लातेहार की तुबैद कोयला खदान: डीवीसी ने ग्रामीणों को धूल फांकने पर मजबूर कर दिया है, फसल भी नष्ट
दुनिया भर में कोयला और दूसरे खनिजों के खनन के दौरान होनेवाले प्रदूषण को कम करने के लिए लगातार कोशिशें हो रही हैं, लेकिन झारखंड की हालत एकदम उलट है। यहां की खनिज संपदा अब यहां के लोगों के लिए अभिशाप बनने लगी है। असुरक्षित खनन के कारण होनेवाला प्रदूषण और खनन कंपनियों द्वारा आसपास के इलाकों की लगातार अनदेखी ने स्थिति को भयावह बना दिया है। यूरेनियम की खदान के कारण हुए नुकसान के बारे में दुनिया जान चुकी है, लेकिन लातेहार की तुबैद कोयला खदान ने तो इलाके के लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। लातेहार को स्मार्ट सिटी बनाने, यहां की गरीबी दूर करने और बेरोजगार ग्रामीणों को रोजगार देने की गारंटी देने का वादा करनेवाला तुबैद कोल माइंस प्रबंधन (डीवीसी) अब ग्रामीणों के लिए आफत बन गया है। ग्रामीणों पर यह आफत कोयला खदान से होनेवाले प्रदूषण के कारण आयी है। अधिकारियों और प्रशासन को इसकी पूरी जानकारी है, लेकिन कहीं से कोई कार्रवाई का संकेत नहीं मिल रहा है। तुबैद कोयला खदान के आसपास के इलाकों में फैलते प्रदूषण के कारण जनजीवन पर पड़नेवाले प्रभावों से दुनिया को अवगत कराने के लिए आजाद सिपाही की टीम ने इलाके का दौरा किया। इस बारे में प्रस्तुत है मुकेश कुमार सिंह की ग्राउंड रिपोर्ट।
हम जब तुबैद कोल माइंस प्रबंधन की बड़ी-बड़ी बातों की सच्चाई देखने पहुंचे, तो पहले गार्डों ने हमें रोक दिया। बहुत कहने के बाद हम लोग माइंस एरिया में पहुंचे। वहां कहा गया कि दूसरा विस्फोट होना है, इसलिए अभी मत जाइये। हम लोग विस्फोट स्थल से लगभग दो सौ मीटर बगल में स्थित 25 घर की आदिवासी बस्ती में गये। वहां लोगों से जब मिले, तो वह सिर्फ कहने के लिए गांव था, वहां की हवा और पानी दिल्ली से भी ज्यादा प्रदूषित था। वह बस्ती नर्क के रूप में हमारे सामने थी, जहां का हर निवासी, खास कर बच्चे बीमार दिख रहे थे।
कोल माइंस के लोगों की नीति और नीयत में काफी फर्क है। ग्रामीणों के साथ धोखा किया जा रहा है। कंपनी कागज में कुछ और कहती है, लेकिन जब धरातल पर काम देखने और दिखाने की बात आती है, तो लोग बगलें झांकने लगते हैं। कंपनी प्रबंधन कोलियरी चलाने के लिए साम, दाम, दंड और भेद सभी प्रकार की नीति अपनाता है। सबसे पहले पैसे का खेल चलता है। जब यह असफल होता है, तो प्रशासनिक मदद से अपने कार्यों का निपटारा करते हैं। इससे भी काम नहीं चलता है, तब कंपनी सरकार को भी शामिल कर प्रशासन और कंपनी तीनों मिल कर ग्रामीण जनता का जम कर दोहन करती है। इसका सीधा प्रमाण है वहां की स्थिति। कोई भी कोलियरी के आसपास स्थित गांव का दौरा कर ले और देखे कि ग्रामीणों का जनजीवन कितना नरक बन गया है।
गांववालों का दर्द
