपा ने केंद्र की वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। इससे सरकार गिर गयी और मध्यावधि चुनाव (1991) का रास्ता साफ हो गया। 1991 के चुनावों में भाजपा ने किसी बड़े दल से गठबंधन नहीं किया। पार्टी ने अकेले दम पर चुनाव लड़ने का फैसला किया। उस समय का सबसे प्रसिद्ध नारा था, जो हिंदू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा। राम मंदिर के मुद्दे ने जातिगत समीकरणों (मंडल आयोग के बाद पैदा हुए विभाजन) को काफी हद तक ढक दिया और हिंदू वोट बैंक को एक छतरी के नीचे लाने की कोशिश की। चुनाव प्रचार के बीच ही 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या हो गयी। इससे देश में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर पैदा हुई। अगर यह सहानुभूति की लहर न होती, तो राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा 120 से भी कहीं अधिक सीटें जीत सकती थी। सहानुभूति लहर के बावजूद भाजपा की सीटें 86 से बढ़कर 120 हो गयीं। भाजपा अब संसद में मुख्य विपक्षी दल बन गयी। 120 सीटों पर जीत ने साबित कर दिया कि भाजपा अब केवल एक तीसरी शक्ति नहीं, बल्कि कांग्रेस का सीधा और मुख्य विकल्प बन चुकी है।

    हिंदुत्व काफी नहीं अब सोशल इंजीनियरिंग की जरूरत
    1992 से 1996 का कालखंड भाजपा के लिए अग्निपरीक्षा का समय था। एक तरफ बाबरी विध्वंस के बाद पार्टी को राजनीतिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश की गयी, तो दूसरी तरफ इसी घटना ने भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया। अयोध्या में विवादित ढांचा ढहने के बाद देश की राजनीति पूरी तरह बदल गयी। तत्कालीन नरसिंह राव सरकार ने उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार समेत भाजपा शासित चार राज्यों (यूपी, एमपी, राजस्थान, हिमाचल) की सरकारों को बर्खास्त कर दिया। आरएसएस और कुछ अन्य संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। भाजपा के शीर्ष नेताओं (आडवाणी, जोशी, कल्याण सिंह) पर मुकदमे दर्ज हुए। बर्खास्तगी के बाद जब 1993 में इन चार राज्यों में चुनाव हुए, तो भाजपा को उम्मीद थी कि राम लहर उसे दोबारा सत्ता दिलायेगी। लेकिन भाजपा केवल राजस्थान में वापसी कर पायी। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के मंडल गठबंधन ने भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया। अब भाजपा ने महसूस किया कि केवल हिंदुत्व काफी नहीं है। उसे सत्ता तक पहुंचने के लिए सोशल इंजीनियरिंग (पिछड़ों और दलितों को साथ लेना) और गठबंधन की जरूरत है।

    वाजपेयी का नाम प्रधानमंत्री के लिए घोषित
    नवंबर 1995 में मुंबई के अधिवेशन में लालकृष्ण आडवाणी ने एक मास्टरस्ट्रोक खेला। उन्होंने घोषणा की कि आगामी 1996 के चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। आडवाणी जानते थे कि उनकी छवि कट्टर है, जबकि वाजपेयी की छवि उदार और सर्व-स्वीकार्य है। गठबंधन बनाने के लिए वाजपेयी का चेहरा सबसे उपयुक्त था। 1996 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने इतिहास रच दिया। 120 सीटों (1991) से बढ़कर भाजपा 161 सीटों पर पहुंच गयी और पहली बार संसद में सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस 140 सीटों पर सिमट गयी।

    13 दिन की सरकार: एक वोट की कमी और एक बड़ी जीत की जमीन तैयार
    राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया। 16 मई 1996 को वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। बहुमत के लिए 272 सीटों की जरूरत थी, लेकिन भाजपा के पास केवल 161 (सहयोगियों के साथ 194) सीटें थीं। मात्र 13 दिन बाद, तमिलनाडु की नेता जयललिता ने समर्थन वापस ले लिया। संसद में विश्वास मत के दौरान सरकार केवल एक वोट से गिर गयी। अन्य दलों ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भाजपा का साथ देने से इनकार कर दिया। 27 मई 1996 को सदन में विश्वास मत पर चर्चा हुई। वाजपेयी ने अपना ऐतिहासिक भाषण दिया और मतदान से पहले ही इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा, अध्यक्ष महोदय, अगर सत्ता के लिए दल तोड़कर, अनैतिक गठबंधन बनाकर सरकार चलानी है, तो मैं ऐसी सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा। भले ही सरकार 13 दिन में गिर गयी, लेकिन टीवी पर प्रसारित हुए वाजपेयी के भाषण ने उन्हें पूरे देश का जननायक बना दिया। जनता ने देखा कि एक ईमानदार नेता को केवल इसलिए हटाया गया, क्योंकि बाकी दल उसके खिलाफ एकजुट हो गये थे। इसने 1998 और 1999 की बड़ी जीत की जमीन तैयार कर दी।