कहा जाता है कि हमारे देश के गांवों में रहनेवाले लोगों को जितना शुद्ध पानी और हवा मिलती है, शहरों में सपना हो जाता है, लेकिन कोलियरी के किनारे रहनेवाले गांव के ग्रामीणों के जीवन को देखें, तो कलेजा मुंह में निकल कर आ जायेगा। उनका जीवन बेहाल है। ना तो पीने का पानी बेहतर है और ना सांस लेने के लिए लिए शुद्ध हवा। वे कोयले का कण मिला पानी पीने को मजबूर हैं और सांस लेने के लिए प्रदूषित हवा ही उन्हें मिलती है। गांवों की कहानियां अब दंत कथा बन कर रह जायेंगी। जब कोई ग्रामीण बतायेगा कि हमारे दादा-परदादा की जिंदगी 100 साल की हुआ करती थी, लेकिन अब हमारा और हमारे बच्चों का जीवन इतना प्रदूषित हो गया है कि हम कब बीमारी से ग्रसित होंगे और कब हम काल कवलित हो जायेंगे, कहना मुश्किल है। हम खेती-बाड़ी पर निर्भर रहनेवाले लोग हैं, लेकिन अब हमारी खेती-बाड़ी कोयले की धूल की भेंट चढ़ गयी है। पानी में कोयले की धूल मिलने के कारण खेतों की पैदावार आधे से भी कम हो गयी है। हम लोगों के सामने भोजन के भी लाले पड़ गये हैं। कोई नहीं सुनता, सरकार हो या प्रशासन के लोग या समाजसेवी, हम लोग सभी के पास फरियाद लेकर गये, लेकिन खाली हाथ लौटना पड़ा।
बहुत वादे हुए थे, सब सब्जबाग निकले
वापस आकर भगवान भरोसे ही अपनी जिंदगी जी रहे हैं। हम सोचे थे कि हमारी कंपनी लगेगी तो हमारे बच्चों को रोजगार मिलेगा। हम लोगों का दुख दूर होगा। इलाज के लिए बेहतर अस्पताल होगा। पीने के लिए शुद्ध पानी की व्यवस्था होगी। रहने के लिए मकान होगा, लेकिन ये सब बातें कंपनी की ओर से सिर्फ सब्जबाग दिखाने के समान हैं। हम लोगों को प्राकृतिक रूप से जो शुद्ध हवा और पानी मिलता था, उसे भी छीन लिया। हमारे बेरोजगार नौजवानों से नौकरी देने के नाम पर 12 घंटा काम करवाते हैं और 6000 रुपया महीना देते हैं और वह भी दो महीने के लिए। उसके बाद कब नौकरी से निकाल देंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं। गांववालों का दर्द है कि हमारे मुख्यमंत्री कहते हैं कि आदिवासी की सरकार है, लेकिन कहां आदिवासी की सरकार है, हमारी तो कोई सुध नहीं लेता। ना सरकार लेती है, ना ही जिला प्रशासन लेता है और न ही यहां के विधायक लेते हैं। हम लोगों को तो पुलिस के द्वारा प्रताड़ित भी किया जाता है। हम लोग जब-जब कंपनी के विरुद्ध कुछ बोलना चाहते हैं, पुलिस प्रशासन हम पर जुल्म ढाता है। कोयला कंपनी के लोग जमीन मालिकों से जबरदस्ती पुलिस के दम पर जमीन कब्जे में लेकर कार्य कर रहे हैं। आज से कई उदाहरण मिल जायेंगे। जमीन उनके पास लिखित है, कंपनी के द्वारा लिखित दिया हुआ है। कंपनी ने पैसे भी दिये, लेकिन रजिस्ट्री नहीं करवायी और पूरे पैसे नहीं दिये और न ही काम करने का परमिशन लिया और उसकी जमीन पर कार्य चालू है। पैसे नहीं मिलने पर अगर किसान कंपनी वालों को काम से रोकता है या पैसे मांगता है, तो उस पर पुलिस कार्रवाई करती है। कहा जाता है कि तुम उग्रवादी हो, जमीन प्रशासन को लिखो। जैसे-तैसे करके रिपोर्ट गलत लिखवा कर पैसा नहीं देने का हथकंडा अपनाया जाता है।
डीवीसी के जीएम ने क्या कहा
तुबेद कोल माइंस (डीवीसी) के जीएम जेके मांड्या से इस संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि हमें इस तरह की कोई जानकारी नहीं है। हम पता कर लेते हैं और ग्रामीणों से मिल कर बात कर लेंगे। तभी कुछ बता सकते हैं।