    वाजपेयी युग: जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान
    भाजपा ने महसूस किया कि उसे सत्ता के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) बनाना होगा। 1998 से 2004 का कालखंड भारतीय राजनीति में स्थिरता और गठबंधन का युग माना जाता है। इसी दौर में भाजपा ने यह साबित किया कि वह न केवल एक विचारधारा वाली पार्टी है, बल्कि देश चलाने में भी सक्षम है। 1998 के चुनावों में भाजपा 182 सीटें जीतकर फिर से सबसे बड़ी पार्टी बनी। अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के नेतृत्व में शपथ ली। सत्ता संभालने के दो महीने के भीतर वाजपेयी सरकार ने राजस्थान के पोखरण में पांच परमाणु परीक्षण किये। भारत एक घोषित परमाणु शक्ति बन गया। परमाणु परीक्षण के बाद वाजपेयी ने शास्त्री जी के नारे में जय विज्ञान जोड़ा। जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान।

    1999: कारगिल युद्ध और प्रचंड वापसी
    सरकार गिरने के बाद देश चुनाव की तैयारी कर रहा था, तभी पाकिस्तान ने कारगिल में घुसपैठ कर दी। भारतीय सेना ने अदम्य साहस दिखाते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ा। कारगिल की जीत ने वाजपेयी को एक मजबूत राष्ट्रनायक के रूप में स्थापित कर दिया। कारगिल की लहर पर सवार होकर एनडीए ने पूर्ण बहुमत हासिल किया। भाजपा ने फिर से 182 सीटें जीतीं और वाजपेयी पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने, जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

    वनवास, संघर्ष और फिर आया मोदी युग
    2004 से 2014 तक का समय भाजपा के लिए विपक्ष में रहने का था। इस दौरान लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी ने पार्टी का नेतृत्व किया। हालांकि पार्टी केंद्र में चुनाव हार रही थी, लेकिन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे राज्यों में भाजपा का विकास मॉडल अपनी जड़ें जमा रहा था। यह दौर पार्टी के लिए संघर्षपूर्ण रहा, लेकिन इसी दौरान गुजरात की धरती पर एक ऐसा नेतृत्व तैयार हो रहा था, जिसने 2014 में आकर भारतीय राजनीति के सारे पुराने समीकरण ध्वस्त कर दिये। जून 2013 में गोवा में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई। लालकृष्ण आडवाणी की असहमति के बावजूद तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित कर दिया। इसके कुछ समय बाद उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया गया। 2013 में नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार घोषित करना भाजपा का सबसे बड़ा गेम चेंजर साबित हुआ।

    दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी
    2014 का चुनाव स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ था। मोदी ने पूरे देश में 400 से ज्यादा रैलियां कीं और विकास को मुख्य मुद्दा बनाया। भाजपा ने अपने दम पर 282 सीटें जीतीं। 30 साल बाद किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला। सबका साथ, सबका विकास का नारा देश के कोने-कोने तक पहुंचा। उत्तर प्रदेश में 80 में से 71 सीटें जीतकर अमित शाह आधुनिक चाणक्य के रूप में उभरे। मोदी युग में भाजपा ने अपनी कार्यशैली और विचारधारा को लागू करने की गति को कई गुना बढ़ा दिया।

    प्रखर राष्ट्रवाद
    सर्जिकल स्ट्राइक (2016) और एयर स्ट्राइक (2019) ने जनता के बीच यह संदेश दिया कि देश सुरक्षित हाथों में है। नोटबंदी, जीएसटी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कड़े फैसलों ने जनता के बीच मोदी की मजबूत नेता की छवि बनायी। तीन तलाक, सीएए, सामाजिक सुधार और नागरिकता कानूनों में बदलाव किये गये। मोदी युग में ही भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी। 2019 में मोदी लहर और तेज हुई और भाजपा ने 303 सीटें हासिल कीं। इस दूसरे कार्यकाल में भाजपा ने अपने दशकों पुराने कोर एजेंडे को पूरा किया। जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करना और अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करना भाजपा की उपलब्धि रही। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने गठबंधन के साथ लगातार तीसरी बार केंद्र में सत्ता हासिल की। मोदी युग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि भाजपा अब दक्षिण भारत (तेलंगाना, आंध्र प्रदेश) और पूर्वी भारत (पश्चिम बंगाल, ओड़िशा) में एक मजबूत ताकत बन चुकी है।

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